राजस्थान हुकूमत का फैसला, उर्दू की गूंज को दबाने की साज़िश:
यह फैसला सम्प्रदायिक, संकीर्ण सोंच और भाषाओं के जानकारी के अभाव को उजागर करता है।
ज्ञात हो कि उर्दू प्रशिक्षण को बंद करने का निर्णय न केवल शिक्षा संस्थानों पर हमला है, बल्कि यह हमारे सभ्यता सांस्कृतिक और सांझी विरासत को खत्म करने का एक मास्टर प्लान भी है।
राजस्थान हुकूमत का फैसला, उर्दू की गूंज को दबाने की साज़िश:
एम. डब्ल्यू. अंसारी (आई.पी.एस)

गुज़िश्ता दिनों 16 फ़रवरी 2025 के रोज़नामा राष्ट्रिय सहारा की खबर के मुताबिक जयपुर, राजस्थान में उर्दू को बंद करने और संस्कृत को शुरू करने की बात कही गई है। हुक्मनामे में कहा गया कि स्कूलों में उर्दू को बंद करके संस्कृत को तीसरी ज़बान के तौर पर पढ़ाया जाए।

वाज़ेह रहे कि उर्दू की तालीम को बंद करने का फैसला न सिर्फ तालीमी मयार पर हमला है बल्कि यह हमारी तहज़ीबी व सक़ाफ़ती विरासत को भी मिटाने के मुतरादिफ़ है। यह फैसला तास्सुब, तंग-नज़री और ज़बानों के एहतिराम की कमी को ज़ाहिर करता है।
काबिले ज़िक्र है कि ज़बान सिर्फ इब्लाग़ का ज़रिया नहीं होती बल्कि यह तहज़ीब, तारीख़ और सक़ाफ़त की आईना दार होती है। उर्दू ज़बान न सिर्फ ख़ित्ता-ए-राजस्थान की तहज़ीबी विरासत की अलामत है बल्कि भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में आज उर्दू का बोल बाला है। उर्दू ने अदब, शायरी, और नस्र में दुनिया भर में अपना मकाम बनाया है, यही वजह है कि आज दुनिया के हर मुल्क में उर्दू बोलने वाले लोग मौजूद हैं और वह सब तरक़्क़ी याफ़्ता मुमालिक हैं। न सिर्फ यह बल्कि तमाम बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटीज़ में शोबा-ए-उर्दू क़ायम है।
उर्दू में तालीम को खत्म करना तलबा को उनकी तारीख़ और सक़ाफ़त से दूर करने के मुतरादिफ़ है। यह ज़बान न सिर्फ अदब बल्कि फलसफ़ा, साइंस और मज़हबी उलूम की भी हामिल है। इस प्यारी ज़बान को नसाब से निकालना तलबा को उन उलूम से महरूम कर देगा जो उनके फ़िक्री इर्तिक़ा में मददगार साबित होते हैं।
राजस्थान हुकूमत का यह फैसला न सिर्फ तालीमी नुक़सान का बाइस है बल्कि यह सक़ाफ़ती हम-आहंगी और कौमी इत्तेहाद को भी नुक़सान पहुँचाएगा। ज़बानें तहज़ीबों को जोड़ने का ज़रिया होती हैं और इन पर पाबंदी लगाना मुख़्तलिफ़ तबक़ात के दरमियान फ़ासले पैदा करेगा।
यह बात भी काबिले ज़िक्र है कि भारत के आईन के मुताबिक़, हर शहरी को अपनी मातृभाषा में तालीम हासिल करने का हक़ हासिल है। उर्दू को बंद करना इस बुनियादी हक़ की ख़िलाफ़वर्जी है और यह तालीमी आज़ादी पर क़दगन लगाने के मुतरादिफ़ भी है।
इस वक्त पूरे भारत से यह आवाज़ उठ रही है कि राजस्थान हुकूमत का यह फैसला भारत के आईन के ख़िलाफ़ तो है ही, भारतीया गंगा-जमुनी तहज़ीब को भी दाग़दार कर रहा है। इसे फ़ौरन वापस लिया जाना चाहिए ताकि तालीमी और सक़ाफ़ती नुक़सानात से बचा जा सके। हुकूमत को चाहिए कि वह ज़बानों के फ़रोग़ के लिए मुसबित इक़दामात करे, न कि उन्हें दबाने के लिए ऐसे ग़लत फैसले सादिर करे। उर्दू की हिफ़ाज़त सिर्फ़ ज़बान की हिफ़ाज़त नहीं बल्कि हमारी तहज़ीब और सक़ाफ़त की बक़ा की ज़मानत भी है।
