दुनियां की खबर लेने वाला – और समाज को ब खबर करने वाला अब ख़ुद ही बेखबर हो गया😭
एक रोशन कलम ख़ामोश हो गई - लहद के आगोश में अहबाबो ने उन्हें सुला दिया - डॉ. मोहम्मद गौहर साहब की याद में”
ऐ लहद अपनी मिट्टी से कह दे – दाग़ लगने न पाए कफ़न में – क्यूंकि आज ही हमने बदले हैं कपड़े – और आज ही हम नहाये हुए है।
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एक रोशन कलम ख़ामोश हो गई डॉ. मोहम्मद गौहर साहब की याद में”

ऐ लहद अपने फरिश्तों से कह दे, – यहां पर जबरन मैं लाया गया हूँ।

सबके इरादों की तहरीर ले कर – मैं दुनिया को ब खबर कर रहा था।।
न जाने कब अल्लाह को पसंद आ गया मैं – और अल्लाह के ज़रिए बुलाया गया हूँ ।
फरिश्ते आएं तो बता देना – संवार कर ज़रिए अपनो के, तेरे आगोश में सुलाया गया हूँ।। मुफक्कीर काकवी
सैयद आसिफ़ इमाम काकवी
आज उर्दू सहाफ़त का आसमान एक ऐसे सितारे से महरूम हो गया, जिसकी रौशनी ने न सिर्फ बिहार बल्कि पूरे मुल्क में अपनी चमक बिखेरी थी। डॉ. मोहम्मद गौहर साहब का इंतिक़ाल सिर्फ एक शख़्स की मौत नहीं, बल्कि एक पूरी तहज़ीब, एक सोच और एक मिशन के ठहर जाने का नाम है। रांची के ऑर्किड हॉस्पिटल से आई इस खबर ने जैसे दिलों को झकझोर कर रख दिया। सुबह की वह घड़ी, जो आम दिनों की तरह शुरू हुई थी, अचानक ग़म की स्याही में डूब गई। डॉ. गौहर साहब एक नाम नहीं, एक मुकम्मल इदारा थे। उनकी शख्सियत में इल्म की गहराई, अख़लाक़ की बुलंदी और फिक्र की पुख़्तगी साफ झलकती थी। एक इंजीनियर होने के बावजूद उन्होंने जिस तरह उर्दू पत्रकारिता को अपनी ज़िंदगी का मक़सद बनाया, वह अपने आप में एक मिसाल है। एम.टेक, एमए (जर्नलिज़्म एंड मास कम्युनिकेशन), पीएचडी, एमबीए और एमसीए जैसी ऊँची तालीम हासिल करने के बाद भी उनके अंदर जो सादगी और इंकिसारी थी, वह उन्हें औरों से जुदा करती थी।
रोज़नामा “तासीर” के चीफ़ एडिटर, प्रिंटर और पब्लिशर के तौर पर उन्होंने जो कारनामा अंजाम दिया, वह उर्दू सहाफ़त की तारीख़ में एक सुनहरा बाब है। एक ऐसा अख़बार जो एक साथ देश के 14 बड़े शहरों से शाया हो पटना, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, चेन्नई, रांची, लखनऊ और कई दूसरे अहम मराकिज़ ये कोई मामूली बात नहीं। पिछले 13 सालों से “तासीर” का मुसलसल शाया होना, उसकी मक़बूलियत और एतबार की सबसे बड़ी दलील है। आज जब अख़बार बंद हो रहे हैं, उस दौर में “तासीर” का इस तरह बुलंदी पर कायम रहना, सिर्फ डॉ. गौहर साहब की मेहनत, दीवानगी और दूरअंदेशी का नतीजा है। उनकी सहाफ़त का सबसे अहम पहलू यह था कि उन्होंने कभी “ज़र्द पत्रकारिता” को अपने करीब नहीं आने दिया। सच को सच और झूठ को झूठ कहने का जो हौसला उनकी कलम में था, वह आज के दौर में बहुत कम देखने को मिलता है। उन्होंने हमेशा सकारात्मक, रचनात्मक और समाज को जोड़ने वाली