मगध के गांधी स्वतंत्रता सेनानी और समाजसेवी सैयद फ़िदा हुसैन
रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग़ हत्याकांड (1919) इस घटना ने उन्हें पूरी तरह स्वतंत्रता संग्राम में कूदने के लिए प्रेरित किया।
फ़िदा हुसैन सिर्फ आंदोलनकारी ही नहीं थे, बल्कि एक क्रांतिकारी पत्रकार भी थे। उन्होंने “चिंगारी” नामक पत्रिका निकाली, जिसमें अंग्रेज़ी हुकूमत के अत्याचारों को उजागर किया जाता था।———————————————
मगध के गांधी स्वतंत्रता सेनानी और समाजसेवी सैयद फ़िदा हुसैन


सैय्यद आसिफ इमाम काकवी
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनगिनत सपूतों में से एक नाम सैयद फ़िदा हुसैन का भी है, जिन्हें “मगध के गांधी” के नाम से जाना जाता है। उनकी पूरी ज़िंदगी आज़ादी की लड़ाई और समाजसेवा के लिए समर्पित रही। वे न केवल एक प्रतिबद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि एक निष्ठावान राजनेता और समाज सुधारक भी थे। सैयद फ़िदा हुसैन का जन्म 1904 में बिहार के जहानाबाद ज़िले के पिंजौरा गांव में हुआ था। उनके पिता सैयद अहमद अब्दुल अज़ीज़ थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा घर पर प्राप्त की और फिर आगे की पढ़ाई के लिए कोलकाता गए, जहां से उन्होंने मैट्रिक और इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की। छात्र जीवन से ही फ़िदा हुसैन स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गए थे। 1917 में चंपारण सत्याग्रह की सफलता ने उन्हें गहराई से प्रेरित किया। इसी दौरान ख़िलाफ़त आंदोलन शुरू हो चुका था, और वे बी अम्मा, मौलाना मुहम्मद अली जौहर और मौलाना शौकत अली के आंदोलनों से प्रभावित हुए। रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग़ हत्याकांड (1919) इस घटना ने उन्हें पूरी तरह स्वतंत्रता संग्राम में कूदने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने गया और आसपास के इलाकों में आंदोलन को सफल बनाने के लिए महात्मा गांधी, मौलाना आज़ाद, स्वामी सत्यदेव और अन्य नेताओं के साथ काम किया। साइमन कमीशन का विरोध (1928) उन्होंने पटना में सैयद हसन इमाम की अध्यक्षता में साइमन कमीशन के खिलाफ आयोजित प्रदर्शन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। उन्होंने विदेशी वस्त्रों की होली जलाई और शराब, भांग, गांजा, ताड़ी की दुकानों को बंद करवाने में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके लिए उन्हें छह महीने की जेल हुई। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी (1931) उनके विरोध में उन्होंने पूरे मगध क्षेत्र में प्रदर्शन और जनसभाओं का आयोजन किया। फ़िदा हुसैन सिर्फ आंदोलनकारी ही नहीं थे, बल्कि एक क्रांतिकारी पत्रकार भी थे। उन्होंने “चिंगारी” नामक पत्रिका निकाली, जिसमें अंग्रेज़ी हुकूमत के अत्याचारों को उजागर किया जाता था। 1934 में जब बिहार में विनाशकारी भूकंप आया, तो उन्होंने प्रभावित लोगों की सहायता के लिए दिन-रात मेहनत की और राहत कार्यों के लिए धन इकट्ठा किया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े रहे। 1957 और 1967 में वे जहानाबाद से विधायक चुने गए। बिहार विधानसभा में उन्होंने जनहित से जुड़े कई मुद्दे उठाए और अवसरवाद, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता और पूंजीवाद के खिलाफ लगातार संघर्ष कि 1980 में सैयद फ़िदा हुसैन का निधन हुआ, जिससे मगध के गांधी युग का एक मजबूत स्तंभ ढह गया। उनकी ईमानदारी, आदर्शवाद और समाज सेवा की भावना के कारण वे सदैव याद किए जाएंगे।
उनका जीवन संघर्ष, त्याग और देशभक्ति की मिसाल है, जिससे आने वाली पीढ़ियां प्रेरणा ले सकती हैं।

