Jantar Mantar छात्र आंदोलन दिल्ली पुलिस की बर्बरतापूर्ण कार्रवाई – राहुल गांधी की भी हो गई पिटाई।
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जंतर-मंतर पर पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री से इस्तीफा की मांग का प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर आरएसएस की पुलिस द्वारा बर्बरतापूर्ण लाठी चार्ज, फ्लैट गन और आंसू गैस छोड़ कर सैंकड़ो छात्र- छात्राओं को बुरी तरह घायल कर दिया जिनका दिल्ली के विभिन्न अस्पतालों में इलाज चल रहा है, इतने की मृत्य हो गई, दिल्ली पुलिस ने किसे कहाँ इलाज के भेजा है दिल्ली पुलिस सही से जानकारी भी नही दे पा रही है। छात्राओं छात्रों के अभिभावक परेशान हैं कुछ आरएमएल, तो कुछ सफदरजंग अस्पताल, और कुछ का एम्स में इलाज चल रहा है। का दिल्ली पुलिस की नकली आईडी है। मोदिशाह को गिरफ्तार कराओ – आरएसएस को मिस्मार कराओ – तभी देश बच पायेगा, युवा तरक़्क़ी कर पायेगा। मोदिशाह आतंकवादियों का सरगना है, इसे गिरफ्तार कराओ देश बचाओ।
20 जुलाई 2026, दिल्ली का जंतर-मंतर — छात्रों पर लाठीचार्ज, हिंदुस्तान याद रखेगा!
एस. ज़ेड. मलिक

यह तस्वीर आज के लोकतंत्र से एक गंभीर सवाल पूछ रही है—क्या अपने अधिकारों, शिक्षा और न्याय की मांग करना अब अपराध हो गया है?
20 जुलाई 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों और नागरिकों पर पुलिस कार्रवाई की तस्वीरें – — लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। जिन युवाओं के हाथों बेहतर शिक्षा रोजगार, कौशल होना चाहिए था आज उनके हाथों में सरकार हत्यार और दारू की बोतल पकड़वा कर उनके भविष्य को अंधकारमय बना रही है, उनके अंदर समुदाये विशेष के प्रति नफरत, द्वेष दुराग्रहित बना कर उन्हें मानसिक विक्षित और बंधुआ गुलाम बना कर उनसे दंगा, हत्या, लूट-पात करा रही है। जो बच्चे अपने भविष्य के सपने संवारने के लिए दिन रात मेहनत कर के NIIT, IAS, IPS, UPSC, जैसी परीक्षा पास करने के लिए अपने खेत, बेच कर पैसे इकट्ठा कर प्रतियोगिता परीक्षा देने के लिए जमा कर रहा है तो कोई लोन ले कर तो कोई एप्ने मां बहन बेटियों के आभूषण बेच कर या गिरवी रख कर पैसे जमा करता है और शिक्षा मांफीयाओं का वे सब छात्र शिकार हो जाते हैं, पेपर लीक हो जाता है, छात्रों की मेहनत और पैसा दोनो ही डूब जाता है, और न सरकार की तरफ से कोई मदद ही मिलती है, बल्कि सरकार उनपर जुर्माना तो लगाती ही है साथ मे उनका परीक्षा भी समाप्त कर उनका भविष्य भी अंधकारमये बना देती है फिर ऐसे में छात्र कहां जाएं, किस्से फ़रयाद करें, छात्रों के पास विकल्प क्या बचता है??? सिवा सब्र या संघर्ष के – आज अपने अधिकारों की मांग के लिए उनकी आंखों में एक मात्र रास्ता संघर्ष का दिखाई दे रहा है। अब सिवा यह की सरकार या तो व्यावस्था ठीक करे या सरकार का सम्पूर्ण कैबिनेट इस्तीफा दे कर सरकार ही बदल दे।
सच्चाई यह है कि छात्र छात्राएं शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज़ उठाने वाले प्रदर्शनकारियों के साथ मनुवादी सरकार की बंधुआ गुलाम पुलिस द्वारा अचानक बल प्रयोग किया गया। यदि किसी लोकतांत्रिक देश में नागरिकों की आवाज़ को सुनने के बजाय लाठी और पुलिस बल का सहारा लिया जाता है, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत है।
2014 के बाद से केंद्र की नीतियों और शासन व्यवस्था को लेकर विपक्षी दलों, सामाजिक संगठनों, किसानों, छात्रों और नागरिक समूहों द्वारा समय-समय पर गंभीर सवाल उठाए जाते रहे हैं। शिक्षा, रोजगार, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, मीडिया की भूमिका और सरकारी एजेंसियों के कथित राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर भी लगातार बहस होती रही है। लेकिन हर समय सरकार ने अपनी दमनकारी नीतियों के तहत सभी सवालों की अनदेखी करती रही, बुजुर्गों एक ठोंस और प्रचलित कहावत है, पाप का घड़ा भर जाता है तो उबाल आ ही जाता है या घड़ा फुट जाता है। आज सरकार के पाप का घड़ा भर कर उबल गया है।
आज सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सरकार जनता की आवाज़ सुनेगी? क्या सरकार अपने मंत्रियों से इस्तीफा दिलवाएगी? क्या सरकार नैतिकता के आधार पर प्रधान मंत्री गृहमंत्री इस्तीफा देंगे?
क्या छात्रों को शिक्षा और रोजगार के अवसर मिलेंगे?
क्या किसानों, मजदूरों और आम नागरिकों की समस्याओं का समाधान संवाद से किया जाएगा?
और क्या लोकतंत्र में असहमति रखने वाले नागरिकों को अपनी बात शांतिपूर्ण ढंग से रखने का पूरा अधिकार मिलेगा?
लोकतंत्र में सरकार जनता से बड़ी नहीं होती। जनता की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता।
जंतर-मंतर की यह तस्वीर आने वाली पीढ़ियों से एक सवाल करेगी—जब छात्र अपने अधिकारों के लिए सड़क पर थे, तब लोकतंत्र उनके साथ खड़ा था या सत्ता के साथ?
20 जुलाई 2026 — दिल्ली का जंतर-मंतर।
छात्रों पर लाठीचार्ज।
यह तस्वीर इतिहास के पन्नों में दर्ज रहेगी।
याद रखेगा हिंदुस्तान!
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