अंधेरों के ये जुगनू हैं उजालों पर नहीं चलते – डॉ क़ासिम खुरशीद
मुझे फूलों से बादल से हवा से चोट लगती है
अजब आलम है इस दिल का वफ़ा से चोट लगती है
वो जब से मर गया मुझ में न दस्तक है न बेचैनी
ख़मोशी है सदा मेरी सदा से चोट लगती है
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