सत्ता की लालच में  प्रधानमंत्री की गिरती गरिमा। 

धर्म के आधार पर मुसलमानो को आरक्षण नहीं देंगे - प्रधानमंत्री - 

क्या संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण देने का प्रावधान है ? नहीं ! तो फिर क्यूँ, प्रधानमंत्री जी मुसलमानों धर्म की आधार पर आरक्षण देने की बात कर रहे हैं?, और अपने आपको धर्मनिरपेक्ष कहने वाली सारी पार्टियां मूकदर्शक बनी हुई हैं। 

सत्ता की लालच में  प्रधानमंत्री की गिरती गरिमा। 

धर्म के आधार पर मुसलमानो को आरक्षण नहीं देंगे – प्रधानमंत्री – 

सबका साथ सबका विकास का नारा देने वाले मोदी जी यह भी साबित कर दिखाया कि इनका भाषण सिर्फ एक जुमला होता है। असल इनकी मुसलमानों से द्वेष और दुराग्रही मानसिकता सत्ता की चाहत का एक प्रतीक है
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क्या संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण देने का प्रावधान है ? नहीं ! तो फिर क्यूँ, प्रधानमंत्री जी मुसलमानों धर्म की आधार पर आरक्षण देने की बात कर रहे हैं?, और अपने आपको धर्मनिरपेक्ष कहने वाली सारी पार्टियां मूकदर्शक बनी हुई हैं। 

एस. ज़ेड. मलिक (पत्रकार)

   प्रधानमंत्री अपने सत्ता पर बने रहने के लिये इस हद तक गिर सकते हैं कि बेशर्मी के साथ झूठ बोल कर  80 करोड़ बेवक़ूफ़ लोगों को गुमराह कर रहे हैं इसलिये की यह 80 करोड़ भोली भाली जनता अंधभक्त स्वार्थी डरफोक है, जिसे इस चुनावी सभा मे हज़ार दो हज़ार के सामने माइक से चिल्ला चिल्ला कर इतनी सफाई और बेशर्मी से झूठ बोला जाता है जैसे मानो सच मे राज्य सरकार ने ही धर्म की आधार पर आरक्षण दिया है। 
 70 वर्षों से जिस जिसे पार्टी की सरकारें रही , क्या किसी ने इस देश की हिन्दू मां , बहन, बेटियों का मंगल सूत्र उतरवा कर मुसलमानों को दिया ? 
 70 वर्षों से भारत मे मुसलमानों की सरकार रही क्या? 
70 वर्षों में किसी भी मुसलमानों के गाँव या, शहर या कश्मीर जैसे राज्यों में किसी मंदिर को नुकसान पहुंचाया क्या?
70 वर्षों में जितने दंगे हुए उसमें सब से ज़्यादा मुसलमानों का जानी-माली नुकसान हुआ , क्या किसी मुसलमानों ने किसी हिन्दु से बदला लिया क्या?
 पढ़े लिखे भी तो कमबख्त अंधभक्त हैं। 
70 वर्षों से आज तक हिदुस्तान में मुसलमानो को डर और बहलावा के सिवा सरकार से मिला क्या ? 1990 मंडल कमीशन लागू होने के बाद दोयम दर्जे का आरक्षण दिया गया क्या इसका विरोध किसी मुसलमान ने किया क्या? और इसका लाभ कितने मुसलामानों ने उठाया ?

आइये बताते देखिये ओबीसी आरक्षण कब मिला और इस ओबीसी का लाभ किसने उठाया? 

7 अगस्त, 1990 को पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने संसद को बताया कि वह अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 फीसदी आरक्षण लागू कर रहे हैं. इसके 6 दिन बाद 13 अगस्त, 1990 को इसकी अधिसूचना भी जारी हो गई।

दरअसल, आज जो आरक्षण प्रणाली मौजूद है, वह सही मायने में 1933 में शुरू की गई थी जब ब्रिटिश प्रधान मंत्री रामसे मैकडोनाल्ड ने ‘सांप्रदायिक पुरस्कार’ प्रस्तुत किया था। इस पुरस्कार में मुसलमानों, सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियन, यूरोपीय और दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों का प्रावधान किया गया।

1953 का काका कालेकर आयोग पिछड़े वर्गों के लिए पहला आयोग था। लगभग 2,399 समुदायों को “पिछड़े” के रूप में सूचीबद्ध करने वाली रिपोर्ट तैयार करने के बावजूद, आयोग का कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा।

