भारत की आज़ादी में बिहार के मुसलमानों की भूमिका इतिहास के भूले हुए पन्नों की दस्तावेजी पड़ताल।

 

भारत की आज़ादी में बिहार के मुसलमानों की भूमिका इतिहास के भूले हुए पन्नों की दस्तावेजी पड़ताल।

एस. ज़ेड. मलिक
भारत की स्वतंत्रता की कहानी को अक्सर कुछ प्रसिद्ध नामों और चुनिंदा घटनाओं तक सीमित कर दिया जाता है। बिहार की स्वतंत्रता-गाथा में भी यही समस्या दिखाई देती है। जबकि उपलब्ध सरकारी अभिलेख बताते हैं कि बिहार के मुसलमानों ने 1857 के विद्रोह से लेकर खिलाफत-असहयोग आंदोलन, चंपारण सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक अलग-अलग स्तरों पर ब्रिटिश शासन का प्रतिरोध किया।
इस योगदान का सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण भारत सरकार द्वारा प्रकाशित “Dictionary of Martyrs: India’s Freedom Struggle (1857–1947)” है। संस्कृति मंत्रालय और भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) के सहयोग से तैयार इस पांच-खंडीय परियोजना में लगभग 13,500 शहीदों का विवरण संकलित किया गया है। बिहार, झारखंड, बंगाल, ओडिशा और पूर्वोत्तर के कई राज्यों से संबंधित सामग्री Volume 4 में है।
इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि बिहार के मुसलमान स्वतंत्रता आंदोलन में केवल “सहयोगी” नहीं थे; अनेक लोग स्वयं आंदोलन के नेतृत्वकर्ता, सत्याग्रही, क्रांतिकारी, राजनीतिक कार्यकर्ता और शहीद थे।
1. पटना: पीर अली खान और 1857 की क्रांति
बिहार में मुस्लिम स्वतंत्रता-संघर्ष का सबसे सशक्त प्रतीक पीर अली खान हैं।
3 जुलाई 1857 को पटना में अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व पीर अली ने किया। बिहार सरकार के आधिकारिक इतिहास-स्रोत में भी दर्ज है कि पुस्तक-विक्रेता पीर अली के नेतृत्व में पटना में विद्रोह हुआ था।
पीर अली मूलतः आजमगढ़ क्षेत्र से पटना आए थे और पटना में पुस्तक की दुकान चलाते थे। 1857 में उनकी दुकान क्रांतिकारियों के संपर्क का केंद्र बन गई। उन्होंने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ लोगों को संगठित किया।
3 जुलाई के संघर्ष के बाद पीर अली गिरफ्तार कर लिये गये। अंग्रेजों ने उनसे उनके साथियों के बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने कथित रूप से अपने साथियों के नाम बताने से इनकार किया। 7 जुलाई 1857 को उन्हें फांसी दे दी गयी।
भारत सरकार के ऐतिहासिक स्रोतों में भी 1857 के बिहार के प्रमुख क्रांतिकारियों में पीर अली का नाम दर्ज है।

जिला: पटना : 1857 भूमिका: सशस्त्र विद्रोह के प्रमुख नेतृत्वकर्ता – परिणाम: अंग्रेजों द्वारा मृत्युदंड।
2. मुजफ्फरपुर: जमादार वारिस अली — 162 वर्ष बाद आधिकारिक पहचान बिहार के मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों में वारिस अली का मामला विशेष महत्व रखता है।
वारिस अली मुजफ्फरपुर जिले के बरूराज थाने में जमादार थे। 1857 के विद्रोह के दौरान उन्होंने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध क्रांतिकारियों का साथ दिया और विद्रोहियों से संपर्क बनाए रखा। ब्रिटिश सरकार को उनके पत्राचार और गतिविधियों पर संदेह हुआ तथा जून 1857 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 7 जुलाई 1857 को उन्हें फांसी दे दी गयी।
लेकिन उनकी शहादत को लंबे समय तक व्यापक आधिकारिक पहचान नहीं मिली।
2021 में एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सुधार हुआ। वारिस अली का नाम भारत सरकार की Dictionary of Martyrs में शामिल किया गया। इस तरह उन्हें आधिकारिक रूप से 1857 के शहीदों में दर्ज किया गया। रिपोर्टों के अनुसार, उनके नाम को शामिल किये जाने के बाद उन्हें तिरहुत क्षेत्र का पहला आधिकारिक रूप से दर्ज शहीद बताया गया।
यह घटना इस सवाल को जन्म देती है कि यदि एक व्यक्ति को अंग्रेजों ने 1857 में फांसी दे दी थी, लेकिन उसकी शहादत को भारत सरकार की आधिकारिक शहीद-सूची में शामिल होने में लगभग 162 वर्ष लग गये, तो ऐसे और कितने नाम अभी इतिहास के दस्तावेजों और सरकारी फाइलों में दबे हुए हैं?
