नव-उपनिवेशवाद के क्रूर मकड़जाल में छटपटाता अफ़्रीका
अफ़्रीका और उसके लोगों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने वाले प्रमुख आख्यानों और रूढ़ियों को चुनौती देना।
इंफ्रास्ट्रक्चर पर कब्ज़ा — बंदरगाह, एयरपोर्ट, रेलवे — सिर्फ खदान से पोर्ट तक। गाँवों तक सड़क नहीं, स्कूलों में बिजली नहीं। सुरक्षा दो — प्राइवेट सिक्योरिटी कंपनियाँ, हथियार दो, विरोध को आतंकी घोषित करो।
नव-उपनिवेशवाद के क्रूर मकड़जाल में छटपटाता अफ़्रीका

सैयद मोहम्मद शाहिद इक़बाल
सबसे पहले इब्राहिम ट्रोरे द्वारा आग उगलते, अपने राष्ट्र के प्राण प्रतिष्ठा को क़ायम करने की व्याकुलता से ओतप्रोत, अफ़्रीकी आत्मसम्मान को स्थापित करने हेतु उद्घोषणा की ललक से भरपुर, नव उपनिवेशवाद के पोषक वर्तमान पूँजीवादी अर्थव्यवस्था को धिक्कारते हुए उद्गार भरे भाषण के कुछ अंश को पढ़िए, सुनिए महसूस कीजिए और अन्तरात्मा की आवाज में तनिक भी चिंगारी बची है तो सोचिए क्यूँ देना पड़ा इब्राहिम टरोरे को विश्व के अमानवीय एवं क्रूर महाशक्तियों के आंखों में आँखें डाल कर ऐसा निर्भीक भाषण ?

CNN, BBC, France 24. मैं तुम सबको देख रहा हूँ। मैं तुम्हारा हर झूठ रिकॉर्ड कर रहा हूँ। मैं तुम्हारी हर तोड़-मरोड़कर बताई गई बातों को संग्रहित कर रहा हूँ। मैं इब्राहिम ट्रोरे हूँ और आज मैं तुम्हारे नक़ाब उतार रहा हूँ। हाँ, तुमने सही सुना।
मैं, जिसे तुम एक नौजवान सैनिक शासक कहते हो, जिसे तुम एक खतरनाक उग्रपंथी कहते हो, जिसे तुम पश्चिम-विरोधी तानाशाह बताते हो, आज मैं तुम्हें सच्चाई बता रहा हूँ।
और इस बार तुम माइक बंद नहीं कर सकते।
इस बार तुम अपने कैमरे नहीं हटा सकते।
इस बार तुम्हारे संपादक इस भाषण को काट नहीं सकते क्योंकि वो दुनिया अब नहीं रही जिस पर तुम्हारा एकाधिकार था।
अब करोड़ों लोग ये बातें सुनेंगे, बिना तुम्हारे फ़िल्टर से गुज़रे,
बिना तुम्हारे झूठों में लिपटी, बिना तुम्हारी गंदगी में सनी।
मैं 34 साल का हूँ। मैंने अपनी ज़िंदगी के हर दिन तुम्हारे झूठों में बिताए।
बचपन में, मैं टीवी पर अफ़्रीका देखा करता था —
हमेशा वही तस्वीरें — मक्खियों से घिरे बच्चे, सूखी ज़मीनें, हथियार, मौत।
यही है अफ़्रीका, उन्होंने हमें बताया। अफ़्रीका ऐसा ही होता है, और हमने मान लिया।
हमें खुद पर शर्म आने लगी। हमें अपनी धरती से, अपने लोगों से शर्म आने लगी।
लेकिन फिर मैं बड़ा हुआ। मैंने पढ़ा, रिसर्च किया, सवाल किए —
और मुझे समझ आया कि जो अफ़्रीका तुमने हमें दिखाया, वो असली नहीं था।
जो कहानी तुमने हमें सुनाई, वो एक झूठ थी।
जो किस्मत तुमने हमारे लिए तय की, वो एक स्क्रिप्ट थी जो तुमने सालों पहले लिखी थी।
तुमने अफ़्रीका को कैसे दिखाया?
कैसे बेचा?
