राष्ट्र वीरांगनाओ उठो कि धरा पुकार रही है
ऐ आगाजों उठो और अपनी तमाम शक्तयों को समेटकर चूस लो मेरी वाहनियों से रक्त की एक-एक बूंद को निचोंड़ डालो।
ऐ आवेगों !
जड़ता त्यागों और
जला दो दहकते आवेशों को
वरना बुझा दी जाएगीं
ये अंतर्नादें एक दिन
जहर बुझे रवायतों के तीरों से ।।

डॉ दर्शनी प्रिय –
भाषा अधिकारी
आकाशवाणी – नई दिल्ली
राष्ट्र वीरांगनाओ उठो कि धरा पुकार रही है

ऐ आगाजों उठो
और अपनी तमाम शक्तयों को समेटकर
चूस लो मेरी वाहनियों से
रक्त की एक-एक बूंद को
निचोंड़ डालो
वज्जा,मांस के रूधिरों में पनप रहे
विध्वशंक उत्तकों को
और तत्काल कर डालो
प्रयोग उनका वहां
जहां परम्पराओं की सड़ी-गली
कब्रगाह में
दफनाया जा रहा हो
सपनों की जीती जागती तस्वीर को
जहां बंदिशों के काले चिथड़े से
बांधी जा रही हो
आशा भरी आंख
जहां
रूढ़ियों की गर्म सलाखों से
दागी जा रही हो
लालसाओं की नग्न काया
अंधेरी नेमतों की
गहरी खाई में दबाया जा रहा हो
जहां उड़ने,जीने और खुलकर
कदम मांपने की जिजिविषा को।।
कर दो नेस्तनाबूत
उन पलित पायों को
जिनकी नींव में सांसें ले रही है
कुंठित मूल्यों की विकृत राक्षसी
तोड़ दो,भेद दो
उन कंटीले ताड़ों
उन शूलों को
जो रक्त पिपाशु बन
चीर रहें हों
शर्तों पर अपनी जिंदगी
जीने की तमन्ना को ।।
ऐं आगाजों ! ऐ आवेगों !
जड़ता त्यागों और
जला दो दहकते आवेशों को
वरना बुझा दी जाएगीं
ये अंतर्नादें एक दिन
जहर बुझे रवायतों के तीरों से ।।
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डॉ दर्शनी प्रिय

