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PriyankaSaurabh

“तकनीक के युग में मानसिक गुलामी”

जिन्हें खुद का मानसिक स्वास्थ्य संभालना नहीं आता, वे ‘मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट’ बन बैठे हैं। स्क्रॉल संस्कृति ने हमारी सोच को टुकड़ों में बाँट दिया है।
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*”भविष्य बताने वाले, वर्तमान से बेख़बर क्यों”*

इतने बड़े-बड़े भविष्य वक्ता, ऊपर वाले से सीधा संपर्क... फिर भी किसी बड़े हादसे की ख़बर तक नहीं मिलती! - अब समय है कि हम इस ‘पाखंडी भविष्यवाणी तंत्र’ की पड़ताल करें।
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प्रियंका सौरभ की हृदयविदारक कविता “”अधूरी उड़ान”

फटे बैग, जलती तस्वीरें, अधूरी चिट्ठियाँ, ज़मीन पर बिखरीं रह गईं सब इच्छाएँ मिट्ठियाँ। वो माँ जो कह रही थी "जाना, फोन करना", अब बस उसके आँसुओं में है "तेरा लौट आना"।
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आईएएस-आईपीएस अधिकारी और सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव

कुल मिलाकर, सोशल मीडिया पर सक्रियता के इस नए युग में, सरकारी अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारियों और व्यक्तिगत छवि के बीच एक संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता है, ताकि वे न केवल लोकप्रिय हों, बल्कि प्रभावी और जिम्मेदार प्रशासक भी बने रहें।
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अंततः देश में जाति जनगणना: प्रतिनिधित्व या पुनरुत्थान?

वंचित समुदायों के लिए जाति जनगणना केवल गिनती नहीं है, यह उनकी दृश्यता का सवाल है। अगर समाज में कोई वर्ग आर्थिक, शैक्षणिक और राजनीतिक रूप से पिछड़ा है, तो सबसे पहले यह जानना ज़रूरी है कि वह है कहां? कितना है? डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था —…
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*एचकेआरएनएल कर्मचारियों की दुर्दशा: सरकारी व्यवस्था का एक और छलावा* 

सरकार को तुगलकी फरमान वापस लेना चाहिए और इन कर्मचारियों के लिए नौकरी की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। यदि सरकार इस दिशा में कदम नहीं उठाती, तो यह हजारों परिवारों की आर्थिक स्थिति पर गहरा प्रभाव डालेगा। 
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