पर्यावरण एक बड़ी चुनौतियां – कूड़े का दर्शन
पर्यावरण एक बड़ी चुनौतियां

मनोज कुमार झा
प्रकृति की सबसे अनुपम कृति यानि ‘मानव’ जिसके हाथ प्रकृति पृथ्वी को सौंप कर निश्चिंत होना चाहती थी। फिलहाल वह इससे अधिक कुछ कर भी नहीं सकती थी। लेकिन इसी मानव ने प्रकृति के सारी बनावट के आगे संकट पैदा कर दिया है। इस संकट से ऊबरने के लिए प्रकृति दिन-रात तत्परता से लगी है लेकिन कुछ भी सूत्र उसके हाथ आने से पहले मानव रोज-रोज नए-नए संकट पैदा कर रहा है।


आज आधुनिकता के केंद्र में मनुष्य है। मनुष्य अपने भौतिक बिलासिता को पूरा करने के पीछे धन व प्रतिष्ठा अर्जित करने लगी है। धन व प्रतिष्ठा ने दो देशों के बीच से लेकर दो परिवार ही नहीं दो मनुष्य के बीच तक अपना पांव पसार कर प्रकृति को सर्वनाश की पराकाष्ठा तक पहुंचाने में लगी है। अब तो विकसित देश विकाशील देशों की ओर बड़े ध्यान के टकटकी लगाए देख रही है कि कहीं जो कुछ अपने विकास के लिए उसने किया है वही वह तो नहीं करने जा रहा।
थोड़े ही शब्दों में कहें तो पर्यावरण संकट पृथ्वी को भष्म कर समाप्त सकती है। यदि हम समय रहते सचेत नहीं हुए- केवल भारत ही नहीं विश्व के सभी देश को अपनी विकास की आधुनिक परिभाषा को बदलनी होगी। सभी देशों को अपनी सोच बदलनी होगी। दुनिया भर के कार्य और व्यापार के तौर-तरीके बदलने होंगे।
1992 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने जलवायु परिवर्तन संधि और 1997 में क्योटो-कॉल में यह आम सहमति बनी थी कि पृथ्वी को गर्म होने से बचाने में सभी देशों की जिम्मेदारी बनती है। किंतु जिन देशों ने अपने विकास यात्राओं के दौरान सबसे अधिक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन किया है उनका आर्थिक दायित्व अधिक-से-अधिक बनता है। लेकिन विकसित देशों को जो धन व तकनीक उपलब्ध कराने का वादा किया था, उसे वह अमल में नहीं ला रहा है।
पर्यावरण संकट के कारण हम क्या-क्या खोयेंगे इसकी लंबी लिस्ट है- लेकिन मुख्य रूप से हवा, जल, अनाज से सबसे अधिक प्रभावित होंगे। जल संकट से हमने जूझना प्रारंभ कर दिया है। इस संकट से हम थोड़ी-बहुत निजात पा भी लें, लेकिन वायु प्रदूषण के संकटों से हम उबर नहीं पाएंगे। जल प्रदूषण के बारे में थोड़ा देखिए- हमने भारत की लगभग सभी नदियों को प्रदूषित कर चुके हैं। अब हालात धीरे-धीरे और भी गंभीर होते जाएंगे। हमारी नदियों से ही धरती के पेट का पानी का भरण होता है। जिस दिन हानिकारक जीवाणु धरती के पेट के पानी को प्रदूषित कर दिया उस दिन मानव सभ्यता का अंत प्रारंभ हो जाएगा। दुनिया भर के प्रदूषित नदियों का पानी समुद्र में मिल रहा है। हमारा आकूत कचड़ा समुद्र में