83%गुमराह, 17 प्रतिशत सत्तारूढ़, मुसलमान न घर के न घाट के?

वक़्फ़ बोर्ड के संशोधन बिल पर बिल बिला उठे सफेदपोश मुस्लिम रहनुमा।

अगर यह मुस्लिम रहनुमा वक़्फ़ की संपत्ति का दुरुपयोग न करते, और सही व्यावस्था देते तो आज इन्हें बिल बिलाना नहीं पड़ता, आज वक़्फ़ बोर्ड के मालिक बने बैठे होते।

आज सफेदपोश मुसलमान को जब सरकार ने नंगा किया तो इस्लाम पर खतरा बताने लगे, इसलिये की यही लोग वक़्फ़ की ज़मीन को बंदरबांट कर ऐश कर रहे हैं। 

 

एस. ज़ेड. मलिक

बिरादराने मिल्लत ज़रा सोंचिये – सफेदपोश उलमा ए हिन्द को अब समझ मे आया, जब इन्हें यक़ीन हो गया कि अब हमारी ख़ैर नहीं है, हम बचने वाले नहीं हैं, अब सरकार हमे नंगा कर देगी तो इन्हें इस्लाम ख़तरे में दिखाई देने लगा, जबकि खतरा इन उलमाओं को इनकी जद्दी छिनाने का एहसास हो गया, तो यह लोग इस्लाम पर खतरा बताने लगे और  इत्तेहाद और इत्तेफ़ाक़ की बातें करने लगे। लेकिन, बुनियादी तफरक़ा कहां है? यह बताने को अब भी तैयार नहीं हैं,  जान बूझ कर मसले को नज़र अंदाज़ कर रहे हैं । 

इस बात को भी समझना ज़रूरी है।  जब तक यह सफेदपोश क़ौम के रहबर, रहनुमा अपने क़ौम में गरीबों, बेकसों, बे सहारों बेघरों को अपने कमाये हुए धन में से उन्हें बांट कर अपने बराबरी में खड़ा नही कर लेते, तब तक ऐसे सफेदपोश लोग को न कोई अपना रहनुमा कहेगा, न इन्हें कोई अपना रहबर मानेगा, और न गरीबों के अंदर किसी को बचाने या मदद करने का जज़्बा होगा, इसलिये की वह तो अपने आपको कमज़ोर और भिखारी समझ रहा तो क्यूँ उसके अंदर क़ौम को बचाने या साथ देने का विचार आएगा? उसकी सोच बस इतनी सी होगी कि सफ़ेदपोशों से भीख लो, सलाम करो और दुआ दे कर किनारे हो जाओ और दूसरे के आगे हाँथ फैलाने चलो, वह गरीब कहीं पर आपको मरता हुआ ज़लील होता हुआ देखेगा तो वह मुंह फेर कर चला जायेगा। इसलिये की ऐसा करने पर सफेदपोश बुद्धिजीवियो ने मजबूर कर दिया है।

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बहरहाल , आज के माहौल में सरकार, मनुवादी मन्दिरमाफ़ियाब्राह्मण, शराब माफिया और ड्रग माफियाओ के साथ साथ कुछ विशेष ख़ाकी, और खादी धारण किये सत्तारूढ़ के दलाल ही मुसलमानों के सब से बड़े दुश्मन हैं। जबकि शिक्षित बुद्धिजीवी गैर मुस्लिम, मुसलमानों के दुश्मन नहीं हैं। अब तो मुसलमानों को अपने देश मे अपने आपको और देश को बचाने के लिये इन माफियाओं और देश द्रोहियों से एक आन्दोल , एक नई क्रांति के रूप में ऑफेंस करना होगा, अब डिफेंस नहीं। तब मुसलमानो के साथ दलित पिछड़ी और अल्पसंख्यको का साथ मिलना शुरू हो जायेगा लेकिन सब से पहले अपने गरीब परिवारों को शिक्षित और सरमायेदार बनाना होगा, फिर क़ौम मिल्लत इत्तिफ़ाक़ और इतिहाद में आएंगे। आज मुझे भी मुसलमान सरमायादारों और सफेदपोश उलमाओं से सख्त नफरत है। इसलिये की इन कथाकथित मुसलमान उलमा और मुस्लिम सरमायेदार न मुझे अपना कहने के लिये तैयार हैं और ना ही मेरी मदद करने के लिए ही तैयार हैं, न इन्होंने बचपन से ले कर अब तक मेरा साथ दिया, मेरी 65 वर्ष की उम्र हो गई, अगर मेरा कोई साथ अब तक दे रहा है तो वह है गैर मुस्लिम, जिसने मुझे दिल्ली जैसे जगह पर सर छुपाने की जगह दी, यह काम मेरी क़ौम के सरमायेदार भी कर सकते थे, मेरे पूरे जीवन मे मात्र तीन ही मुसलमान काम आए हैं उन तीन मुसलमानो का एहसान मुझ पर है। अधिकतर मेरे हर कदम पर काम आए जिन्हें मन्दिरमाफ़ियाब्राह्मनों ने वैश्य, शुद्र की उपाधि दी हुई है वही लोग आज भी मेरे अपने सगे हैं। यह एक कड़वा सच। जबकि इस्लाम अर्थात इंसानियत में ऊंच नीच भेद भाव है ही नहीं, वही ब्राह्मण का षड्यंत्र अपने आपको सनातन कह कर आज भी ऊपर रख् कर शूद्रों को हिन्दू बना कर गुलाम बनाये हुये है।