जिला: मुजफ्फरपुर
क्षेत्र: तिरहुत
समय: 1857
पद: बरूराज थाने के जमादार
सजा: फांसी
आधिकारिक शहीद पहचान: 2021 में Dictionary of Martyrs में शामिल
3. पूर्वी चंपारण: नील के खिलाफ मुस्लिम किसान नेतृत्व
चंपारण आंदोलन को केवल 1917 में गांधीजी के आगमन से शुरू हुई घटना मानना अधूरा इतिहास होगा।
भारत सरकार के एक आधिकारिक PIB स्रोत के अनुसार, 1907 में शेख गुलाब और शीतल राय ने नील की खेती के शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई थी। बाद में गांधीजी ने इसी किसान समस्या को व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा।
यह तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि चंपारण के किसान प्रतिरोध में मुस्लिम किसानों और स्थानीय नेताओं की भूमिका गांधीजी के आगमन से पहले ही मौजूद थी।
जिला: चंपारण
प्रमुख नाम: शेख गुलाब
समय: 1907 के आसपास
भूमिका: नील की जबरन खेती के विरुद्ध किसान प्रतिरोध
4. पटना और सारण: मौलाना मजहरुल हक
मौलाना मजहरुल हक बिहार के उन मुस्लिम राष्ट्रवादियों में थे जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को केवल अंग्रेज-विरोध तक सीमित नहीं रखा, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता, राष्ट्रीय शिक्षा और स्वदेशी संस्थाओं के निर्माण को भी आंदोलन का हिस्सा बनाया।
उनका जन्म पटना जिले के बहपुरा में हुआ था। उन्होंने चंपारण सत्याग्रह, खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। शोध में उनके योगदान को विशेष रूप से राष्ट्रीय विद्यालयों, बिहार विद्यापीठ, साम्प्रदायिक सद्भाव और विदेशी संस्थाओं के बहिष्कार से जोड़ा गया है।
गांधीजी के असहयोग आंदोलन के दौर में उन्होंने सदाकत आश्रम को राष्ट्रीय आंदोलन के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित करने में भूमिका निभाई।
जिला: पटना
जन्मस्थान: बहपुरा
मुख्य दौर: 1916–1922
भूमिका: असहयोग, खिलाफत, राष्ट्रीय शिक्षा और हिंदू-मुस्लिम एकता
5. शाहाबाद/भोजपुर: प्रोफेसर अब्दुल बारी
बिहार के मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों की चर्चा प्रोफेसर अब्दुल बारी के बिना अधूरी है।
उनका संबंध शाहाबाद क्षेत्र, वर्तमान भोजपुर जिले से था। वे शिक्षाविद्, मजदूर नेता और कांग्रेस के प्रमुख राष्ट्रवादी नेता थे। उन्होंने बिहार, बंगाल और ओडिशा के मजदूरों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
टाटा वर्कर्स यूनियन के आधिकारिक इतिहास में भी अब्दुल बारी को स्वतंत्रता सेनानी और मजदूर नेता के रूप में दर्ज किया गया है।
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वे बिहार के सबसे सक्रिय मुस्लिम राष्ट्रवादी नेताओं में थे। ब्रिटिश प्रशासन की तैयार की गयी “A-list” में, जिसमें आंदोलन के महत्वपूर्ण नेताओं को रखा गया था, केवल तीन मुस्लिम नेताओं के नाम होने का उल्लेख शोध में मिलता है—प्रो. अब्दुल बारी, एस.एच. रज़ी (रज़ी अज़ीमाबादी) और जहानाबाद के रियासत करीम।