जमा हो रहा है। समुद्री जीव धीरे-धीरे नष्ट होते जा रहे हैं। वायु प्रदूषण के कारण अनेक प्रकार के मित्र जीवाणु हम खोते जा रहे हैं, इसका तनिक भी अंदाजा हमें नहीं है। पृथ्वी पर जीवनोपयोगी जीवाणु के अभाव का हम पर असर दिखने लगा है। फसलों में बेधरक रसायण उपयोग से जीव-जंतु समाप्त हो रहे हैं। पशु-पक्षी लगातार लुप्त होते जा रहे हैं। यहां यह बताने की जरूरत नहीं हैं कि कौन-कौन से पशु-पक्षी हमने अभी तक खोया है। प्रत्येक व्यक्ति व समाज अपने आसपास यह महसूस कर सकता है कि उसके बीच कौन-कौन थे जो अब नहीं दिखते। प्रकृति को लगातार सहायता करने वाली पक्षियों को पशुओं को हम खोते जा रहे हैं।
भारत की समस्या यह है कि वह विकास की पटरी पर चल रहा है- वह उसे किस स्टेशन ले जाएगा, यह ठीक से विचार कर ही गाड़ी आगे बढ़ाएं। अभी हमारे सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न जो खड़ा है वह है- नदियों को पुनर्जिवित करना। जब तक हम नदियों को पुनर्जिवित नहीं करते तब तक हम जल संकट से निजात नहीं पा सकते। पृथ्वी की जीवनदायिनी क्षमता के सभी अवयवों को हमें पुनर्स्थापित करना होगा। इस कड़ी में हमें दो-तीन सौ साल पीछे जाकर देखना होगा कि हम कहां से अपने जीवनोपयोगी पर्यावरण को बचाने के बदले ध्वस्त कर तेजी से आगे बढ़ने लगे। अभी तक इस ओर ध्यान नहीं जा रहा है हमारा। प्रकृति भी बाजार के हाथों बिकेगी तो परिणाम ठीक नहीं होने वाला।
उदाहरण के तौर पर देखिए- पहले हम बाहर शौच आदि के लिए जाते थे। खेतों में गांव से काफी दूर नित्यक्रिया से निवृत होते थे। हमारे मल प्रकृति में आसानी से विसर्जित हो उपयोगी बन जाती थी। लेकिन अब हम अपना मल-मूत्र ही नहीं तमाम तरह के विकृत रसायण सीधे नदियों में डाल समझते रहे कि हमने बहुत ही अच्छा निस्तारण कर दिया है। फिर हुआ क्या हमने अपने सारे जलस्रोतों को तबाह कर दिया है।
हम सभी जानते हैं कि पर्यावरण को जलवायु भी कहते हैं- जल और वायु इन दो को ही यदि हम सुधार लें तो हम काफी संकटों से निजात पा सकेंगे। पर्यावरण तो जल, जंगल, जमीन, और वायु (वातावरण) को ठीक करने से ही हम बच पाएंगे। इसे सुधारने के जो भी समुचित और सच्ची प्रयास हो सकती है उसे हमें करना चाहिए।
मनोज कुमार झा
पर्यावरण कार्यकर्ता,
गांधी शांति प्रतिष्ठान,
नई दिल्ली-110002
कूड़े का दर्शन

मनोज कुमार झा
कूड़ा अव्यवस्था से जन्म लेता है। लेकिन यह भी दिलचस्प है कि कूड़े की व्यवस्था करनी पड़ती है। सरकार का एक पूरा महकामा इसके लिए लगा है। दफ्तरी कामकाज के सारे तामझाम इसके पीछे हैं। कभी-कभी सोचता हूं, कूड़ा तो इन कूड़ा उठाने वाले दफ्तरों में भी होता होगा। पता नहीं उसे कौन उठाता है?
