फिलिस्तीन–इजरायल संघर्ष की जड़ें – 6 – अमेरिका-ईरान युद्ध: नई वैश्विक व्यवस्था की आहट
खाड़ी में अमेरिकी सैन्य घेराबंदी, सुरक्षा समझौते और इजरायल की तकनीकी श्रेष्ठता का मुख्य उद्देश्य ईरान को कमजोर कर क्षेत्रीय वर्चस्व बनाए रखना है।
अमेरिकन यहूदी लॉबी और इजरायल ने अमेरिका को ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने के लिये दबावबनाया। उनका तर्क रहा कि कूटनीति केवल ईरान को परमाणु शक्ति बनने का अवसर देती है, जो अंततः साझा हितों के विरुद्ध होगी।
संम्बधित समाचार के लिये इसमे दिये गए लिंक पर क्लिक करें।http://www.ainaindianews.com
(फिलिस्तीन–इजरायल संघर्ष की जड़ें – 6)
अमेरिका-ईरान युद्ध: नई वैश्विक व्यवस्था की आहट।
विवेकानंद माथने

21वीं सदी का वैश्विक परिदृश्य एक गहरे संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, जहाँ दशकों पुरानी एक ध्रुवीय व्यवस्था कमजोर पड़ रही है और शक्ति संतुलन तेजी से बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ रहा है। अमेरिका- इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता संघर्ष इसी नई व्यवस्था की आहट है, जिसमें प्रभुत्व, संसाधनों और तकनीकी नियंत्रण की प्रतिस्पर्धा – लगातार तीव्र होती जा रही है। इस टकराव ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों, वैश्विक अर्थव्यवस्था और सूचना संप्रभुता को गहराई से प्रभावित किया है। अमेरिका के लिए यह संघर्ष केवल ईरान तक सीमित नहीं, बल्कि अपनी वैश्विक स्थिति बनाए रखने का प्रश्न है। वह आर्थिक प्रतिबंधों, सैन्य दबाव और कूटनीति के माध्यम से ईरान को नियंत्रित करने के
साथ-साथ उभरते वैकल्पिक गठबंधनों को भी कमजोर करना चाहता है। यह प्रयास उस व्यवस्था कोबनाए रखने का है, जिसमें अमेरिका केंद्रीय शक्ति रहा है।
इजरायल लंबे समय से ईरान को अपने अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा मानता है। उसकी रणनीति केवल परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने तक नहीं, बल्कि क्षेत्र में अपनी सैन्य श्रेष्ठता बनाए रखने पर केंद्रित है। वह ईरान समर्थित ‘प्रॉक्सी नेटवर्क’ को कमजोर कर क्षेत्रीय संतुलन अपने पक्ष में मोड़ना चाहता है।
दूसरी ओर, ईरान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बाहर निकलकर अपनी आर्थिक स्थिरता पुनः प्राप्त करना चाहता है। वह अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण बताता है और दावा करता है कि उसने कभी किसी पर पहले हमला नहीं किया। ईरान इजरायल के विरुद्ध अपनी सक्रियता को फिलिस्तीन के प्रति समर्थन के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। वह पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती देने वाले वैकल्पिक शक्ति केंद्र के रूप में उभरने की कोशिश कर रहा है। वर्ष 2024-25 में ईरान का चीन और रूस के साथ बढ़ता रणनीतिक सहयोग इस संघर्ष को वैश्विक आयाम देता है। चीन का बुनियादी ढांचे और ऊर्जा क्षेत्रों में निवेश तथा रूस का राजनीतिक समर्थन एक ऐसे गठजोड़ को जन्म देता है, जो अमेरिकी प्रभाव को संतुलित कर सकता है। इसके विपरीत, अमेरिका की कोशिश ईरान को आर्थिक घेराबंदी के जरिए चीन और रूस के प्रभाव क्षेत्र से बाहर निकालने की रही है।
2025 में सत्ता में वापसी के बाद डोनाल्ड ट्रम्प ने “MAGA” के तहत अमेरिकी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए आयात-निर्यात शुल्कों और ऊर्जा संसाधनों पर एकाधिकार की रणनीति अपनाई। वेनेजुएला के बाद अब ईरान के तेल भंडारों और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण की इस कोशिश ने क्षेत्रीय संघर्ष को वैश्विक आर्थिक प्रभुत्व की लड़ाई में बदल दिया है।
अमेरिकन यहूदी लॉबी और इजरायल ने अमेरिका को ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने के लिये दबावबनाया। उनका तर्क रहा कि कूटनीति केवल ईरान को परमाणु शक्ति बनने का अवसर देती है, जो अंततः साझा हितों के विरुद्ध होगी। खाड़ी में अमेरिकी सैन्य घेराबंदी, सुरक्षा समझौते और इजरायल की
तकनीकी श्रेष्ठता का मुख्य उद्देश्य ईरान को कमजोर कर क्षेत्रीय वर्चस्व बनाए रखना है।