ऐसे जैसे हम इंसान ही न हों,
जैसे हम किसी जंगल के जानवर हों,
जैसे हम तुम्हारे इंतज़ार में पड़े हुए बेचारे हों।
हर दिन, हर घंटे, हर मिनट तुम्हारी स्क्रीन पर वही कहानी —
भूख, युद्ध, बीमारी, भ्रष्टाचार, आतंक, अराजकता।
जब कोई “अफ़्रीका” कहता है तो तुम्हारे शब्दकोश में और कोई शब्द ही नहीं होता —
ना उम्मीद, ना सफलता, ना विकास, ना प्रतिरोध, ना इज़्ज़त, ना गर्व, ना जीत।
तो मैं तुमसे पूछता हूँ —
New York Times, Washington Post, Guardian, Le Monde,
कभी अफ़्रीका की कामयाबियों को अपनी हेडलाइन बनाया?
कितनी बार तुमने रवांडा की टेक्नोलॉजी क्रांति के बारे में लिखा?
कितनी बार तुमने इथियोपिया के पुनर्वनीकरण प्रोजेक्ट को दिखाया?
कितनी बार तुमने बोत्सवाना की लोकतांत्रिक सफलता की तारीफ की?
कितनी बार तुमने केन्या की एंटरप्रेन्योरशिप की कहानी सुनाई?
नहीं, क्योंकि ये सब तुम्हारी स्क्रिप्ट में फिट नहीं बैठता।
तुम्हारे अफ़्रीका की कहानी में अफ़्रीका सफल नहीं हो सकता।
अगर अफ़्रीका को मदद की ज़रूरत नहीं है, तो तुम कैसे हस्तक्षेप करोगे?
अगर हम पिछड़े नहीं हैं, तो तुम हमें नीचा कैसे दिखाओगे?
क्या कभी तुम्हारे किसी संपादक, किसी रिपोर्टर ने ये सोचा है:
दुनिया की सबसे अमीर ज़मीनों पर बसे लोग गरीब क्यों हैं?
तो लीजिए, असल आंकड़े —
दुनिया का 70% कोबाल्ट अफ़्रीका के पास है —
तुम्हारे फोन, लैपटॉप, इलेक्ट्रिक कार इसके बिना नहीं चलेंगे —
ये कोबाल्ट कांगो से आता है, लेकिन वहाँ के लोग मोबाइल नहीं खरीद सकते।
दुनिया का 90% प्लैटिनम अफ़्रीका से —
साउथ अफ़्रीका से — और वहाँ के लोग बेरोज़गारी में डूबे हैं।
30% सोना — माली, बुर्किना फासो, घाना, तंज़ानिया —
सोना नदियों की तरह बहता है, लेकिन लोग गरीबी में तैरते हैं।
65% हीरे — बोत्सवाना, अंगोला, कांगो, सिएरा लियोन —
अरबों डॉलर के हीरे निकाले जाते हैं, लेकिन मज़दूर $1 रोज़ कमाते हैं।
35% यूरेनियम — नाइजर, नामीबिया, साउथ अफ़्रीका —
पेरिस की लाइटें हमारे यूरेनियम से जलती हैं, लेकिन हमारे गाँवों में बिजली नहीं।
और तुम पूछते हो — अफ़्रीका गरीब क्यों है?
सही सवाल ये है:
अफ़्रीका को इतना अमीर होते हुए गरीब कैसे बनाए रखा गया?
जवाब है — उपनिवेशवाद कभी खत्म नहीं हुआ, उसने बस रूप बदला।
पहले तुम हमारे देश पर कब्ज़ा करते थे,
अब तुम कंपनियाँ खोलते हो, पहले तुम ज़बरदस्ती लेते थे,
अब तुम समझौते करवाते हो , पहले तुम कोड़े से शासन करते थे,
अब तुम कर्ज़ देकर , अब मैं तुम्हें तारीख़, नाम, आंकड़े देकर बताता हूँ: –
Glenore, स्विट्ज़रलैंड की कंपनी, कोबाल्ट निकालती है कांगो से। 2022 में कमाई $256 बिलियन, टैक्स दिया कांगो को $500 मिलियन — यानी सिर्फ 0.2%। क्या यही न्याय है?
