GNLU–SILF रिपोर्ट में क्रिप्टो एसेट्स के नियमन के लिए विभिन्न मॉडल प्रस्तावित

*गुजरात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (GNLU) ने ‘Crypto-Assets in India: Assessing the Case for Regulation’ रिपोर्ट जारी की*

हाल के वर्षों में सरकार ने वर्चुअल डिजिटल एसेट्स पर कराधान तथा क्रिप्टो से जुड़े प्लेटफॉर्म्स को मनी लॉन्ड्रिंग रोधी नियमों के दायरे में लाने जैसे कुछ कदम उठाए हैं।

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गुजरात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (GNLU) ने ‘Crypto-Assets in India: Assessing the Case for Regulation’ रिपोर्ट जारी की*

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# GNLU–SILF रिपोर्ट में क्रिप्टो एसेट्स के नियमन के लिए विभिन्न मॉडल प्रस्तावित

एआईएन/संवादाता

नई दिल्ली, 10 मार्च 2026: गुजरात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (GNLU) ने सोसायटी ऑफ इंडियन लॉ फर्म्स (SILF) के सहयोग से मंगलवार को अपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट “Crypto-Assets in India: Assessing the Case for Regulation” को औपचारिक रूप से जारी किया। यह कार्यक्रम नई दिल्ली स्थित द ललित होटल में आयोजित किया गया। रिपोर्ट में भारत में क्रिप्टो एसेट्स को लेकर मौजूदा नीतिगत स्थिति का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है और एक ऐसे नियामक ढांचे की आवश्यकता बताई गई है जो नवाचार, निवेशक संरक्षण और वित्तीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रख सके।

रिपोर्ट के अनुसार डिजिटल एसेट्स के लिए नियम तय करने के मामले में भारत इस समय एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। हाल के वर्षों में सरकार ने वर्चुअल डिजिटल एसेट्स पर कराधान तथा क्रिप्टो से जुड़े प्लेटफॉर्म्स को मनी लॉन्ड्रिंग रोधी नियमों के दायरे में लाने जैसे कुछ कदम उठाए हैं। इसके बावजूद अभी तक इस क्षेत्र के लिए कोई स्पष्ट और अलग कानूनी ढांचा मौजूद नहीं है, जिसके कारण बाजार से जुड़े पक्षों के सामने नीतिगत अनिश्चितता बनी हुई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि तेजी से विकसित हो रहे वैश्विक वेब3 क्षेत्र में भारत की भागीदारी को मजबूत बनाए रखने के लिए एक स्पष्ट और व्यावहारिक नियामक व्यवस्था आवश्यक है।

रिपोर्ट में क्रिप्टो एसेट्स के लिए विभिन्न संभावित नियामक मॉडल का उल्लेख किया गया है। इसके साथ ही यह सुझाव भी दिया गया है कि जब तक एक व्यापक और मजबूत नियामक ढांचा तैयार नहीं हो जाता, तब तक सरकार की निगरानी में स्व-नियमन (Self Regulation) का एक मॉडल अपनाया जा सकता है।

 

रिपोर्ट के विमोचन कार्यक्रम में न्यायपालिका, विधि क्षेत्र, नीति विशेषज्ञों तथा डिजिटल एसेट उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों ने भाग लिया और भारत में क्रिप्टो विनियमन की दिशा पर अपने विचार साझा किए।

कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति हिमा कोहली भी उपस्थित रहीं। उन्होंने डिजिटल एसेट्स से जुड़े उभरते कानूनी और नियामक पहलुओं पर अपने विचार साझा किए। अन्य प्रमुख वक्ताओं में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम. आर. शाह, गुजरात हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवि त्रिपाठी, सोसायटी ऑफ इंडियन लॉ फर्म्स (SILF) के अध्यक्ष डॉ. ललित भसीन तथा गुजरात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के निदेशक प्रो. (डॉ.) एस. शांताकुमार शामिल रहे।

सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति हिमा कोहली ने कहा कि क्रिप्टो एसेट्स उस स्थिति को दर्शाते हैं जब तकनीकी नवाचार कानून बनाने की प्रक्रिया से तेज गति से आगे बढ़ता है। उन्होंने कहा कि आज वैश्विक क्रिप्टो बाजार का आकार 2.4 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो चुका है और भारत लाखों उपयोगकर्ताओं के साथ एक बड़े बाजार के रूप में उभरा है। इसलिए अब चर्चा इस बात पर केंद्रित होनी चाहिए कि ऐसी तकनीकों को किस प्रकार संतुलित तरीके से विनियमित किया जाए, ताकि वित्तीय स्थिरता और निवेशकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और साथ ही नवाचार को भी बढ़ावा मिल सके।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम. आर. शाह ने कहा कि जब लगभग 12 करोड़ भारतीय पहले ही क्रिप्टो एसेट्स में निवेश कर रहे हैं, तो इस क्षेत्र को नजरअंदाज करना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में ऐसी तकनीकों को रोकना न तो व्यावहारिक है और न ही प्रभावी। इसलिए आवश्यक है कि एक स्पष्ट नियामक ढांचा तैयार किया जाए, जो पारदर्शिता सुनिश्चित करे, दुरुपयोग को रोके और निवेशकों के हितों की रक्षा करे। उन्होंने यह भी कहा कि वर्चुअल डिजिटल एसेट्स से होने वाली आय पर कर लगाने का सरकार का निर्णय एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक कदम है, लेकिन इस क्षेत्र में व्यापक विनियमन की आवश्यकता बनी हुई है।

गुजरात हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवि त्रिपाठी ने कहा कि तेजी से बदलती तकनीक के दौर में संस्थानों के लिए यह आवश्यक है कि वे उभरती तकनीकों को समझें और उन पर गंभीर अध्ययन करें। उनके अनुसार अकादमिक संस्थान ऐसे विषयों पर शोध कर नीति निर्माताओं को महत्वपूर्ण सुझाव दे सकते हैं।

गुजरात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के निदेशक प्रो. (डॉ.) एस. शांताकुमार ने बताया कि यह विषय शुरुआत में कक्षा में एक चर्चा के रूप में सामने आया था, जो आगे चलकर एक राष्ट्रीय शोध पहल में बदल गया। उन्होंने कहा कि जब लगभग 12 करोड़ भारतीय बिना किसी स्पष्ट नियामक ढांचे के बावजूद क्रिप्टो एसेट्स से जुड़े हुए हैं, तब विश्वविद्यालय ने इस विषय पर विस्तृत अध्ययन करने का निर्णय लिया। बेंगलुरु, मुंबई और दिल्ली में डेवलपर्स, एक्सचेंजों, नियामकों और विधि विशेषज्ञों के साथ हुई चर्चाओं के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है। रिपोर्ट में पांच संभावित नियामक मॉडल प्रस्तुत किए गए हैं, ताकि नीति निर्माता विभिन्न विकल्पों पर विचार कर सकें।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं क्रिप्टो एसेट्स के लिए स्पष्ट नियम बना चुकी हैं। इसके विपरीत भारत में अभी तक व्यापक ढांचे का अभाव है, जिससे नियामक अनिश्चितता बनी रहती है और इसका प्रभाव निवेश, उद्योग के विकास तथा तकनीकी नवाचार पर पड़ सकता है।

रिपोर्ट में एक संतुलित नियामक दृष्टिकोण अपनाने की सिफारिश की गई है, जिसमें संस्थागत निगरानी के साथ विभिन्न नियामक संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित किया जाए। इसके साथ ही उपभोक्ता संरक्षण को मजबूत करने, वित्तीय जोखिमों को कम करने तथा भारत में ब्लॉकचेन आधारित नवाचार को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है।

इस प्रोजेक्ट का मार्गदर्शन एक सलाहकार बोर्ड द्वारा किया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम. आर. शाह, गुजरात हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवि त्रिपाठी, गुजरात सरकार के पूर्व मुख्य सचिव राजकुमार, गुजरात सरकार के पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव जे. पी. गुप्ता, पूर्व डीजीपी एवं एंटी करप्शन ब्यूरो के निदेशक डॉ. केशव कुमार, वरिष्ठ अधिवक्ता एन. एस. नप्पिनाई, आईआईएम विशाखापत्तनम में डॉ. बी. आर. आंबेडकर चेयर प्रोफेसर प्रो. विजया भास्कर मरिसेट्टी, ब्लॉकचेन, एआई, फिनटेक और कानून विशेषज्ञ तथा ILTES के संस्थापक प्रो. एम. के. भंडारी, ऑनलाइन विवाद समाधान विशेषज्ञ चित्तु नागराजन, अधिवक्ता मिताली गुप्ता, फ्लूगेलसॉफ्ट ग्रुप ऑफ कंपनियों के प्रबंध निदेशक कल्याणजीत हातिबारुआ तथा अभिनेता कबीर बेदी शामिल हैं।

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