जून 2025 में, जब ईरान के परमाणु कार्यक्रम और लंबी दूरी की मिसाइलों पर रोक लगाने हेतु समझौता अंतिम चरण में था, तभी इजरायल ने अचानक हमला कर कूटनीति की संभावनाओं को ध्वस्त कर दिया। इस 12 दिवसीय युद्ध में अमेरिका ने इजरायल का समर्थन करते हुए ईरान के परमाणु ठिकानों को अपना मुख्य निशाना बनाया।
इस सैन्य कार्रवाई के दस महीने बाद पुनः हुए अमेरिकी हमले में ईरान के शीर्ष नेतृत्व के साथ-साथनागरिक ठिकानों और स्कूलों को भी निशाना बनाया गया, जिसमें 168 मासूम बच्चों की मौत हुई। इस अमानवीय कृत्य ने जहाँ विश्व भर में आक्रोश पैदा किया और इसे वैश्विक स्तर पर युद्ध अपराध के रूप में देखा गया, वहीं नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमलों ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों की प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
युद्ध के कारण तेल की कीमतों में आए भारी उछाल ने दुनिया को यह अहसास करा दिया कि ऊर्जा के लिए दूसरों पर निर्भरता उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा का प्रश्न वैश्विक बहस के केंद्र में आ गया। वहीं, इस पूरे घटनाक्रम ने इजरायल की तकनीकी श्रेष्ठता के भ्रम को तोड़ते हुए अमेरिका को इस युद्ध मोर्चे पर विफल और असहाय सिद्ध कर दिया।
इस संघर्ष में पारंपरिक हथियारों के साथ-साथ डिजिटल औपनिवेशिक ताकतों ने ईरान के बुनियादी ढांचे और बैंकिंग प्रणाली को निष्प्रभावी बनाने के लिए साइबर हमलों का सहारा लिया। उन्नत एल्गोरिदम और तकनीकी प्रभुत्व के माध्यम से सूचना संप्रभुता को चुनौती दी गई। इससे यह स्पष्ट हो गया कि
आधुनिक विश्व व्यवस्था में केवल सैन्य ताकत ही नहीं, बल्कि तकनीकी और सूचना पर नियंत्रण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
युद्ध के दौरान कई देशों ने डॉलर के प्रभुत्व से हटकर वैकल्पिक मुद्राओं का उपयोग शुरू किया, जिससे अमेरिका की आर्थिक दबाव बनाने की क्षमता कमजोर हुई। इसी क्रम में ब्रिक्स (BRICS) के विस्तार और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों के प्रति बढ़ते झुकाव ने एक बहुध्रुवीय आर्थिक ढांचे को और मजबूत किया है, जो वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में परिवर्तन का संकेत है। इन स्थितियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की साख को कमजोर कर दिया है, जिसके बल पर वह दशकों से राज कर रहा था।
अमेरिका की एकतरफा नीति से नाटो के भीतर मतभेद उभर आए और कई सदस्य देशों ने युद्ध में भाग लेने से इनकार कर दिया। इससे नाटो की एकता कमजोर हुई। अमेरिका के भीतर भी जनता ने इस युद्ध का विरोध किया, जबकि ईरान की जनता अपने देश के समर्थन में एकजुट रही, जिससे अमेरिका
की वैश्विक छवि को गहरा आघात पहुंचा। यह संघर्ष एक बुनियादी प्रश्न खड़ा करता है कि अमेरिका को दुनिया का स्वयंभू रक्षक बनने का अधिकार किसने दिया। आज भी कई संप्रभु राष्ट्र अमेरिकी सामरिक और आर्थिक आतंक के साये में
जीने को मजबूर हैं। अमेरिका का यह भारी दबाव अन्य देशों को उसकी गलत नीतियों का विरोध करने से रोकता है, जो भय की राजनीति को प्रबल कर वैश्विक संतुलन को कमजोर कर रहा है।
शक्ति के बल पर कमज़ोरों को कुछ समय के लिए दबाया जा सकता है, लेकिन स्थायी शांति दमनकारी नीतियों या सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि केवल न्याय से ही प्राप्त की जा सकती है। यदि इस उभरती व्यवस्था को न्याय और समानता का आधार नहीं मिला, तो यह पुराने शोषणकारी प्रभुत्व का ही एक
नया रूप बनकर रह जाएगी। ऐसे में वर्तमान संघर्ष नई वैश्विक व्यवस्था के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।
भविष्य की विश्व व्यवस्था को दमनकारी वर्चस्व के बजाय न्यायपूर्ण सह-अस्तित्व की आवश्यकता है।
विश्व के राष्ट्रों को भय की राजनीति से बाहर निकलकर सहयोग और न्याय पर आधारित एक नया तंत्र विकसित करना होगा। तभी मानवता ऐसे विनाशकारी संघर्षों से मुक्त होकर एक सुरक्षित और समतामूलक भविष्य की ओर बढ़ पाएगी।
संम्बधित समाचार के लिये इसमे दिये गए लिंक पर क्लिक करें। http://www.youtube.com/@ainaindianews.com

