जाति की जंजीरें: आज़ादी के बाद भी मानसिक गुलामी आस्था पेशाब तक पिला देती है, जाति पानी तक नहीं पीने…
यह सवाल उठाता है कि यदि आस्था किसी बाबा की पेशाब को ‘पवित्र’ मान सकती है, तो एक दलित का पानी ‘अपवित्र’ कैसे हो सकता है? यह कैसा धर्म है?
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