दरअसल कूड़ा हमारे आधुनिक जीवन की एक जरूरी बुराई की तरह है। कूड़े से हम बच नहीं सकते और कूड़े को हम देखना नहीं चाहते। इधर कूड़े की कुछ शक्ल भी बदली है। अब यह जल्दी असह्य हो जाता है। नाक, कान, आंख जैसी हमारी इंद्रियां इससे तुरंत उकता जाती हैं। आज कूड़ा ज्यादा बजबजाता है। पर्यावरण प्रदूषण के सारे सजावटी इश्तिहार इसे दखे ही स्मरण हो आते हैं। सरकार कूड़ा कहां फेंके, अब यह उसके लिए भी समस्या हैं प्लास्टिक से क्या नुकसान हो रहा है, यह दोहराने की भी जरूरत नहीं हैं जिन देशों से यह अक्लमंदी हमने सीखी है, अब वही हमें इनसे खबरदार होने की तमीज सिखा रहे हैं। बचपन से कुछ ऐसे लोगों के साथ रहने-सीखने का मौका मिला है जिन्हें आप प्रचलित शब्दावली में ‘गांधीवादी’ कह सकते हैं। वैसे खुद गांधी को भी अपने नाम में कभी इतनी शक्ति का एहसास नहीं हुआ कि उससे कोई ‘वाद’ चले। ऐसे में हम व्यक्तिवाद की भी बुराई नहीं कर पाएंगे।
बहरहाल, कई बार कुछ शिविरों और ऐसी ही गांधीवादी संस्थाओं में गया हूं। कई मौकों और कई जगहों पर इस रूप में देखकर जरूर आश्चर्य हुआ कि वहां कूड़े को समस्या की तरह नहीं निपटाया जाता। एक गांधीवादी युवक
(बूढ़े ने नहीं) ने बताया कि सफाई का मतलब समझते हो? मैंने कहा, कूडे को ठिकाने लगाना- सफाई तो यही हैं उसने फिर से प्रश्न जड़ दिया- कूड़ा पैदा क्यों होता है? मैंने कहा, जब कोई चीज हमारे काम की नहीं रहती तो वह कूड़ा हो जाती है। वह युवक अब खुश था। शायद उसकी नजर में मैंने अपनी सारी बुद्धिमानी जाहिर कर दी थी। वह मुझे प्रेमभाई के वनवासी सेवा आश्रम मिर्जापुर के कुछ रास्तों पर बड़े भाई की तरह पीठ पर हाथ रखकर घुमाने निकला। मैंने गोबर से बनती गोबर गैस देखी, फिर गैस दे चुके गोबर से बनती खाद देखी और फिर देखी उस खादसे तैयार सुंदर फसल। मैंने खुद से हर संभव काम को करने की ललक ‘आश्रम के लोगों में महसूस की। मेरे लिए यह जीवन का नया पाठ था।
दो-एक दिन बाद युवक से मुझे अपना बकाया जवाब मिला। उसने बताया- सफाई का मतलब सभी चीजों का फायदेमंद इस्तेमाल। बाद में तो यह मेरा प्रिय विषय ही बन गया। गांधीजी के जीवन और उनसे जुड़े लोगों के प्रसंग मुझे याद आद रहे हैं।
बात आजादी के कुछ साल पहले की है। गांधीजी उन दिनांे बंबई में थे। एक बड़ी सभा होने वाली थी। सभा से पूर्व अपनी आदत के मुताबिक गांधीजी शहर के विभिन्न तबके के लोगों से मिलते, बात करते। सभी अपनी बातें उनके आगे रखने के लिए लालायित रहते। सूरज भी ऐसे ही एक दिन उनसे मिला। सूरज अब सिर्फ सफाई कर्मचारी नहीं, उसकी यूनियन का नेता था। बातें तार्किक की जगह सहज ज्यादा थीं। सहजता से ही पूछा- बापू, क्या आप मेरी भी बात सुनेंगे? गांधी ने कहा- क्यों नहीं। सूरज ने शर्त रखी, ऐसे ही चलते-चलते नहीं, बैठकर पूरी तसल्ली से सुननी होगी। गांधीजी सूरज से भी आगे हो गए। कहा- तो चलो तुम्हारे घर ही चलते हैं। सूरज अवाक था। जिसके पीछे दुनिया पागल है, वह मेरे घर खुद आना चाह रहा है!
सूरज ने कहा- बापू मैं आज भी पेशे से एक सफाई कर्मचारी ही हूं। यूनियन की पगड़ी इन लोगों की दी हुई है। पहले रात भर सफाई का काम करता था। अकेले कई किलोमीटर सड़के बुहार देता था। आज उसी काम को करने के लिए हम छह लोग हैं। हमारे औजार भी बढ़ गए हैं। झाडू के अलावा अब कूड़ साफ करने की गाड़ी लेकर हम घूमते हैं। लेकिन लगता है कि कूड़े की ही शक्ल बदल गई है। कमबख्त चुड़ैल के मेकप के लिए ये सारे समान पूरे नहीं पड़ते। इसकी शक्ल वैसे ही बजबजाती रह जाती है। यह क्या हो गया है?