28 मार्च 1947 को फतुहा/खुसरुपुर के पास गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गयी। महात्मा गांधी उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुए थे। गांधीजी की विस्तृत कालक्रम सामग्री भी 29 मार्च 1947 को पटना में अब्दुल बारी के अंतिम संस्कार में उनकी उपस्थिति दर्ज करती है।
क्षेत्र: शाहाबाद/भोजपुर
भूमिका: स्वतंत्रता सेनानी, मजदूर नेता, कांग्रेस नेता
आंदोलन: असहयोग, सविनय अवज्ञा, भारत छोड़ो
मृत्यु: 28 मार्च 1947, खुसरुपुर के निकट
6. रोहतास/शाहाबाद: अब्दुल कय्यूम अंसारी
अब्दुल कय्यूम अंसारी का संबंध डेहरी-ऑन-सोन और शाहाबाद क्षेत्र से था। वे बहुत कम उम्र में ही स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गये थे।
भारत सरकार के डाक विभाग के आधिकारिक विवरण के अनुसार, वे 16 वर्ष की उम्र में असहयोग और खिलाफत आंदोलनों में भाग लेने के कारण ब्रिटिश शासन द्वारा जेल भेजे गये थे। बाद में वे साइमन कमीशन के विरोध में भी सक्रिय रहे।
उनका योगदान केवल अंग्रेज-विरोध तक सीमित नहीं था। उन्होंने मुस्लिम लीग की अलग राष्ट्र की मांग का विरोध किया और राष्ट्रीय एकता तथा धर्मनिरपेक्ष राजनीति का समर्थन किया।
1940 के दशक में उन्होंने शाहाबाद क्षेत्र में कांग्रेस आंदोलन को संगठित करने में भूमिका निभाई। उपलब्ध शोध में रियासत करीम और अब्दुल कय्यूम अंसारी को डेहरी तथा शाहाबाद के आंदोलन से जोड़ा गया है।
क्षेत्र: शाहाबाद/रोहतास
जन्मस्थान: डेहरी-ऑन-सोन
मुख्य आंदोलन: खिलाफत, असहयोग, साइमन कमीशन विरोध, भारत छोड़ो
विशेष योगदान: राष्ट्रीय एकता और दो-राष्ट्र सिद्धांत का विरोध
7. जहानाबाद: रियासत करीम
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में रियासत करीम का नाम विशेष रूप से सामने आता है।
ब्रिटिश प्रशासन की निगरानी सूची में उन्हें बिहार के उन मुस्लिम नेताओं में शामिल किया गया था जिन्हें आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाला माना गया था। शोध-स्रोतों में उनका संबंध जहानाबाद-काको क्षेत्र से बताया गया है।
यह तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ब्रिटिश प्रशासन के अपने रिकॉर्ड पर आधारित है—अर्थात् उनकी सक्रियता का उल्लेख केवल बाद की राजनीतिक स्मृति में नहीं बल्कि औपनिवेशिक प्रशासन की निगरानी व्यवस्था में भी मिलता है।
जिला: जहानाबाद
क्षेत्र: काको
समय: 1942
भूमिका: भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय राष्ट्रवादी नेता
8. गया: शाह मोहम्मद उमैर
1942 में बिहार के गया जिले में शाह मोहम्मद उमैर का नाम भी सामने आता है।
उपलब्ध शोध-सामग्री के अनुसार उन्हें 4 सितंबर 1942 को गिरफ्तार किया गया था। वे उन मुस्लिम राष्ट्रवादी नेताओं में थे जिन्होंने मुस्लिम लीग की तत्कालीन राजनीतिक लाइन से अलग जाकर कांग्रेस के भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन किया।
जिला: गया
समय: 1942
भूमिका: भारत छोड़ो आंदोलन
कार्रवाई: ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तारी