Rio Tinto, ब्रिटिश-ऑस्ट्रेलियन कंपनी, गिनी में बॉक्साइट निकालती है — 20 मिलियन टन हर साल। गिनी को क्या मिला? प्रदूषण और कैंसर।
Total Energies, फ्रेंच ऑयल कंपनी — अंगोला, नाइजीरिया, कांगो में तेल निकालती है — 2022 में मुनाफ़ा $36 बिलियन, लेकिन अफ़्रीका में सिर्फ गंदे पाइपलाइन।
Anglo American, साउथ अफ़्रीका से शुरू हुई, अब लंदन में — हीरे, प्लैटिनम, लोहा सब ले लिया, और छोड़ गए 60 लाख बेरोज़गार मजदूर।
ये तो सिर्फ बर्फ़ की नोक है। बाकी का क्या?
छुपे हुए सौदे, सीक्रेट बैंक अकाउंट्स, टैक्स की चालबाज़ियाँ —
हर साल $88 बिलियन अवैध रूप से अफ़्रीका से बाहर जाता है।
तुम $45 बिलियन की मदद लिखते हो —
पर कोई ये नहीं लिखता कि अफ़्रीका मदद पाने वाला नहीं है, देने वाला है।
तुम कैमरा ज़ूम करते हो सूजे हुए पेटों पर —
जबकि पर्दे के पीछे हर रोज़ टन के हिसाब से सोना, हीरे, तेल, यूरेनियम निकलता है।
ये है तुम्हारा सिस्टम :-
– भ्रष्टाचार फैलाओ — नेताओं को रिश्वत दो, विदेश में अकाउंट खोलो, उनकी औलादों को अपनी यूनिवर्सिटी में भेजो।
– सौदे करो — 50, 99 साल के कॉन्ट्रैक्ट, टैक्स से छूट, पर्यावरण और मजदूर नियमों की अनदेखी।
– इंफ्रास्ट्रक्चर पर कब्ज़ा — बंदरगाह, एयरपोर्ट, रेलवे — सिर्फ खदान से पोर्ट तक। गाँवों तक सड़क नहीं, स्कूलों में बिजली नहीं।
– सुरक्षा दो — प्राइवेट सिक्योरिटी कंपनियाँ, हथियार दो, विरोध को आतंकी घोषित करो।
– मीडिया को चुप कराओ — लोकल पत्रकार खरीदो, विरोधी आवाज़ें दबाओ, बाहर की मीडिया को सिर्फ अराजकता दिखाओ।
ये सिस्टम 100 साल से चल रहा है।
तुम इसे नहीं देखना चाहते, क्योंकि तुम खुद इसका हिस्सा हो।
यह था इब्राहिम ट्रोरे के भाषण का अंश । यह भाषण वर्तमान वैश्विक आर्थिक प्रणाली द्वारा उत्पन्न अन्याय और असमानता के खिलाफ एक शक्तिशाली प्रतिरोध का बयान है। इब्राहिम टरोरे के शब्द एक आह्वान हैं, जो अफ़्रीकियों को अपने अधिकारों और हितों के लिए खड़े होने और उन प्रणालियों और संरचनाओं को चुनौती देने के लिए प्रेरित करते हैं जो असमानता और अन्याय को बढ़ावा देते हैं। इब्राहिम टरोरे ने इस भाषण को देने के लिए कुछ संभावित कारणों में शामिल हैं:
नव-उपनिवेशवाद को बढ़ावा देने और अफ़्रीका की छवि को विकृत करने में मीडिया संस्थानों की भूमिका को उजागर करना।
अफ़्रीका और उसके लोगों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने वाले प्रमुख आख्यानों और रूढ़ियों को चुनौती देना।
अफ़्रीकी एजेंसी और आत्मनिर्णय को मज़बूत करना, और अफ़्रीका की जटिलताओं और चुनौतियों की अधिक सूक्ष्म और सटीक समझ को बढ़ावा देना।
अफ़्रीकियों को कार्रवाई करने और बदलाव की मांग करने के लिए प्रेरित करना, और उन प्रणालियों और संरचनाओं को चुनौती देना जो असमानता और अन्याय को बढ़ावा देते हैं।
कुल मिलाकर, इब्राहिम ट्रोरे का भाषण प्रतिरोध और सक्रियता का एक शक्तिशाली उदाहरण है, और अफ़्रीकियों को अपने अधिकारों और हितों के लिए खड़े होने के लिए एक आह्वान है।