अगले दिन भरी सभा में गांधी ने सूरज को दूर से ही पहचान निकाला। पास आकर उससे मिले। वहां के लोगों के लिए यह सब हैरत भरा था। बाद में सभा में बोलते हुए गांधी ने कहा, मुझे ‘अंग्रेजों’ से नहीं ‘कूड़ों’ से आजादी चाहिए। दरअसल गांधी का कोई एजेंडा बदला नहीं था, बल्कि वे अपने एजेंडे की तामील के लिए लोगों का सोच बदलना चाहते थे। गांधी ने कहा, कूड़ा सामान ही नहीं, जीवन भी होता है। वैसे ही जैसे हमारे जीवन में कुछ समान रद्दी और कूड़ा होता है। दरअसल अपनी उपयोगिता और उद्देश्य खो चुका जीवन हो या फिर कोई समान, वह कूड़ा है।
आज हमारे जीवन को सजाने वाली जिन चीजों से जीवन की सजावट होनी थी, शायद उन्होंने प्रकृति की सारी बनावट के आगे एक संकट पैदा कर दिया है। ‘दर्शन’ की जगह ‘दिखावा’ हमें हार्दिक पनाह देता है और जब हम इन सबसे थकते हैं तो अपने आसपास के कूड़ामय होने का रोना रोते हैं। शायद इस रुदन में भी कोई करुणा होती, लेकिन यह तो एक कूड़े का दूसरे कूड़े के लिए रोना है।


*कैलाश गौतम अवार्ड से सम्मानित हुए साहित्यकार डॉ गणेश*
*कैलाश गौतम अवार्ड से सम्मानित हुए साहित्यकार डॉ गणेश*
*सुप्रसिद्ध बॉलीवुड फिल्म निर्देशक और अभिनेता तिग्मांशु धूलिया ने प्रदान किया अवार्ड*

डॉ दर्शनी प्रिय
पत्रकार और लेखक



राज्यसभा सचिवालय के पूर्व संपादक और साहित्यकार डॉ गणेश शंकर श्रीवास्तव को हिंदुस्तानी साहित्य की संस्था गुफ़्तगू की ओर से प्रयागराज में कैलाश गौतम अवार्ड प्रदान किया गया। यह पुरस्कार उन्हें सुप्रसिद्ध बॉलीवुड फिल्म निर्माता-निर्देशक और अभिनेता तिग्मांशु धूलिया के हाथों प्रयागराज में आयोजित एक भव्य समारोह में प्रदान किया गया। समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि यश मालवीय ने की। डॉ गणेश शंकर श्रीवास्तव साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग दो दशकों से सक्रिय हैं। उनकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं तथा दूरदर्शन एवं आकाशवाणी से प्रसारित हैं। डॉ गणेश की रचनाएं ‘आर पार’ एवं ‘कई फूल कई रंग’ काव्य संकलनों में संगृहीत हैं। डॉ गणेश के पिता श्री सुरेश चंद श्रीवास्तव सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी एवं माता श्रीमती सरला देवी गृहणी हैं। पुरस्कार के लिए कई वरिष्ठ लेखकों एवं पत्रकारों ने उन्हें बधाई प्रेषित की है। संप्रति डॉ गणेश, नई दिल्ली में भारत सरकार के एक कार्यालय में कार्यरत हैं।
*सुप्रसिद्ध कवियों-लेखकों ने दी डॉ गणेश को बधाई*
सुप्रसिद्ध हास्य कवि *अरूण* *जैमिनी* ने डॉ गणेश को कैलाश गौतम अवार्ड की बधाई संदेश में कहा कि कोई भी सम्मान आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। डॉ गणेश की कविताएं जितनी संवेदनशील हैं, उतनी ही पैनी धार उनके व्यंग्य लेखों की भी है। प्रिय डॉ गणेश को कैलाश गौतम अवार्ड के लिए अनंत शुभकामनाएं। आप यूँ ही सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते रहो।