पत्रकारिता को बढ़ावा दिया। यही वजह है कि “तासीर” ने न सिर्फ खबरें दीं, बल्कि एक सोच भी दी, एक दिशा भी दी। डॉ. गौहर साहब का अदबी और इल्मी सफर भी उतना ही शानदार रहा। उनकी किताब “सदाए गौहर” उनके अफकार, उनके नजरिए और उनकी तहरीरी ताक़त का जीता-जागता सबूत है। उन्होंने मुल्क और दुनिया के कई हिस्सों में जाकर अपने खयालात पेश किए, सेमिनारों में शिरकत की और लोगों को अपनी बातों से मुतास्सिर किया। लगभग 35 मुल्कों का सफर करना, एक सहाफी के तौर पर इतना वसीअ तजुर्बा हासिल करना यह उन्हें अपने दौर का “इब्ने बतूता-ए-सहाफ़त” बना देता है। उनकी खिदमात का एतिराफ करते हुए उन्हें कई बड़े अवार्ड्स से नवाजा गया मुनशी प्रेमचंद अवार्ड, कौमी यकजहती अवार्ड, अनमोल रत्न अवार्ड, आफताब-ए-सहाफ़त और कई दीगर इज्ज़त अफजाई। लेकिन इन तमाम एज़ाज़ात के बावजूद उनके अंदर कभी गुरूर नहीं आया। वह हमेशा एक सादा, शरीफ और मिलनसार इंसान बने रहे। मेरे लिए, सैयद आसिफ़ इमाम काकवी के लिए, यह ग़म सिर्फ एक बड़े सहाफी की जुदाई का नहीं, बल्कि एक मुहब्बत करने वाले, हौसला देने वाले और रहनुमाई करने वाले शख्स के बिछड़ने का है। मुझे आज भी याद है, जब उन्होंने पहली बार मेरी तहरीरों को “तासीर” में जगह दी थी। वह सिर्फ एक एडिटर नहीं थे, बल्कि एक ऐसे उस्ताद थे जो नए कलमकारों को तराशते थे, उन्हें आगे बढ़ाते थे। उनकी हर बात में अपनापन होता था, हर लफ्ज़ में हौसला होता था। आज जब मैं उनकी यादों को कागज़ पर उतार रहा हूँ, तो दिल बार-बार भर आता है। यकीन नहीं होता कि अब वो फोन नहीं आएगा, वो आवाज़ नहीं सुनाई देगी, वो मुस्कुराहट नहीं दिखेगी। लेकिन यह भी हकीकत है कि ऐसे लोग कभी मरते नहीं वे अपनी तहरीरों, अपने काम और अपने असर के जरिए हमेशा जिंदा रहते हैं। तासीर” की पूरी टीम सैयद शमीम अहमद, रूहुल मतीन अहमद, इम्तियाज करीम, मोहम्मद नूर आलम, मुश्ताक खान, ओम प्रकाश सिंह और दूसरे तमाम साथियों के लिए यह वक्त एक बड़े इम्तिहान का है। लेकिन मुझे यकीन है कि डॉ. गौहर साहब की लगाई हुई यह शमा बुझने नहीं पाएगी। यह कारवां आगे बढ़ेगा, उनकी यादों और उनके उसूलों के साथ। डॉ. मोहम्मद गौहर साहब सच में अपनी जात में एक अंजुमन” थे। उन्होंने न सिर्फ एक अख़बार चलाया, बल्कि एक सोच पैदा की, एक मिशन दिया। उनका जाना एक ऐसा खला है जिसे भरना नामुमकिन है। आह आज उर्दू सहाफ़त रो रही है, कलम खामोश है, और दिल ग़म से भरा हुआ है अल्लाह तआला मरहूम की मग़फ़िरत फरमाए, उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मकाम अता करे, उनकी क़ब्र को नूर से भर दे, और उनके अहल-ए-ख़ाना को सब्र-ए-जमील अता फरमाए। आमीन। डॉ. गौहर साहब आप गए नहीं हैं आप हर उस सच्चे लफ़्ज़ में ज़िंदा हैं, जो इंसाफ़ और हक़ के लिए लिखा जाएगा…
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