अफ्रीका का औपनिवेशिक इतिहास 19वीं शताब्दी में “अफ्रीका के लिए हाथापाई” (Scramble for Africa) के साथ शुरू हुआ, जब 1884-85 के बर्लिन सम्मेलन में यूरोपीय शक्तियों ने महाद्वीप को आपस में बाँट लिया। 1870 तक अफ्रीका के केवल 10% भूभाग पर यूरोपीय नियंत्रण था, लेकिन 1914 तक यह बढ़कर 90% हो गया, जिसमें केवल इथियोपिया और लाइबेरिया स्वतंत्र रह पाए । यह विभाजन नव-उपनिवेशवाद की नींव बना, जो आज भी विभिन्न रूपों में जारी है।
नव-उपनिवेशवाद के समकालीन रूप
आर्थिक नियंत्रण और शोषण:-
मौद्रिक साम्राज्यवाद : फ्रांसीसी-भाषी अफ्रीकी देशों में CFA फ्रैंक व्यवस्था के माध्यम से फ्रांस ने इन देशों की मौद्रिक नीति पर नियंत्रण बनाए रखा। इन देशों को अपने विदेशी मुद्रा भंडार का 50% फ्रांसीसी ट्रेजरी में जमा करना अनिवार्य था ।
संसाधनों का शोषण: बुर्किना फासो जैसे देशों में सोने की खदानों पर विदेशी कंपनियों का कब्जा रहा, जहाँ 2024 में 57 टन सोना उत्पादित हुआ, लेकिन स्थानीय जनता को इसका लाभ नहीं मिला ।
*ऋण जाल: अफ्रीकी देशों का कुल ऋण 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो चुका है, जिस पर वार्षिक 163 अरब डॉलर का भुगतान करना पड़ता है। 2022 में 22 अफ्रीकी देशों ने स्वास्थ्य सेवाओं से अधिक धन ऋण चुकाने पर खर्च किया ।
सैन्य हस्तक्षेप और राजनीतिक अशांति:-
फ्रांस ने अपने पूर्व उपनिवेशों में सैन्य ठिकाने बनाए रखे और स्थानीय राजनीति में हस्तक्षेप किया। थॉमस संकारा जैसे क्रांतिकारी नेताओं को तख्तापलट में मार दिया गया । लीबिया में गृह-युद् फैला कर कर्नल गद्दाफी को जान से मारना फ्रांस की साजिश इसी नव उपनिवेशवाद का हिस्सा था। फ़्रांस इसी तरह अल्जीरिया ( अल- जा-ज़ायर ) की हुकूमत पर अप्रत्यक्ष रूप से कब्जा जमाए बैठा है।
2013 के बाद से अफ्रीका में कम से कम 32 सैन्य तख्तापलट या प्रयास हुए हैं, जिनमें से 2020 के बाद के पाँच सफल रहे (बुर्किना फासो, चाड, गिनी, माली और सूडान) ।
संस्थागत नियंत्रण
– अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक ने संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रमों (SAPs) के माध्यम से अफ्रीकी देशों की आर्थिक नीतियों को निर्देशित किया, जिससे सार्वजनिक सेवाओं में कटौती और निजीकरण को बढ़ावा मिला ।
– फ्रांसीसी-भाषी अफ्रीका में, फ्रांस ने “सहयोग समझौतों” के तहत इन देशों की विदेश नीति, रक्षा, शिक्षा और आर्थिक प्रबंधन पर नियंत्रण स्थापित किया ।
नव-उपनिवेशवाद का अमानवीय प्रभाव
1. आर्थिक विषमता
– अफ्रीका दुनिया के सबसे संसाधन-संपन्न महाद्वीपों में से एक है, लेकिन 2013 तक इसे दुनिया की सबसे गरीब आबादी वाला महाद्वीप माना जाता था ।
– विश्व बैंक के अनुसार, 2025 तक अधिकांश अफ्रीकी देश “मध्यम आय” वर्ग (प्रति व्यक्ति कम से कम $1,025) में पहुँच सकते हैं, लेकिन यह वृद्धि असमान रूप से वितरित है ।
2. मानवीय लागत
– स्वास्थ्य सेवाओं की उपेक्षा: अफ्रीका में नवजात मृत्यु दर प्रति 1000 जन्मों पर 72 है, जो 2030 के SDG लक्ष्य (25) से काफी दूर है ।
– शिक्षा और स्वास्थ्य में कटौती: ऋण भुगतान के दबाव में कई अफ्रीकी सरकारें सामाजिक क्षेत्रों के बजट में कटौती करने को मजबूर हैं ।