कैलाश गौतम अवार्ड की बधाई देते हुए प्रतिष्ठित कवि *प्रांजल धर* ने कहा कि गणेश शंकर श्रीवास्तव जी लेखन को अपनी आत्मीयता की ऊष्मा और अपनेपन के स्नेहिल ताप से जोड़ते हैं। इनकी रचनाओं में एक सहज लयबद्धता व्याप्त रहती है जो गाँव-देहात की ज़मीन और माटी की खुशबू को बयाँ करती है। दार्शनिक भावभूमि के साथ-ही-साथ बिसरा दिए गए जनसरोकार, हाशिये की चिन्ता, बराबरी के लिए संघर्ष इनकी रचनाओं में पसरा है।
लोकप्रिय कवि *शंभू शिखर* ने कहा कि डॉ गणेश मेरे पुराने साहित्यिक मित्र हैं। लेखन से लेकर साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन भी आपके प्रयास से समय-समय पर संभव होता रहा है। यह गणेश जी की साहित्य साधना का ही परिणाम है कि उन्हें गुफ्तगू संस्था द्वारा कैलाश गौतम अवार्ड से सम्मानित किया गया है। मैं आपके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ।
डॉ गणेश को साहित्यिक क्षेत्र में मिलने वाले इस सम्मान से हम सब गौरवान्वित है। मैं इनके उज्जवल भविष्य की कामना करती हूं ।वे विवेकी,समर्पित और गंभीर लेखक हैं।उनकी साहित्यिक यात्रा लगातार ऐसे ही बनी रहे और वे भविष्य में एक स्थापित लेखक और साहित्यकार के रूप में अपना इतिहास में नाम दर्ज कर सके ऐसी मेरीशुभकामनाएं है।
डॉ दर्शनी प्रिय
पत्रकार और लेख



तफ़हीमुल क़ुरआन (हिन्दी) ऐप का विमोचन
तफ़हीमुल क़ुरआन (हिन्दी) ऐप का विमोचन

एमपीएनएन संवादाता
नई दिल्ली, 27 दिसंबर: आज यहाँ जमाअत-ए-इस्लामी हिन्द के मुख्यालय में मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी के प्रसिद्ध तफसीर (व्याख्या) तफ़हीमुल क़ुरआन (हिन्दी) ऐप का विमोचन समारोह जमाअत के अमीर सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी की अध्यक्षता में आयोजित किया गया। जमाअत-ए-इस्लामी हिन्द से जुड़ी संस्था ‘इस्लामी साहित्य ट्रस्ट’ ने इस ऐप को विकसित किया है।
जमाअत के अमीर सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने ट्रस्टियों और ऐप डेवलपर यूसुफ अमीन को बधाई देते हुए कहा कि मौलाना मौदूदी ने तफ़सीर लिखने में बहुत मेहनत की है। तफ़हीमुल क़ुरआन की तैयारी के संदर्भ में मौलाना मौदूदी ने जर्मन भाषा सीखी, हिंदू धर्म और ईसाई धर्म की बुनियादी पुस्तकों का अध्ययन किया, अन्य विचारों और सिद्धांतों का गंभीर मूल्यांकन करने के पश्चात तफसीर (व्याख्या) तैयार किया। उन्होंने कहा कि यह बहुत महत्वपूर्ण कार्य है जिसे इस्लामी साहित्य ट्रस्ट द्वारा किया गया। अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इसे जितना संभव हो उतना लोकप्रिय बनाने का प्रयास करें, ताकि यह न केवल मुसलमानों तक पहुंच सके, बल्कि हिंदी जानने वाले हर व्यक्ति तक इसकी पहुंच हो सके।
ट्रस्ट के सचिव श्री वारिस हुसैन द्वारा परिचयात्मक उद्बोधन के उपरांत जमाअत के अमीर एवं अन्य पदाधिकारियों ने ऐप का पोस्टर जारी किया। फिर अमीर जमाअत ने इसके लिंक पर क्लिक करके ऐप लॉन्च किया। ऐप डेवेलपर युसूफ अमीन ने इसके सभी फीचर्स से परिचय कराया। इस ऐप में पवित्र क़ुरआन का संपूर्ण पाठ, उसका हिंदी अनुवाद और तफ़हीमुल क़ुरआन का अनुवाद शामिल है। अनुवाद और व्याख्या दोनों पढ़े जा सकते हैं, लेकिन सुनने का विकल्प केवल अनुवाद के लिए है।
