भारत आर्थिक महाशक्ति की ओर अग्रसर
भारत कृषि प्रधान देश है। अतः भारत की आर्थिक शक्ति मुख्यतः कृषि शक्ति में ही निहित है।
हरित क्रांति ने कृषि अर्थव्यवस्था का कायापलट किया।जहां तक उद्योग का प्रश्न है तो आजादी के बाद से ही सरकार भारत में औद्योगिक विकास के लिए महत्वपूर्ण प्रयास करती रही है।
भारत आर्थिक महाशक्ति की ओर अग्रसर ।

लेखक – संजीव कुमार – मगध विश्विद्यालय के अर्थशास्त्र के शोधकर्ता हैं
सदियों की दास्तां के बाद भारत को जब 1947 में आजादी मिली तो उसे समय भारतीय अर्थव्यवस्था जर्जर स्थिति में थी ।अंग्रेजों ने इस देश का इस तरह से आर्थिक शोषण किया कि यहां की अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी , और देश आर्थिक दृष्टि से पिछड़ गया था। जिस वक्त आजादी मिली उस समय देश खाद्यानों का आयात करता था तथा और भी दूसरी चीजों के लिए अन्य देशों पर ही निर्भरता थी। बुनियादी सुविधाओं का बिल्कुल अभाव था। अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में भारत पिछड़ा हुआ था। पिछले 77 वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था ने इस तरह से प्रगति की है कि इसका कायापलट हो गया है। आज भारतीय अर्थव्यवस्था में केवल विकास के पद पर अग्रसर है बल्कि आर्थिक महाशक्ति बनती जा रही है। 

भारत आज अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों उद्योग ,कृषि तथा बुनियादी सुविधाओं आदि में समृद्ध की स्थिति में है। जहां तक कृषि का संबंध है अनाज उत्पादन के मामले में आज भारत न केवल आत्मनिर्भर है बल्कि निर्यात भी करता है। हरित क्रांति ने कृषि अर्थव्यवस्था का कायापलट किया। जहां तक उद्योग का प्रश्न है तो आजादी के बाद से ही सरकार भारत में औद्योगिक विकास के लिए महत्वपूर्ण प्रयास करती रही है। पर खासकर आर्थिक सुधारो के बाद औद्योगिक विकास में काफी तेजी आई है, तथा सकल घरेलू उत्पादन में इसका योगदान लगातार बढ़ता जा रहा है। परिवहन संचार तथा बिजली आदि बुनियादी सुविधाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।
सूचना प्रौद्योगिकी का तो कहना ही क्या है भारत इस संदर्भ में आज विश्व के सिर्फ देश में गिना जाने लगा है। इस प्रकार पिछले 77 वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप बिल्कुल बदल गया है किंतु आज अर्थव्यवस्था के समक्ष अनेक चुनौतियां भी है जिनका सामना करना होगा ताकि भारतीय अर्थव्यवस्था महाशक्ति का रूप ले सके। भारत कृषि प्रधान देश है। अतः भारत की आर्थिक शक्ति मुख्यतः कृषि शक्ति में ही निहित है। पहले भारत अनाज के मामले में आयात पर निर्भर रहता था आज विश्व की बड़ी कृषि शक्ति बनने की ओर अग्रसर है। कृषि का मानसून पर निर्भरता में कमी आई है। जिससे यह स्पष्ट होता है कि पिछले वर्षों में भारतीय कृषि ने विपरीत परिस्थितियों का मुकाबला करने की क्षमता प्राप्त कर ली है। तिलहन कपास तथा गाना जैसे व्यापारिक फसलों के उत्पादन में काफी वृद्धि हुई है दुग्ध उत्पादन में तो भारत के विश्व में पहला स्थान बना लिया है फल और सब्जी के मामले में भारत का विश्व में आज दूसरा स्थान है। यह चीन के बाद दुनिया में फलों और सब्जियों के उत्पादन में दूसरे स्थान पर है। राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड द्वारा प्रकाशित राष्ट्रीय बागवानी डेटाबेस (द्वितीय अग्रिम अनुमान) के अनुसार, 2019-20 के दौरान, भारत ने 99.07 मिलियन मीट्रिक टन फल और 191.77 मिलियन मीट्रिक टन सब्जियों का उत्पादन किया। गेहूं उत्पादन के में भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है। और प्रति हेक्टेयर उपज की दृष्टि से यह अमेरिका से आगे निकल गया है। अनाज उत्पादन और भंडारण के क्षेत्र में देश आज बहुत अच्छी स्थिति में है। कृषि क्षेत्र में टेक्नोलॉजी के प्रयोग में लगातार सुधार हो रहा है या भारतीय कृषि को शिखर पर ले जाने में सक्षम है। भारत दुनिया का छठ सबसे बड़ा निर्माता है जो वैश्विक विनिर्माण उत्पादन का 2.6% प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख उद्योग लोहा और इस्पात, वस्त्र, जूट,चीनी ,सीमेंट कागज, पेट्रोकेमिकल ,ऑटोमोबाइल ,सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) और बैंकिंग और बीमा है। आज भारत अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गए हैं परंतु सबसे अहम सवाल है कि भविष्य में भी कायम रह पाएगी।