मंडल आयोग के उद्देश्य

आयोग का प्राथमिक कर्तव्य अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) द्वारा सामना किए जाने वाले मुद्दों को संबोधित करना था। इसे यह स्थापित करना था कि भारत के “सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों” को किस मानदंड से परिभाषित किया जाएगा। उन्हें इन वर्गों को आगे बढ़ाने में मदद करने के लिए उठाए जा सकने वाले कदमों की सिफारिश करनी थी और राज्य और केंद्र सरकार की नौकरियों के लिए आरक्षण का भी आकलन करना था।

मंडल आयोग के निष्कर्ष

आयोग ने एक व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाया, जिसमें सर्वेक्षण करना, आंकड़े एकत्र करना, तथा आरक्षण लाभ के हकदार समुदायों की पहचान करने के लिए विशेषज्ञों से परामर्श करना शामिल था।

पिछड़े वर्गों के निर्धारण के लिए आयोग ने जो मानदंड स्थापित किए थे, उनमें अन्य जातियों या वर्गों द्वारा पिछड़ा माना जाना, शारीरिक श्रम पर निर्भरता तथा पारिवारिक परिसंपत्तियां राज्य औसत से काफी नीचे होना शामिल था।
आयोग ने अपने मूल्यांकन को गैर-हिंदुओं (जैसे, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध) पर भी लागू किया, यदि वे पहले “अछूत” जातियों से थे या उनके व्यवसायिक नाम समान थे, जैसे “धोबी”, “लोहार”, “नाई” या “तेली”, आदि।
1980 में, आयोग ने एक राष्ट्रव्यापी सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण भी किया, जिसमें 405 जिलों के गांवों और शहरी क्षेत्रों से डेटा एकत्र किया गया। 1961 की जनगणना, राज्य पिछड़ा वर्ग सूचियों और व्यक्तिगत ज्ञान के साथ इस डेटा को मिलाकर, आयोग ने 3,743 ओबीसी और 2,108 “दलित पिछड़े वर्गों” की एक राष्ट्रीय सूची तैयार की।
आयोग के निष्कर्षों ने यह भी संकेत दिया कि भारत की जनसंख्या में लगभग 16 प्रतिशत गैर-हिंदू, 17.5 प्रतिशत “अगली जातियां”, 44 प्रतिशत “अन्य पिछड़े वर्ग” और 22.5 प्रतिशत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति शामिल हैं। यह देखते हुए कि गैर-हिंदू आबादी में “अन्य पिछड़े वर्गों” का लगभग आठ प्रतिशत शामिल है, “अन्य पिछड़े वर्गों” (हिंदू और गैर-हिंदू) का कुल अनुपात भारत की आबादी का 52 प्रतिशत (44 प्रतिशत + 8 प्रतिशत) है। ये वर्गीकरण भारत के स्वतंत्रता के बाद के सामाजिक ताने-बाने में अंतर्दृष्टि प्रदान करने में महत्वपूर्ण थे और आगे चलकर सकारात्मक कार्रवाई नीतियों का मार्गदर्शन करेंगे।

आयोग द्वारा की गई सिफारिशें

31 दिसंबर 1980 को मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति एनएस रेड्डी को सौंपी। सिफारिशों में सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण शामिल था। 
आयोग ने केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी के लिए 52 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के तहत आरक्षण का कुल अनुपात (एससी, एसटी और ओबीसी सहित) 50 प्रतिशत से कम होना चाहिए।

कार्यान्वयन

करीब एक दशक बाद 7 अगस्त 1990 को राष्ट्रीय मोर्चा गठबंधन के प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की। प्रधानमंत्री सिंह ने संसद में कहा कि ओबीसी को केंद्र सरकार की नौकरियों और अन्य सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा।
इस पर व्यापक विरोध और बहस हुई। आलोचकों ने तर्क दिया कि आरक्षण नीतियों से विपरीत भेदभाव और योग्यता आधारित चयन में कमी आ सकती है। 16 नवंबर 1992 को सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी के लिए आयोग के कोटे को बरकरार रखा और धीरे-धीरे सिफारिशें लागू की गईं। सितंबर 1993 में जब कांग्रेस पार्टी के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने सिफारिशों के व्यापक कार्यान्वयन की घोषणा की, तब तक जनता में कोई विरोध नहीं हुआ। शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी के लिए आरक्षण 2006 तक लागू नहीं हुआ और अभी भी कई शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षण पदों पर कोई आरक्षण नहीं है। 

आखिर इस देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री को इस देश के मुसलमानों से दुश्मनी क्यूँ है? 

अब सवाल यह भी है की इंडिया गठबंधन अपने आपको और देश को तानाशाह के प्रकोप कैसे बचाएगी ?