तफ़हीमुल क़ुरआन का हिंदी अनुवाद मौलाना नसीम अहमद गाजी फलाही ने किया है। इस मौके पर नसीम गाजी ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि 6 वॉल के इस तफ़्सीर के अनुवाद में लगभग 12 वर्ष लगे। उन्होंने बताया कि अनुवाद के साथ इसमें क़ुरआन की शब्दावली की संक्षिप्त व्याख्या और पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.) की हदीसों के संदर्भ भी शामिल किए गए हैं।
इस कार्यक्रम में इमारत -ए-शरिया बिहार के पूर्व नाजिम (प्रबंधक) एवं ऑल इंडिया नेशनल काउंसिल के उपाध्यक्ष मौलाना अनीसुर रहमान कासमी भी उपस्थित थे। उन्होंने अनुवाद के काम की संवेदनशीलता के बारे में बात करते हुए इस काम से जुड़े लोगों को बधाई दी।
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के शरिया काउंसिल के राष्ट्रीय सचिव डॉ. रज़ी-उल-इस्लाम नदवी ने कहा, “मेरा मानना है कि यह काम एक सदक़ा-ए – जारिया (सदैव शेष रहने वाला पुण्य का कार्य ) है। वे सभी जिन्होंने इसमें किसी न किसी तरह से योगदान दिया है, पुरस्कार के पात्र हैं।
जमाअत-ए-इस्लामी हिन्द के उपाध्यक्ष मलिक मोतसिम खान ने भी इस कार्य पर प्रसन्नता व्यक्त की और ट्रस्टियों को बधाई दी। ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री फरहत हुसैन ने कहा कि इस ऐप में तल्खीस (संक्षिप्त व्याख्या) तफ़हीमुल क़ुरआन जिसे मौलाना सदरुद्दीन इस्लाही ने तैयार किया था, जिसका हिंदी में अनुवाद मौलाना कौसर यजदानी नदवी ने किया है, को भी शामिल किया गया है। उन्होंने कहा कि ट्रस्ट ने धार्मिक पुस्तकों को भी डिजिटल रूप में लाने की योजना बनाई है।
इस ऐप को एंड्रॉइड और आईओएस पर इंस्टॉल किया जा सकता है।इसे प्ले स्टोर पर जाकर तफहीमुल कुरान हिंदी टाइप करके डाउनलोड किया जा सकता है या निम्नलिखित लिंक के माध्यम से भी डाउनलोड किया जा सकता है।
Link for Android Users
https://play.google.com/store/apps/details?id=com.fenzy_seller
Link For iOS (Apple) User
https://apps.apple.com/in/app/tafheemul-quran-hindi/id6739448995




द्वारा जारी :
सलमान अहमद
राष्ट्रीय सहायक सचिव, मीडिया विभाग, जमाअत-ए-इस्लामी हिंद, मुख्यालय
मोबाइल: 7290010191,पता: डी-321, अबुल फज़ल एन्क्लेव, जामिया नगर, ओखला,नई दिल्ली- 110025
[27/12, 18:16] M Salman: *Launch of Tafheem-ul-Quran (Hindi) App*
Syed Sadatullah Husaini, President Jamaat e Islami Hind launched Tafheem-ul-Quran (Hindi) App. App includes complete Arbic Text, Two Hindi Translations, Commentary as well as audios of Arbic recitation and Hindi Translation of Quran.
This App is being developed by Islami Sahitya Trust and is available for both Android and iOS.