ग़ौर तलब है कि स्कूलों में उर्दू की तालीम को बंद करने का फैसला सिर्फ एक तालीमी पालिसी नहीं, बल्कि एक ज़बान के क़त्ल-ए-आम की साज़िश है। यह सिर्फ उर्दू के हुरूफ़ नहीं मिटाए जा रहे, बल्कि भारतियों की शनाख्त, हमारी सक़ाफ़त और हमारी तारीख़ को मिटाने की कोशिश है।
आज उर्दू को नसाब से निकाला जा रहा है, कल हमारे बच्चों को अपनी ज़बान बोलने में भी दुश्वारी होगी। क्या राजस्थान के बाशिंदे इतने बे-हिस हो चुके हैं कि अपनी पहचान के ख़ात्मे पर भी ख़ामोश हैं? यह ख़ामोशी हमारे वजूद के ख़ात्मे की गवाही दे रही है।
उर्दू सिर्फ़ एक ज़बान नहीं, यह हम तमाम भारतियों की तहज़ीबी विरासत है। ग़ालिब, इक़बाल, मुनशी प्रेमचंद, फैज़ अहमद फैज़, फ़िराक़ गोरखपुरी, गोपीचंद नारायण और मज़रूह की शायरी इसी ज़बान में है। हमारे बुज़ुर्गों की दुआएँ और हमारी माँओं की लोरियाँ इसी ज़बान में थीं। अगर आज हमने आवाज़ न उठाई तो आने वाली नस्लें हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी।
कुछ न कहने से भी छिन जाता है ऐज़ाज़-ए-सुख़न
ज़ुल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है
ख़ास तौर पर राजस्थान के तमाम उर्दू-दा हज़रात और आम तौर पर तमाम मुहिब्बान-ए-उर्दू इस बात को जान लें कि ख़ामोशी हमेशा ज़ुल्म को तौसीअ देती है। अगर आज हमने ज़बान के हक़ के लिए आवाज़ बुलंद न की, तो यह ख़ामोशी जुर्म बन जाएगी। हुकूमतें आती जाती रहती हैं, लेकिन ज़बानें और सक़ाफ़तें हमेशा के लिए होती हैं। हमें यह समझना होगा कि यह कोई सियासी मसला नहीं है बल्कि हमारी बक़ा का मसला है।
अल-ग़रज़ यह कि उर्दू बोलने वाले मुत्तहिद होकर मुश्तरका आवाज़ बुलंद करें। राजस्थान के वालिदैन इस बात का मुतालबा करें कि उनके बच्चों को उनकी मातृभाषा में तालीम दी जाए, उनके हुक़ूक़ से उन्हें महरूम न रखा जाए। सोशल मीडिया, अदालतों, और अवामी इज्तिमाआत में इस नाइंसाफी के खिलाफ आवाज़ उठाएँ। यह वक्त ख़्वाब-ए-ग़फ़लत से जागने का है। अगर आज हमने जिद्दोजहद न की, तो कल हमारी पहचान तारीख़ के सफ़हात में दफ़न हो जाएगी। वक्त का तक़ाज़ा है कि हम बेदार हों, मुत्तहिद हों और अपनी ज़बान, अपनी सक़ाफ़त और अपने हुक़ूक़ के लिए मैदान में आएं।
सवाल यह है कि क्या यह महज़ इत्तेफ़ाक़ है कि उर्दू को निशाना बनाया जा रहा है? नहीं! यह सोचा-समझा मन्सूबा है ताकि हमें अपनी जड़ों से काटकर हमारी शनाख्त को मिटा दिया जाए। गंगा-जमुनी तहज़ीब, हिंदू-मुस्लिम मुश्तरका विरासत को ख़त्म कर दिया जाए। जब ज़बान ख़त्म हो जाएगी, तो तारीख़ भी बदल दी जाएगी। हमें इन हथकंडों को समझना होगा और इसके ख़िलाफ़ खड़े होना होगा।