प्रधनमंत्री के मोजरा वाले बयान पर, कांग्रेस सबसे ज़्यादा विफर रही है, जबकि कांग्रेस को आरक्षण को मुद्दा बना कर जनता को संविधान दिखाना चाहिये, यह भी बताना चाहिए कि कांग्रेस जब तक सत्ता में रही तब तक आरक्षण के नाम पर मुसलमानों को हाशिये पर रखने का काम किया।
यह सच है की भारत की जनता अब केंद्र की सत्ता में बदलाव लाना चाहती है और इस चुनाव में 63 प्रतिशत जनता बेरोज़गारी और महंगाई, हिन्दू , मुसलमान, मंदिर मस्जिद , मुस्लिम आरक्षण , हिन्दू, मां , बहन बेटिओं का मांगल सूत्र छीनने व नफरत वाले ब्यान से पक गई है, और अब इसी को मुख्य मुद्दा मान कर ही बदलाव का मन बनाते हुए इसी चुनाव में इंडिया गठबंधन के पक्ष में अपना मत मोदी की सरकार मत पेटी में दे भी रही है ।  मोदी मत पेटी इसलिये कहना पड़ रहा है कि मोदी जी तीसरी बार भी सत्ता में बने रहना चाहते हैं इसी लिये उन्हीने वीवीएम पैट जैसी मशने अपने नियंत्रण वाली बनवाई है, जिसमे उन्हें उनके मनचाहा प्रतिशत वोट मिल सके। और हम जान बूझ कर , न चाहते हुए भी हम वोट करते रहे। लेकिन यह गलती केवल हम जनता ने ही नहीं की , बल्कि सभी राजनितिक पार्टिओं वालों ने भी की , इस गलती को यही कहा जाएगा ” आ बैल – मुझे फिर मार ” अब 6th चरण का चुनाव सम्पन्न होने के बाद ऐसा महसूस होने लगा की मोदी की गोदी मीडिया ने आज  वर्तमान सत्तारूढ़ मोदी सरकार के पक्षमे,  “अबकी बार – 400 के पार”, वाला नारा तहत भरम फैलाने का अभियान तेज़  कर दिया है।  आज तक का बलैक एंड वाइट ने खुले आम ऐसा झूठ की सारी जनता बेवकूफ ही नहीं बल्कि आज तक वालों की दृष्टि में पागल है।
जबकि दिल्ली में कुछ पढ़े लिखे बेवकूफ अंधभक्त ने मोदी को ही भगवान् मान कर अपना वोट दिया है। बाक़ी ने महंगाई, बेरोज़गारी, को मुख्य मुद्दा मान कर इंडिया गठबंधन को अपना मत मोदी वीवीएम पैड में बटन दबाया है।  मैं मोदी का वीवीएम पैड इसलिए कह रहा हूँ की, मोदी का “अबकी बार 400 के पार” वाला ब्यान सिर्फ हवा में नहीं है बल्कि 400 सीटों पर क़ब्ज़ा करना यह एक अभियान और चैलेंज भी है , जिसे हर हाल हासिल करना ही इनका मुख्य मक़सद है। इसके लिए यह साम , दाम दण्ड , भेद की नीति अपना रहे हैं। वीवीपैट अपने नियंत्रण में रख कर जनता में मतों से खेला जा रहा है।   और इंडिया गंठबंधन सिर्फ इसलिए खुश हो रही है की जनता ने इंडिया गठबंधन को स्वीकारा है, जबकि आम आदमी पार्टी को समाप्त करना मोदी सरकार का एक मात्र प्रथम प्राथमिकता और लक्ष्य है।  इसके लिए उन्होंने आम आदमी पार्टी के मुख्य कार्यकर्ताओं पर भ्र्ष्टाचार का आरोप सिद्ध कर दिल्ली के मुख्यमंत्री सहिंत दिल्ली सरकार के दो मंत्री जेल में डाल दिया है, और कई अभी रेडार पर हैं।   इस चुनाव परिणाम यानी 4 जून के बाद जो भी रेडार पर हैं उन्हें जेल में डाल दिया जाएगा।
इससे बचने का बस एक ही उपाए है – इंडिया गठबंधन के कुछ लोग चुनाव परिणाम के दिन कॉउंटिंग में रहें और अपनी गिद्ध दृष्टी जमाये रखें 300 से एक भी पर्ची फालतू हो तो उसे वीवीपैट को रिजेक्ट करने का उसी समय आवाज़ उठायें और दुसरी तरफ चुनाव आयुक्त को घेर का शान्ति पूर्ण धरने पर बैठ जाएँ, ताकि चुनाव आयुक्त को सत्तारूढ़ पार्टिओं के मनमानी को रोकने पर मजबूर होना पड़े।  तभी सम्भव है इंडिया गठबंधन को सत्ता में आना।  वरना बारी बारी से सभी को जेल – रेल में जाना पड़ेगा।
ZEA

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