It can be downloaded from the following links
*Link for Android Users*
https://play.google.com/store/apps/details?id=com.fenzy_seller
*Link For iOS (Apple) User*
https://apps.apple.com/in/app/tafheemul-quran-hindi/id6739448995




तुमसा नही देखा …. हिन्द की आर्थिक दिशा और दशा दोनों ही बदला था पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का 92 साल की उम्र में निधन, 7 दिन के राष्ट्रीय शोक का ऐलान।
हिन्द को गर्व रहेगा आप पर – हिन्द की आर्थिक दिशा और दशा दोनों ही बदला था डॉ. मनमोहन सिंह ने।

राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने 19 मई, 2004 (बुधवार) को नई दिल्ली में अगली सरकार बनाने के लिए प्रधान मंत्री को नामित करते हुए डॉ. मनमोहन सिंह को अधिकृत किया साथ मे अध्यक्ष कांग्रेस संसदीय दल श्रीमती तस्वीर में सोनिया गांधी भी नजर आ रही हैं।





श्रद्धांजली अर्पित करते हुए कुछ पंक्तियां उन्हों श्रद्धासुमन भेंट।
कांटों भरे पगडंडियों पर चल कर वह मुक़ाम पाया आपने।
मुक़ाम पा कर, रास्ते बनाये हिन्द को आर्थिक संकट से उभारा – और सँवारा आपने।।
अफसोस यह न रहेगा कि मुक़ाम पा कर भी कुछ नहीं कर पाए, खामोश रह कर भी हिन्द को आर्थिक व्यावस्था में मज़बूत बनाया आपने।
शांत थे, चेहरे पर हमेशा फीकी मुस्कान लिये सभी का मन-मोह लेते थे। मनमोहन थे, इसी लिये दुनियाँ का मन मोह लिया था आपने।।
एस. ज़ेड. मलिक
स्वर्गीय डॉ. मनमोहन सिंह अर्थशास्त्रीय प्रगतिशील गठबंधन सरकार में लगातार दो बार प्रधानमंत्री रहे। कांग्रेस और उसके संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने 2004 और 2009 के आम चुनावों में जीत हासिल की थी, तब 2004 से 2014 के बीच प्रधानमंत्री रहे।
भारतीय ‘अर्थव्यवस्था के गुरु’ कहे जाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जीवन, बचपन से संघर्षशील रहा है, कहा जाता है कि बचपन उन्होंने बड़ी बड़ी चुनौतियों का सामना किया, और कामयाब रहे, पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय मनमोहन सिंह के बारे में गूगल पर प्रकाशित एक लेख के अनुसार – उनकी जिंदगी में एक अजब संयोग रहा, जो जन्म से लेकर मृत्यु तक उनके साथ रहा, यह संयोग था 26 का अंक, मनमोहन सिंह का जन्म भी 26 को ही हुआ था और उनका निधन भी इसी तारीख को हुआ।
मनमोहन सिंह का जन्म 26 सितंबर 1932 को अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के गाह गांव में हुआ था। यह हिस्सा अब पाकिस्तान में है। देश का बंटवारा हुआ तो मनमोहन सिंह का परिवार अमृतसर आकर बस गया। यहीं से उनका असली करियर शुरू हुआ। मनमोहन सिंह पाकिस्तान के जिस गाह में जन्मे, वहां उनके नाम पर एक स्कूल भी है। इसे ‘मनमोहन सिंह गवर्नमेंट बॉयज स्कूल’ के नाम से जाना जाता है। इसी स्कूल में डॉ. मनमोहन सिंह ने अपनी शुरुआती पढ़ाई की थी। कभी अंधेरे में जीने वाला यह गांव आज आदर्श गांव बन चुका है, यहां के लोग मनमोहन सिंह को धन्यवाद देते नहीं थकते।
विभाजन के बाद जब परिवार भारत पहुंचा तो अन्य परिवारों के साथ मनमोहन सिंह के परिवार को भी पैसों की तंगी से जूझना पड़ा था। गाह गांव से अमृतसर पहुंचे मनमोहन सिंह की असली कहानी यहां से शुरू हुई। पंजाब यूनविर्सिटी से पढ़ाई करने के बाद वे कैंब्रिज गए। दुनिया की सबसे मशहूर यूनविर्सिटी ऑक्सफोड से डीफिल किया। मनमोहन सिंह की बेटी दमन सिंह ने अपनी किताब में तब की हालत के बारे में लिखा है। बताया है कि उन्हें किस तरह पैसों की कमी से जूझना पड़ा। फिर भी उन्होंने ईमानदारी का दामन नहीं छोड़ा। शायद यही उनके काम आया कि वे भारत के गर्वनर, वित्तमंत्री और फिर प्रधानमंत्री के रूप में देश की इकोनॉमी को नई दिशा दे पाए।