9. दरभंगा: मोहम्मद बिलात दरजी
भारत सरकार की Dictionary of Martyrs में 1942 के बिहार के अनेक स्थानीय शहीदों का विवरण दर्ज है।
दरभंगा जिले के रतनपुर क्षेत्र के मोहम्मद बिलात दरजी उनमें से एक हैं।
26 अगस्त 1942 को ब्रिटिश सैन्य दल की गतिविधि को रोकने के प्रयास में वे मारे गये। उसी घटना में प्रदीप शर्मा भी मारे गये। दोनों की स्मृति में आज रतनपुर में “शहीद चौक” का उल्लेख मिलता है। उपलब्ध स्रोत इस घटना को भारत छोड़ो आंदोलन से जोड़ते हैं।
यह घटना विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि यहां एक हिंदू और एक मुस्लिम ग्रामीण एक ही प्रतिरोध में ब्रिटिश सेना के सामने मारे गये।
जिला: दरभंगा
स्थान: रतनपुर
समय: 26 अगस्त 1942
नाम: मोहम्मद बिलात दरजी
मृत्यु: ब्रिटिश सैन्य कार्रवाई में
जिला-स्तर पर उपलब्ध प्रमाणों का संक्षिप्त मानचित्र
जिला/क्षेत्र
मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानी/शहीद
प्रमुख भूमिका
पटना
पीर अली खान
1857 का सशस्त्र विद्रोह
मुजफ्फरपुर/तिरहुत
वारिस अली – 1857 का विद्रोह; फांसी चंपारण।

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शेख गुलाब – नील-विरोधी किसान आंदोलन पटना
मौलाना मजहरुल हक – असहयोग, खिलाफत, चंपारण, राष्ट्रीय शिक्षा भोजपुर/शाहाबाद।

प्रो. अब्दुल बारी – असहयोग, मजदूर आंदोलन, भारत छोड़ो
रोहतास/डेहरी
अब्दुल कय्यूम अंसारी
असहयोग, खिलाफत, भारत छोड़ो
जहानाबाद
रियासत करीम
भारत छोड़ो आंदोलन
गया
शाह मोहम्मद उमैर
भारत छोड़ो आंदोलन; गिरफ्तारी
दरभंगा
मोहम्मद बिलात दरजी
1942; ब्रिटिश सैन्य कार्रवाई में मृत्यु
यह तालिका पूर्ण सूची नहीं है। यह उन नामों का प्रारंभिक, स्रोत-आधारित चयन है जिनके बारे में उपलब्ध सरकारी/शोध सामग्री में पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं। भारत सरकार के Dictionary of Martyrs के Volume 4 में बिहार से संबंधित इससे कहीं अधिक नाम हैं।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल: “किसे बाद में शहीद/स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा मिला?”
इस प्रश्न का सबसे स्पष्ट प्रमाणित उदाहरण वारिस अली हैं।
वे 1857 में अंग्रेजों द्वारा फांसी दिये जा चुके थे, लेकिन उनकी शहादत को आधिकारिक राष्ट्रीय शहीद-सूची में शामिल होने में दशकों लग गये। 2019 में प्रकाशित भारत सरकार की Dictionary of Martyrs में उनका नाम शामिल हुआ और 2021 में इस पर व्यापक सार्वजनिक रिपोर्टिंग हुई।
इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि:
वारिस अली को 2021 में पहली बार शहीद नहीं बनाया गया था; वे 1857 में ही शहीद हो चुके थे। 2021 में उनकी शहादत को आधिकारिक राष्ट्रीय दस्तावेजी मान्यता मिलने की खबर प्रमुखता से सामने आई।
इसी अंतर को समझना जरूरी है। “दर्जा मिला” और “शहादत को सरकारी दस्तावेज में दर्ज किया गया”—दोनों हमेशा समान अर्थ नहीं रखते।
क्या बिहार के मुसलमान 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से दूर थे?
