आसाम सरकार की मनुवादी मानसिकता, एक समुदायें को हथ्यार रखने का लाइसेंस देना, और दूसरे समुदायें से आतंवादी कह कर उसका लाइसेंस रद करना, यह कैसी नीति है?
सरकार की नीतियों पर जामाते इस्लामी की प्रतिक्रिया - असम सरकार का 'चुनिंदा' क्षेत्रों में हथियार लाइसेंस जारी करने का फैसला चिंताजनक
जमात ए इस्लामी हिन्द पत्रकारों को बिरयानी खिला कर अपनी बात सरकार तक पहुंचाने की कोशिश तो करती है, परन्तु जब तक सरकार को बढ़िया से दावत न खिलायेगी तो सरकार जामात की बातें कैसे सुनेगी?
असम सरकार का ‘चुनिंदा’ क्षेत्रों में हथियार लाइसेंस जारी करने का फैसला चिंताजनक :- जमाअत उपाध्यक्ष

एमपीएनएन संवाददाता
जामाते इस्लामी हिन्द भारत सरकार के गलत नीतियों का विरोध तो नहीं करती परन्तु पत्रकारों को हर महीने बिरयानी खिला कर अपनी बात सरकार तक पहुंचाने की कोशिश जरूर करती है, अब सवाल है कि जमात ए इस्लामी की बात कितने पत्रकार बिरयानी खाने बाद भारत सरकार तक पहुंचाते हैं, यह तो पत्रकार ही जाने? इसलिये की आज कल लगभग पत्रकार भारत सरकार का अपना बनने की होड़ में लगा रहता है, चाहे उसको सरकार से लाभ मिले या न मिले।

जबकि भारत सरकार की गलत नीतियों के कारण केवल एक समुदायें ही परेशान नही है, बल्कि हर समुदायें परेशान एवं असमंजस में है, बड़ी अजीब सी बात है, प्रशासन की निगरानी में आरएसएस द्वारा खुले आम घातक विदेशी राइफल और असलहे अक्सरहां गुजरात, मध्यप्रदेश उत्तरप्रदेश हिमाचल, उत्तराखंड और राजस्थान में बांटते हुए सोशल मेडिया पर देखा जाता रहा है, और दूसरे समुदायें से लाइसेंसी हत्यार भी जब्त कर लिए जाते हैं, इस पर किसी मुस्लिम संस्थाओ ने कभी आपत्ति नहीं जताई और न कहीं हो हल्ला किया। जबकि जमाते इस्लामी किसी भी हादसे पर पत्रकारों को अपनी बिनती सरकार तक पहुंचाने के लिए पत्रकारों को बिरयानी ज़रूर खिलाती है। और पत्रकार बिरयानी खा कर अंजना ॐ कश्यप, रुबिका लियाकत, काला उजला वाला चौधरी, सुरेश चौहान, बुझता दीपक चौर,,, के पास जा कर बिरयानी ढिकार ज़रूर सुनाते हैं आज जमात का बिरयानी खा कर आये हैं। बड़े चैनलों वालों ने शायेद कभी जामाते इस्लामी हिन्द की कोई सही बात अपने चैनलों पर चलाया होगा मुझे कभी याद नही है। 🤔🤔🤔🤔🤔 बहरहाल ,,,,,,
नई दिल्ली, 30 मई 2025:* जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मलिक मोतसिम खान ने असम सरकार के ‘कमजोर’ क्षेत्रों में हथियार लाइसेंस जारी करने के फैसले पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
मीडिया को जारी एक बयान में जमाअत उपाध्यक्ष ने कहा, “हम असम कैबिनेट द्वारा कथित रूप से राज्य के ‘असुरक्षित और दूरदराज’ क्षेत्रों में रहने वाले ‘मूल निवासियों और स्वदेशी भारतीय नागरिकों’ को हथियार लाइसेंस जारी करने के हालिया फैसले पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हैं। मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा द्वारा घोषित यह नीति एक प्रतिगामी और खतरनाक कदम प्रतीत होती है, जो सामाजिक तनाव को बढ़ा सकती है और कानून के शासन को कमजोर कर सकती है। नागरिकों को चुनिंदा रूप से हथियार देने का निर्णय, ऐसी नीति के इरादे और निहितार्थ पर गंभीर प्रश्न उठाता है। इन क्षेत्रों को ‘असुरक्षित’ घोषित करना तथा चुनिंदा समूहों को शस्त्र लाइसेंस देकर सशक्त बनाना, अल्पसंख्यक समुदायों को हाशिए पर डालने तथा उन्हें डराने के उद्देश्य से प्रतीत होता है।’मूल निवासियों’ को परिभाषित करने के लिए असम सरकार के मानदंड अस्पष्ट बने हुए हैं, जिससे शस्त्र लाइसेंस जारी करने में मनमाने और भेदभावपूर्ण व्यवहार को बढ़ावा मिलने की संभावना है।”
मलिक मोतसिम खान ने आगे कहा, “इस कदम को असम सरकार की हालिया कार्रवाइयों के व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जिसमें बंगाली भाषी मुसलमानों को बिना उचित प्रक्रिया के ‘विदेशी’ करार देकर हिरासत में लेना और अल्पसंख्यक समुदायों को असंगत रूप से प्रभावित करने वाली नीतियों को लागू करना शामिल है। इस तरह के उपायों से भय का माहौल पैदा होता है, पुलिस, बीएसएफ और अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसियों की भूमिका कमजोर होती है, तथा क्षेत्र में दिन-प्रतिदिन हिंसा में बढोतरी हो सकती है।
जमात-ए-इस्लामी हिंद असम सरकार से आग्रह करती है कि वह इस अत्यधिक प्रतिगामी निर्णय को तत्काल वापस ले तथा सुरक्षा संबंधी चिंताओं को दूर करने के लिए सभी हितधारकों के साथ समावेशी वार्ता करे तथा हिंसा भड़काने वाले या सामाजिक एवं सांप्रदायिक विभाजन को गहराने वाले उपाय न करे। हम नागरिक समाज संगठनों, मानवाधिकार निकायों और न्यायपालिका से इस निर्णय की जांच करने और यह सुनिश्चित करने का आह्वान करते हैं कि असम में सभी समुदायों के अधिकार और सुरक्षा सुरक्षित रहें।”