इसका सवाल यह उठता है कि क्या हमारी कृषि पर्यावरण एवं परिस्थितियों को बिना हानि पहुंचाए भविष्य में तीव्र गति से बढ़ती आबादी का भरण पोषण कर पाएगी ? इस प्रकार की अनेक चुनौतियों का हमें भविष्य में सामना करना पड़ेगा। इस प्रकार की अनेक चुनौतियों का हमें भविष्य में सामना करना होगा । पिछले 50 वर्ष में कृषि के क्षेत्र में हमारा जो शक्तिकरण हुआ है इसका जिक्र करने के बदले हमें भविष्य में और सचेत रहना होगा। जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है कृषि योग्य भूमि भी घट रही है। अतः भविष्य में कृषि उत्पादों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए उर्वरक शक्ति को कम किए बिना उत्पादन बढ़ाना होगा। स्वतंत्रता के बाद 77 वर्षों में भारत के औद्योगिक परिदृश्य में भारी बदलाव आया है । खासकर आर्थिक उदारीकरण के बाद उद्योग के क्षेत्र में नया आत्मविश्वास पैदा हुआ है। कोई भी अर्थव्यवस्था तब ही मजबूत मानी जाएगी जबकि वहां भी औद्योगिक ढांचा विकसित अवस्था में हो। सकल घरेलू उत्पादों में औद्योगिक क्षेत्र का हिस्सा धीरे-धीरे बढ़ रहा है। किसी देश का विकास उसकी आंतरिक शक्ति और प्रतिस्पर्धा क्षमता आदि उसकी संचार शक्ति पर बहुत हद तक निर्भर होती है। आज भारत अंतरिक्ष विज्ञान एवं उपग्रह संचार में एक पर एक उपलब्धियां हासिल कर रहा है। इस कर्ज में सतत पर्यटन सेल है कि जल्दी से जल्दी तकनीकी सहायता से पूरी तरह से छुटकारा पाकर इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करें। वर्तमान में भारत का गिरवी रख सोना विदेशी वापस छुड़ाकर लाना भी भारत को समृद्ध राष्ट्रों की श्रेणी में खड़ा कर दिया है। आज जितने भी विकसित देश है। वे सभी अपने विकास की प्रारंभिक काल में किसी न किसी रूप में विदेशी पूंजी की सहायता अवश्य ली है भारत के बचत दर का स्तर बहुत ही निम्न है। अतः निवेश में अपेक्षित विधि घरेलू साधनों से नहीं लिया जा सकता है। देश में तीव्र गति से औद्योगीकरण के लिए विदेशी पूंजी की आवश्यकता है। हमारे देश में प्राकृतिक संसाधनों का विशाल भंडार है। पर पूंजी के अभाव में इस साधनों का दोहन नहीं हो पता। वस्तुत विदेशी पूंजी अपने साथ आधुनिक तकनीक भी लाती है जो की उत्पादकता में भी सुधार लाती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को कुछ लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के रूप में देख रहे हैं पर हमें यह समझना चाहिए कि अब साम्राज्यवाद का जमाना नहीं रहा । 18 वीं शताब्दी की भारत और आज की भारत में कोई तुलना ही नहीं है। स्वदेशी की भावना में कोई दोष नहीं है पर इसे राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। बल्कि आर्थिक विकास में इसकी भूमिका पर हमारी नजर होनी चाहिए। इसके लिए स्वदेशी वस्तुओं की गुणवत्ता में सुधार लाना होगा। इसके अलावा उदारीकरण की संदर्भ में लोगों में जो ब्रह्म और संशय है। उसे दूर करने का प्रयास करना होगा। धैर्य, तप और ईमानदारी से अगर आगे बढ़ेंगे तो विकास के रास्ते में आने वाले तमाम बाधाएं खुद व खुद दूर होती चली जाएगी। और यह सच हो सकता है। अगर मौजूदा गति से कर चला रहा तो भारतीय अर्थव्यवस्था भविष्य में विश्व के मानचित्र पर आर्थिक महाशक्ति बनकर उभरेगा।
लेखक अर्थशास्त्र विभाग मगध विश्वविद्यालय बोधगया के शोधार्थी है। लेख में व्यक्त विचार निजी है।
परन्तु प्रश्न है – भारत एक कृषि प्रधान देश है – फिर भी 67?% आबादी भूमिहीन हैं। ऐसा क्यूँ? इसका जवाब न तो सरकार के पास है और न किसी महान पत्रकारों के पास है। यह दुर्भाग्य है कि भारत के आबादी क्षेत्र वाली भूमि और कुछ जंगल एवं पहाड़ी वाली भूमि, सरकार के सहयोग से देश के मात्र 14-15 प्रतिशत व्यक्तिविशेष के कब्जे में है।