अफ्रीकी एकजुटता से पश्चिमी देशों की घबराहट के कारण
1. आर्थिक स्वायत्तता का खतरा
– अफ्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र (AfCFTA) जैसी पहलों से अंतर-अफ्रीकी व्यापार बढ़ने की उम्मीद है, जिससे 2022 तक 35 बिलियन डॉलर तक की वृद्धि हो सकती है । यह पश्चिमी कंपनियों के एकाधिकार को चुनौती देता है।
– बुर्किना फासो, माली और नाइजर ने एसोसिएशन ऑफ सहेल स्टेट्स (AES) बनाकर संसाधनों पर राष्ट्रीय नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया है ।

2. वैकल्पिक साझेदारियों का उदय
– अफ्रीकी संघ (AU) ने चीन में एक स्थायी मिशन स्थापित कर अपनी वैश्विक प्रोफ़ाइल मजबूत की है।
– रूस और चीन जैसे देशों के साथ बढ़ते संबंध पश्चिमी प्रभुत्व के लिए चुनौती बन रहे हैं।
3. संसाधनों तक पहुँच का जोखिम
– अफ्रीका दुनिया के कोबाल्ट, प्लैटिनम और दुर्लभ खनिजों का प्रमुख स्रोत है। एकजुट अफ्रीका इन संसाधनों के लिए उचित मूल्य की माँग कर सकता है।
– बुर्किना फासो ने सोना खदानों का राष्ट्रीयकरण किया और उससे प्राप्त आय को शिक्षा व स्वास्थ्य में निवेश किया ।
नव-उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष की दिशा
अफ्रीका में नव-उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है। बुर्किना फासो के कैप्टन इब्राहिम ट्राओरे जैसे नेताओं ने फ्रांसीसी सैन्य उपस्थिति को समाप्त करने और CFA फ्रैंक व्यवस्था से मुक्ति पाने में सफलता प्राप्त की है । हालाँकि, चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं:
1. आंतरिक कमजोरियाँ : सैन्य तख्तापलट, भ्रष्टाचार और संस्थागत कमजोरियाँ अफ्रीकी एकजुटता को कमजोर करती हैं ।
2. बाहरी दबाव : पश्चिमी देश नए आर्थिक और राजनीतिक तरीकों से अपना प्रभाव बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं।
3. वैकल्पिक विकास मॉडल : अफ्रीकी देशों को चीन या रूस पर निर्भरता के बजाय एक संतुलित और स्वायत्त विकास मॉडल विकसित करने की आवश्यकता है।
अफ्रीकी संघ जैसे संगठनों ने महाद्वीपीय एकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन वास्तविक आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए अभी एक लंबा संघर्ष शेष है। अफ्रीका की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करने, आंतरिक एकजुटता बनाए रखने और वैश्विक शक्ति संतुलन में स्मार्ट कूटनीति का प्रयोग करने में कितना सक्षम हो पाता है।
अफ्रीकी एकजुटता से पूंजीवादी देशों की घबराहट: कारण और प्रयास
अफ्रीकी महाद्वीप की एकजुटता पश्चिमी पूंजीवादी देशों और बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए हमेशा से चिंता का विषय रही है। इसके पीछे मुख्य कारण अफ्रीका के प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण और नव-उपनिवेशवादी हितों की रक्षा करना है। आइए इस विषय को विस्तार से समझते हैं:
अफ्रीकी एकजुटता से पश्चिमी देशों की घबराहट के मुख्य कारण:-
संसाधनों तक पहुंच का खतरा : अफ्रीका दुनिया के सबसे मूल्यवान खनिज संसाधनों (कोबाल्ट, प्लैटिनम, सोना, हीरे, तेल आदि) का भंडार है। एकजुट अफ्रीका इन संसाधनों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर सकता है और उचित मूल्य प्राप्त कर सकता है ।
