Jantar Mantar शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन पर दिल्ली पुलिस की बर्बरतापूर्ण कार्रवाई – राहुल गांधी की भी हो गई पिटाई।
यह तस्वीर आज के लोकतंत्र से एक गंभीर सवाल पूछ रही है—क्या अपने अधिकारों, शिक्षा और न्याय की मांग करना अब अपराध हो गया है?
आज सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सरकार जनता की आवाज़ सुनेगी? क्या सरकार अपने मंत्रियों से इस्तीफा दिलवाएगी? क्या नैतिकता के आधार पर प्रधान मंत्री गृहमंत्री इस्तीफा देंगे?
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जंतर-मंतर पर पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री से इस्तीफा की मांग का प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर आरएसएस की पुलिस द्वारा बर्बरतापूर्ण लाठी चार्ज, फ्लैट गन और आंसू गैस छोड़ कर सैंकड़ो छात्र- छात्राओं को बुरी तरह घायल कर दिया जिनका दिल्ली के विभिन्न अस्पतालों में इलाज चल रहा है, इतने की मृत्य हो गई, दिल्ली पुलिस ने किसे कहाँ इलाज के लिये भेजा है दिल्ली पुलिस सही से जानकारी भी नही दे पा रही है। छात्राओं छात्रों के अभिभावक परेशान हैं कुछ आरएमएल, तो कुछ सफदरजंग अस्पताल, और कुछ का एम्स में इलाज चल रहा है। सिविल ड्रेस हांथों में डंडा लिए दिल्ली पुलिस के साथ खड़े युवा और पारा मिलिट्री फोर्स जिनके सीने पर नेम प्लेट भी नही और छात्र छात्राओं को गालियां बकते यूटुब्रो, पत्रकारों जब उन लोगो से पूछा तुम्हारा नेमप्लेट कहां, तुम्हारी आईडी कहां है, पत्रकारों को पीटने लगे, एक महिला सांसद को गला पकड़ लिया, महिला सांसद ने भी उस पुलिस वाले ज़बरदस्ती पकड़ के जब उसे आईडी मांगी तो जो आईडी दिखाया वह आईडी तो थी लेकिन जैसे टेम्परोरी ही था। दिल्ली पुलिस की नकली आईडी है। अब आंदोलकारियों का नारा बदल गया – मोदी तेरी तानाशाही नहीं चलेगी ,मोदी तेरी गुंडागर्दी नहीं चलेगी – मोदिशाह इस्तीफा दो धर्मेंद्र प्रधान को गिरफ्तार कराओ – आरएसएस को मिस्मार कराओ – तभी देश बच पायेगा, युवा तरक़्क़ी कर पायेगा। मोदिशाह आतंकवादियों का सरगना है, इसे गिरफ्तार कराओ देश बचाओ।



20 जुलाई 2026, दिल्ली का जंतर-मंतर — छात्रों पर लाठीचार्ज, हिंदुस्तान याद रखेगा!
एस. ज़ेड. मलिक
यह तस्वीर आज के लोकतंत्र से एक गंभीर सवाल पूछ रही है—क्या अपने अधिकारों, शिक्षा और न्याय की मांग करना अब अपराध हो गया है?
20 जुलाई 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों और नागरिकों पर पुलिस की बर्बरतापूर्ण कार्रवाई की तस्वीरें – — लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। जिन युवाओं के हाथों बेहतर शिक्षा रोजगार, कौशल होना चाहिए था आज उनके हाथों में सरकार हत्यार और दारू की बोतल पकड़वा कर उनके भविष्य को अंधकारमय बना रही है, उनके अंदर समुदाये विशेष के प्रति नफरत, द्वेष दुराग्रहित बना कर उन्हें मानसिक विक्षित और बंधुआ गुलाम बना कर उनसे दंगा, हत्या, लूट-पात करा रही है। जो बच्चे अपने भविष्य के सपने संवारने के लिए दिन रात मेहनत कर के NIIT, IAS, IPS, UPSC, जैसी प्रतियोगिता परीक्षा बैठने के लिए अपने खेत, बेच कर पैसे इकट्ठा कर जमा कर रहा है तो कोई लोन ले कर तो कोई अपने मां बहन बेटियों के आभूषण बेच कर या गिरवी रख कर पैसे जमा करता है इसलिये की उसकी बेरोजगारी खत्म होगी उसका भविष्य संवरेगा तो उसका परिवार सुखी होगा और देश मे नई प्रगति होगी, लेकिन उसके सारे सपनो को पलक झपकते ही शिक्षा माफिया उसके सारे सपनो को धराशायी कर देते हैं – पेपर लीक हो जाता है और