डॉ. सत्यवान सौरभ की यह दोहा-श्रृंखला mpnan Mar 29, 2025 0 बटन दबे, हो काम सब, सुविधा मिले अपार। परिश्रम घटता जो गया, जड़ता दे उपहार।। मोबाइल की लत लगी, थककर बैठे मौन। इतना भी ना देखते, पास खड़ा है कौन।। Read More...
प्रसिद्धि की बैसाखी बनता साहित्य में चौर्यकर्म mpnan Mar 14, 2025 0 सभी लेखकों को नैतिक प्रथाओं को बनाए रखते हुए अपने काम को रचनात्मक और मौलिक बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। Read More...