नव-उपनिवेशवादी व्यवस्था को खतरा : पश्चिमी देशों ने औपनिवेशिक काल के बाद भी “फ्रंटियर कैपिटलिज्म” के माध्यम से अफ्रीका में आर्थिक नियंत्रण बनाए रखा है। अफ्रीकी एकता इस नियंत्रण को चुनौती दे सकती है ।
वैकल्पिक साझेदारियों का उदय : एकजुट अफ्रीका चीन, रूस या अन्य गैर-पश्चिमी शक्तियों के साथ मजबूत साझेदारी विकसित कर सकता है, जो पश्चिमी एकाधिकार को तोड़ देगा ।
आर्थिक स्वायत्तता का भय : अफ्रीकी संघ (AU) जैसे संगठनों के माध्यम से महाद्वीप की आर्थिक एकीकरण की पहल (जैसे अफ्रीकन कॉन्टिनेंटल फ्री ट्रेड एरिया – AfCFTA) पश्चिमी देशों को चिंतित करता है ।
पश्चिमी देशों द्वारा अफ्रीकी एकजुटता को कमजोर करने के प्रयास: उदाहरण सहित
1. ”फूट डालो और राज करो” की नीति :-
– फ्रांस ने अपने पूर्व उपनिवेशों (फ्रैंकोफोन अफ्रीका) में भाषा, मुद्रा (CFA फ्रैंक) और सैन्य समझौतों के माध्यम से विभाजनकारी नीतियां जारी रखी हैं ।
– अंगोला में मार्क्सवादी सरकार के खिलाफ दक्षिण अफ्रीका और ज़ैरे (अब DRC) को सैन्य हस्तक्षेप के लिए प्रोत्साहित किया गया ।
2. भ्रष्ट नेताओं को समर्थन : –
– केन्या में “एंग्लो लीजिंग” घोटाले में ब्रिटिश कंपनियों और केन्याई अधिकारियों की सांठगांठ ने देश को अरबों डॉलर का नुकसान पहुंचाया ।
– नाइजीरिया, कांगो जैसे देशों में संसाधनों के लूट के लिए स्थानीय अभिजात वर्ग को समर्थन दिया जाता है ।
3. आर्थिक निर्भरता बनाए रखना :-
– अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के ऋण शर्तें अफ्रीकी देशों को नीति निर्धारण में स्वायत्तता खोने के लिए मजबूर करती हैं ।
– कई अफ्रीकी देश अभी भी एक या दो वस्तुओं (जैसे नाइजीरिया में तेल) के निर्यात पर निर्भर हैं, जिससे वे वैश्विक बाजार में अस्थिरता के प्रति संवेदनशील हैं ।
4. सैन्य हस्तक्षेप और अशांति :-
– लीबिया में नाटो की कार्रवाई (2011) ने देश को अराजकता में धकेल दिया और पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैलाई ।
– सहेल क्षेत्र में फ्रांस के सैन्य अभियानों ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के नाम पर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बनाए रखी ।
5. सास्कृतिक एवं मीडिया प्रभुत्व :-
– पश्चिमी मीडिया अक्सर अफ्रीका को “असफल महाद्वीप” के रूप में चित्रित करता है, जिससे अफ्रीकी एकजुटता के प्रयासों को नैतिक आधार मिलने से रोका जाता है ।
– औपनिवेशिक भाषाओं (अंग्रेजी, फ्रेंच, पुर्तगाली) को बढ़ावा देकर स्थानीय भाषाओं और संस्कृतियों को कमजोर किया जाता है ।
अफ्रीकी प्रतिरोध और एकजुटता के उदाहरण
1. साहित्यिक एवं बौद्धिक प्रतिरोध :-
– हीनेमैन अफ्रीकन राइटर्स सीरीज (AWS) ने अफ्रीकी लेखकों जैसे चिनुआ अचेबे, फ्लोरा न्वापा, बेसी हेड आदि के माध्यम से औपनिवेशिक विरोधी विचारों को प्रसारित किया ।
– फ्रैंकोफोन अफ्रीका में अमिनाटा सो फॉल जैसी लेखिकाओं ने फ्रेंच भाषा में भी अफ्रीकी पहचान को मजबूत किया ।