सभी छात्र छात्राओं शिक्षा मांफीयाओं के शिकार हो जाते हैं, छात्रों की मेहनत और पैसा दोनो ही डूब जाता है, और न तो सरकार उसकी ज़िम्मीदारी लेती है और न तो सरकार शिक्षा मांफीयाओं पर कोई कार्रवाई ही करती है न सरकार की तरफ से छात्रों को कोई मदद ही मिलती है, बल्कि सरकार उनकी परीक्षा भी रद्द कर उनका भविष्य भी अंधकारमये बना देती है _ फिर ऐसे में छात्र कहां जाएं, किस्से फ़रयाद करें, छात्रों के पास विकल्प क्या बचता है??? सिवा सब्र या संघर्ष के – छात्र पिछले 6 महीने से सब्र करते हुए सरकार मांग करते आ रहे थे कि केंद्र सरकार पेपर लीक मामले का कोई समाधान निकाले, मांफीयाओं को गिरफ्तार करे, और बिना फीस लिए दुबारा छात्रों को परीक्षा देने दिया जाए, जिन छात्रों ने आत्महत्या किया उन छात्र छात्राओं के अभिभावकों को एक एक करोड़ का मुआवजा दिया जाए लेकिन सरकार इन छात्रों की मांग को अनसुना कर के बल्कि मांफीयाओं को बचाने में लग गई – पेपर लीक मामले का सरगना केंद्र सरकार का शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का ही नाम सुर्खियों में आ गया, परन्तु केंद्र सरकार धर्मेंद्र प्रधान को बचाने में लगी हुई है, अब ऐसे में छात्र छात्राओं, अभ्भावकों ने धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और उसकी गिरफ्तारी तथा अपने अधिकारों की मांग तेज़ कर दी है अब यह प्रदर्शन आंदोलन का रूप ले चुका है, इस आंदोलन में देश के हर समाजिक सन्गठन चाहे वह किसानों का हो, सिखों का हो या मजदूरों का हो सभी छात्रों के समर्थन में देश के कोने कोने से दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंच रहे हैं, अब इन छात्रों के स्पोर्ट में देश के हर बुद्धिजीवी वर्ग सामने आ गया है, यहां तक आंतरिक्ष का सफर तय करने वाली पहली भारतीय नारी सुनीता विलियम्स भी इस पर्दर्शन में शामिल हो गईं इनके अलावा बॉलीवुड के कलाकार भी इस आंदोलन का हिसा बन गए है अब उनकी आंखों में एक मात्र रास्ता संघर्ष का दिखाई दे रहा है। अब सिवा यह की सरकार या तो व्यावस्था ठीक करे या सरकार का सम्पूर्ण कैबिनेट इस्तीफा दे कर सरकार ही बदल दे।


सच्चाई यह है कि नई दिल्ली के जंतर- मंतर पर, छात्र छात्राओं की आवाज़ बन कर जब दीपिके ने प्रदर्शन शुरू किया था तब उनका साथ देने शिक्षाविद सोनू वांगचुक, ने भी गांधीवादी रूप शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने के लिए धरने पर भूख हड़ताल पर बैठ गये थे, तो उनका साथ देने उनकी स्थिति जाने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय थालापती भी आये, और साउथ फ़िल्म के वरिष्ठ कलाकार प्रकाश राज भी साथ हो लिय्ये वह आज भी जंतरमंतर पर मौजूद हैं, सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था कि अचानक धरना स्थल पर मलबा से भरा म्युनिसिपल की ट्रक लगा दी गई तभी शोसल मीडिया वाले सवाल उठाने लगे “आखिर यह ट्रक यहां क्यूँ लगाया गया, प्रदर्शनकारियों के साथ मनुवादी सरकार की बंधुआ गुलाम पुलिस द्वारा अचानक बल प्रयोग किया गया। यदि किसी लोकतांत्रिक देश में नागरिकों की आवाज़ को सुनने के बजाय लाठी और पुलिस बल का सहारा लिया जाता है, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत है।