मनमोहन सिंह के नाम अनेक उपलब्धिया हैं। वे गर्वनर बने, वित्तमंत्री बने और प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे। इनता ही नहीं, जवाहरलाल नेहरू के बाद वे पहले भारतीय थे, जो लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बने। अपने फैसलों को लेकर वे काफी अडिग रहे। अमेरिका से न्यूक्लियर डील को उन्होंने देश के लिए जरूरी समझा तो अपनी सरकार दांव पर लगा दी। वे आम सहमति के पक्षधर थे। लेकिन उनकी सबसे खास बात उनकी सादगी में थी। जिसे दुनियाँ तमाम लीडर सराहते थे। वह हिन्द के बारे सोंचते सोंचते 26 दिसंबर 2024 को सदा के लिए सो गया।
राजनीतिक करियर की शुरुआत
जब डॉ. मनमोहन सिंह नवंबर 1990 में जिनेवा से भारत लौटे और चंद्र शेखर के कार्यकाल के दौरान आर्थिक मामलों पर भारत के प्रधान मंत्री के सलाहकार के रूप में पद संभाला। मार्च 1991 में, वह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष बनाये गये।
जून 1991 में, उस समय भारत के प्रधान मंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव ने सिंह को अपने वित्त मंत्री के रूप में चुना। सिंह ने 2005 में एक ब्रिटिश पत्रकार मार्क टुली से कहा।
जिस दिन (राव) अपने मंत्रिमंडल का गठन कर रहे थे, उन्होंने अपने प्रधान सचिव को मेरे पास यह कहते हुए भेजा, प्रधान सचिव मेरे पास आये और कहने लगे “प्रधानमंत्री चाहते हैं कि आप वित्त मंत्री बनें” मैंने इसे गंभीरता से नहीं लिया, और हंसते हुये ताल दिया, लेकिन फिर अगली सुबह वह मेरे पास आये, और थोड़े डांट कर बोले, तैयार होकर शपथ ग्रहण के लिए राष्ट्रपति भवन आओ पीएम इंतेज़ार कर रहे हैं। तो इस तरह मेरी राजनीति में शुरुआत हुई।
वित्त मंत्री
1991 में, भारत का राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 8.5 प्रतिशत के करीब था, भुगतान संतुलन घाटा बहुत बड़ा था और चालू खाता घाटा भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 3.5 प्रतिशत के करीब था। भारत का विदेशी भंडार मुश्किल से 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो 2 सप्ताह के आयात के भुगतान के लिए पर्याप्त था,
सिंह ने पीएम और पार्टी को समझाया कि भारत एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहा है। हालाँकि, पार्टी के कार्यकर्ताओं और कार्यकर्ताओं ने नियंत्रण-मुक्त करने का विरोध किया। इसलिए पी. चिदम्बरम और सिंह ने पार्टी को समझाया कि यदि इसे नियंत्रण-मुक्त नहीं किया गया तो अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। पार्टी को निराशा हुई, राव ने सिंह को भारतीय अर्थव्यवस्था को नियंत्रण-मुक्त करने की अनुमति दे दी।

संजीव कुमार
शोधार्थी
अर्थशास्त्र विभाग
मगध विश्वविद्यालय बोधगया बिहार
मैं इस महान अर्थशास्त्री को एक पंक्ति के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं कि ” जमाना कर न सका उनके कद का अंदाजा, वो आसमान था मगर सर झुका कर चलता था “।
डॉ मनमोहन सिंह जी के निधन से भारत मां ने अपना एक और सपूत को खो दिया। वो राजनीति में सादा जीवन, उच्च विचार की प्रतिमूर्ति थे। डॉ साहब अगर आर्थिक सुधार न किए होते तो शायद हमारे देश की अर्थव्यवस्था को कभी गति नहीं मिल पाती । डॉ मनमोहन सिंह के निधन से जो क्षति हुई है उसकी भरपाई होना मुश्किल है।





आओ अब चले गाँव की ओर – दिल्ली के भारत मंडपम में बिहार प्रवासियों का विशाल जन सभा विशाल




