2. आर्थिक एकीकरण के प्रयास : –
– अफ्रीकन कॉन्टिनेंटल फ्री ट्रेड एरिया (AfCFTA) की स्थापना (2018) ने अंतर-अफ्रीकी व्यापार बढ़ाने का प्रयास किया ।
– पूर्वी अफ्रीका समुदाय (EAC) और दक्षिणी अफ्रीकी विकास समुदाय (SADC) जैसे क्षेत्रीय संगठनों ने सहयोग बढ़ाया है ।
3. राजनीतिक एकजुटता :-
– अफ्रीकन यूनियन (AU) ने औपनिवेशिक सीमाओं को चुनौती देना शुरू किया है और महाद्वीपीय सुरक्षा व आर्थिक नीतियों पर समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया है ।
– नेल्सन मंडेला के नेतृत्व में दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ संघर्ष ने पूरे महाद्वीप को प्रेरित किया ।
पूंजीवादी देश अफ्रीकी एकजुटता से इसलिए घबराते हैं क्योंकि यह उनके नव-उपनिवेशवादी हितों और आर्थिक शोषण के मॉडल को चुनौती देती है। अफ्रीका के संसाधनों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए पश्चिमी शक्तियों ने विभाजनकारी नीतियों, भ्रष्ट नेताओं को समर्थन, आर्थिक निर्भरता और सैन्य हस्तक्षेप जैसे तरीकों का सहारा लिया है। हालांकि, अफ्रीकी लेखकों, बुद्धिजीवियों और राजनीतिक नेताओं ने इन चुनौतियों के बावजूद एकजुटता और आत्मनिर्भरता के मार्ग पर चलने का प्रयास जारी रखा है। भविष्य में अफ्रीकी देशों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे अपने आंतरिक भ्रष्टाचार और बाहरी हस्तक्षेपों से कितना प्रभावी ढंग से निपट पाते हैं।
अब आते हैं इब्राहिम ट्रोरे की तरफ़. नव औपनिवेशिक साम्राज्य क़ायम करके आर्थिक एवं संसाधन के लूट-खसोट में व्यस्त देशों को अफ़्रीकी आत्मसम्मान एवं एकता, परस्पर सहयोग एवं सामंजस्य के नायक बनकर उभर रहे इब्राहिम टरोरे एक दुश्मन की तरह खटकने लगे हैं इसलिए उन्होंने अपने इस घृणित काम के लिए मीडिया का सहारा लेना शुरू कर दिया है, इब्राहिम टरोरे के मुस्लिम होने ने यह काम और भी आसान कर दिया है। कहा जाने लगा है कि इब्राहिम टरोरे सैनिक तानाशाह और युवा उग्रपंथी है।
कौन हैं इब्राहिम ट्रोरे
इब्राहिम ट्रोरे बुर्किना फासो के एक सैन्य अधिकारी और पूर्व सैनिक हैं, जिन्होंने 2022 से बुर्किना फासो के अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया है। उनका जन्म 14 मार्च 1988 को हुआ था।
सैन्य पृष्ठभूमि : इब्राहिम ट्रोरे एक सैन्य अधिकारी हैं जिन्होंने अपने करियर में विभिन्न पदों पर कार्य किया है।
अंतरिम राष्ट्रपति : 2022 में, उन्होंने बुर्किना फासो के अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में पदभार संभाला। उन्होंने पश्चिमी देशों और नव-उपनिवेशवाद के खिलाफ आवाज उठाई है, और वह अफ़्रीकी संसाधनों के शोषण के खिलाफ बोलते हैं। बुर्किना फासो एक स्थलरुद्ध ( जैसे नेपाल, ऑस्ट्रिया हैं) land locked देश है , अर्थात् इस देश की अंतरराष्ट्रीय सीमा समुद्र के किसी भी हिस्से से नहीं लगती और यह दूसरे देशों से घिरा हुआ है। यह देश चरमपंथ एवं आतंकवाद से भी पीड़ित रहा है मगर इब्राहिम ट्रोरे द्वारा इस संकट से बुर्किना फासो को निकालने के उनके दृढ़ संकल्प वाले वायदे ने भी उनकी लोकप्रियता बढ़ायी है।