जहां एक ओर जंतर मंतर पर अन्य संगठनों का प्रदर्शन चल रहा था सारी प्रशासनिक व्यावस्था इधर लगी हुई थी वहीं राहुल गांधी प्रियंका गांधी दो भाई बहन अपने दल बल के साथ मौके का फायदा उठाते हुए प्रधानमंत्री के आवास जा पहुंचे, और प्रधामनंत्री के आवास के के गेट के सामने धरने पर बैठ गए, वहां नारा और सलोगन शुरू हो गया, अब पुलिस अधिकारी परेशान एसपीजी परेशान, पीएमओ सचिव आये समझाने, राहुल नहीं माने प्रधानमंत्री से इस्तीफे की मांग करते रहे, फिर ग्रह-सचिव आये राहुल नहीं माने जबरन मोदी पुलिस को राहुल पर कार्रवाई करनी पड़ी, मोदी पुलिस राहुल गांधी के सीने पर चहड़ गई, राहुल के नाक से खून आ गया, फिरभी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी नही माने तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं और मोदीपुलिस के बीच काफी देर तक रगड़ा रगड़ी होती रही फिर दोनों को मोदी की पुलिस ने बलपूर्वक पुलिस वेन पर लाद के पीएम हाउस गेट से उठा कर ले जाया गया और 24 अकबर रोड ले जा कर छोड़ा गया।





2014 के बाद से केंद्र की नीतियों और शासन व्यवस्था को लेकर विपक्षी दलों, सामाजिक संगठनों, किसानों, छात्रों और नागरिक समूहों द्वारा समय-समय पर गंभीर सवाल उठाए जाते रहे हैं। शिक्षा, रोजगार, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, मीडिया की भूमिका और सरकारी एजेंसियों के कथित राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर भी लगातार बहस होती रही है। लेकिन हर समय सरकार ने अपनी दमनकारी नीतियों के तहत सभी सवालों की अनदेखी करती रही, बुजुर्गों की एक ठोंस और प्रचलित कहावत है, पाप का घड़ा भर जाता है तो उबाल आ ही जाता है या घड़ा फुट जाता है। आज सरकार के पाप का घड़ा भर कर उबल गया है।
आज सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सरकार जनता की आवाज़ सुनेगी? क्या सरकार अपने मंत्रियों से इस्तीफा दिलवाएगी? क्या सरकार नैतिकता के आधार पर प्रधान मंत्री गृहमंत्री इस्तीफा देंगे?
क्या छात्रों को शिक्षा और रोजगार के अवसर मिलेंगे?
क्या किसानों, मजदूरों और आम नागरिकों की समस्याओं का समाधान संवाद से किया जाएगा?
और क्या लोकतंत्र में असहमति रखने वाले नागरिकों को अपनी बात शांतिपूर्ण ढंग से रखने का पूरा अधिकार मिलेगा?
लोकतंत्र में सरकार जनता से बड़ी नहीं होती। जनता की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता।
इस देश की बिडम्बना कहे या दुर्भगय !!
इस आंदोलन में भरष्टाचारी दुराचारी दुष्कर्मी और बलात्कारी, गौरक्षक, बजरंग दल आरएसएस के मुस्टंडे, हिदू रक्षा वाहिनी, हिन्दू राष्ट्र के अनुयायी, मन्दिरमाफ़िया, शराब माफिया – सेक्सरैकेट माफिया ऐसे मनुवादी हिन्दू संगठने सरकार के साथ खड़े हैं। आंदोलन समाप्त करने के लिए सरकार की मनुवादी पुलिस का सहयोग कर रहे हैं। आंदोलनकारियों को गालियां बक रहे हैं, मीडिया के सामने अश्लील हरकतें करते हुए भी देखे जा सकते हैं, आज इस देश मे दो विचार धारा के मानने वाले काम कर रहे हैं – एक सकारात्मक दूसरे नाकारात्मक, एक सार्थक एक निनार्थक। एक देश को बर्बादी की दिशा में ले जाने का काम कर रही है, तो दूसरा देश को शिक्षित और कौशल विकास की दिशा ले जाने का प्रयास कर रहा है। जो देश को शिक्षा और कौशल विकास की दिशा में छात्राओं युवाओं को जोड़ कर देश की उन्नति चाहता है, तो दूसरी ओर मनुवादी संगठन और माफिया सँगठित हो कर देश की जनता को जहां लूट रहे है वहीं देश की उन्नति के मार्ग को भी अवरुद्ध कर रहे हैं,
जंतर-मंतर की यह तस्वीर आने वाली पीढ़ियों से एक सवाल करेगी—जब छात्र अपने अधिकारों के लिए सड़क पर थे, तब लोकतंत्र उनके साथ खड़ा था या सत्ता के साथ?
20 जुलाई 2026 — दिल्ली का जंतर-मंतर।
छात्रों पर लाठीचार्ज।
यह तस्वीर इतिहास के पन्नों में दर्ज रहेगी।
याद रखेगा हिंदुस्तान!
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