यह एक ऐसा सवाल है जिस पर इतिहास को नारे के बजाय दस्तावेज से पढ़ना चाहिए।
सच यह है कि बिहार में मुस्लिम समाज का पूरा राजनीतिक समुदाय 1942 के आंदोलन में एकमत नहीं था। मुस्लिम लीग का एक बड़ा हिस्सा भारत छोड़ो आंदोलन से अलग रहा। उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री में बिहार प्रांतीय मुस्लिम लीग के आंदोलन से दूरी बनाने का उल्लेख मिलता है।
लेकिन इसी दस्तावेज में एक दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य भी दर्ज है—कई मुस्लिम और मोमिन नेता कांग्रेस के भारत छोड़ो आंदोलन का खुले तौर पर समर्थन कर रहे थे, जिनमें रियासत करीम, अब्दुल कय्यूम अंसारी, शाह मोहम्मद उमैर और प्रो. अब्दुल बारी जैसे नाम आते हैं।
इसलिए इतिहास का ईमानदार निष्कर्ष यह है:
न तो यह कहना सही है कि बिहार के सभी मुसलमान कांग्रेस के साथ थे, और न यह कि बिहार के मुसलमान स्वतंत्रता आंदोलन से दूर थे।
दोनों बातें ऐतिहासिक रिकॉर्ड के साथ न्याय नहीं करतीं।
निष्कर्ष: आज़ादी की कहानी में एक अधूरा अध्याय
बिहार के मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों का इतिहास तीन स्तरों पर दिखाई देता है—
पहला—1857 का प्रत्यक्ष विद्रोह:
पीर अली और वारिस अली जैसे लोग ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सीधे खड़े हुए और अपनी जान गंवाई।
दूसरा—गांधी युग का राष्ट्रवादी आंदोलन:
मजहरुल हक, शेख गुलाब जैसे लोगों ने किसान आंदोलन, राष्ट्रीय शिक्षा, खिलाफत, असहयोग और हिंदू-मुस्लिम एकता को स्वतंत्रता संघर्ष से जोड़ा।
तीसरा—1942 की अंतिम निर्णायक लड़ाई:
अब्दुल बारी, अब्दुल कय्यूम अंसारी, रियासत करीम, शाह मोहम्मद उमैर और मोहम्मद बिलात दरजी जैसे लोगों ने अलग-अलग क्षेत्रों में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया, जेल गये या ब्रिटिश दमन का सामना किया।
सबसे बड़ा सबक यह है कि भारत की आजादी किसी एक धर्म, जाति, भाषा या राजनीतिक संगठन की अकेली उपलब्धि नहीं थी।
बिहार की धरती पर पीर अली की फांसी से लेकर वारिस अली की आधिकारिक पहचान, शेख गुलाब के नील-विरोध से लेकर मजहरुल हक की राष्ट्रीय शिक्षा, अब्दुल बारी के मजदूर आंदोलन से लेकर 1942 के स्थानीय शहीदों तक—यह इतिहास बताता है कि स्वतंत्रता की लड़ाई में बिहार के मुसलमानों की भूमिका वास्तविक, बहुआयामी और दस्तावेजों में दर्ज है।
और वारिस अली की कहानी एक गंभीर सवाल छोड़ती है:
जब किसी व्यक्ति को अंग्रेजी हुकूमत 1857 में फांसी दे चुकी थी, तो स्वतंत्र भारत को उसकी शहादत को राष्ट्रीय स्तर पर दर्ज करने में इतना लंबा समय क्यों लगा?
यही सवाल हमें बिहार के उन दूसरे नामों की खोज की ओर ले जाता है जो शायद अभी भी सरकारी फाइलों, जिला गजट, जेल रजिस्टर, पुलिस रिकॉर्ड और परिवारों की स्मृतियों में मौजूद हैं।

ZEA
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