ज़रा सोंचिये
आज वक़्फ़ बोर्ड को केंद्र सरकार अपने अधीन लेने के लिये एक बिल ले कर आई तो, मुसलमानो की हर बड़ी छोटी समाजिक संस्थाएं जो गरीबो के नाम पर चंदा इक्कठा कर आपस मे बंदरबांट कर सफेदी और अतर लगा कर फ़िज़ा में खुशबू बिखेर कर नफासत भरे अंदाज़ में बड़ी बड़ी कार में घूमने वाले कुछ मुक़ररीर तो कुछ आलिम मुफ़्ती, तो कुछ क़ाज़ी और गाज़ी का लेब लगा कर घूमने वाले आज सारे के सारे बिलबिलाए हुए दिल्ली के जंतर मंतर पर इकट्ठा हो कर सरकार द्वारा पास किये गए वक़्फ़ बिल का विरोध प्रदर्शन कर रहे है। इसलिये की सरकार ने इन सब की पैरो के नीचे से वह ज़मीन खींच ली जिस पर वह अपने जद्दी बना कर बैठे ऐश कर रहे थे, वक़्फ़ के मालिक बने बैठे थे। जमाते इस्लामी हिन्द, जमाते उल्माये हिन्द, असदुद्दीन ओवैसी, और इनके जैसे हज़ारों सफेद पोश लोग हैं जो वक़्फ़ की हज़ारों एकड़ जमीनो पर क़ाबिज़ हैं। इन सरमायादारों की दृष्टि में हम जैसे कि कोई अहमियत ही नहीं कोई बात भी करना नहीं चाहता। इतना घमंड है इनमें। 

जबकि वक़्फ़ इसलिये बनाया गया था कि कोई निर्बन्स मुसलमान जमींदार के मरने बाद या वह अपने जीते जी उसकी जमीन जायदाद को शहर क़ाज़ी के सहयोग से समाज की निगरानी में जमींदार की ज़मीनों को सबसे पहले मरहूम के क़रीबी गरीब बेघर बेसहारा रिश्तेदारों में बांट कर उन्हें समाज मे इज़्ज़त से बराबरी का जीने अधिकार मिल सके। वक़्फ़ का प्रावधान 14वीं सदी में मुल्क तुर्क से शुरू हुआ था और धीरे धीरे पूरी दुनियां के मुस्लिम समुदायें में फैल गया, दूसरे मुल्कों में उस प्रावधान पर आज भी अमल होता है लेकिन दक्षिण एशिया के मुस्लिम देशों में मुस्लिम सफेदपोश ज़मीन माफियाओं का कब्ज़ा हो गया, जिसमे हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बंगला देश, इसमे आगे है। आज यह आम मुस्लममनो को गुमराह कर रहे हैं कि यह शोर मचा रहे हैं कि मुस्लिम पर्सनल्ला बोर्ड पर हमला है, मुसलमानो की मस्जिद मदरसे सरकार इस बिल के तहत छीन लेगी , बिल्कुल सही बात है, सरकार यदि वक़्फ़ की ज़मीन छीनेगी नही तो कम से कम उस वक़्फ़ की ज़मीन से होने वाली इनकम और ज़मीन कितनी है इसका आकलन और उस सब पर सरकार अपनी हिस्सेदारी तो ले ही लेगी, तब इन सफ़ेदपोशों पर लगाम लग जायेगा, इसलिये आज यह बिल बिला रहे हैं।

जबकि इस वक़्फ़ से न पहले किसी आम गरीब मुस्लममनो को फायदा था न अब है न भविष्य में मिलेगा लेकिन जज़्बाती, भावुक मुसलमान सफ़ेदपोशों सरमायादारों के आह्वान पर आज उसे अपने धर्म का एक अहम हिस्सा मान कर इकट्ठा हो गये, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार से आरएसएस आम गैरमुस्लिमों को हिन्दू साबित कर उन्हें मुसलमानो का भय दिखा कर एक जूट कर वोट बैंक बना कर आज वही मनुवादी, मन्दिरमाफ़िया, शराब माफिया, औरत माफिया, ड्रग्माफ़िया शीर्ष सत्ता पर क़ाबिज़ हैं, और उन्हें पता है, की जिस दिन आम गैरमुस्लिम हिन्दू को इन माफियाओं का पाखंड समझ मे आगया उस दिन इनकी सत्ता ही नहीं बल्कि ब्रिटिश सरकार की तरह इस देश से भी इन्हें बाहर खदेड़ दिया जायेगा। इसलिये यह कभी भी चैन से नहीं बैठते, हर दिन यह मन्दिरमाफ़ियाब्राह्मन कोई न कोई षड्यंत्र रचते रहते हैं, और सम्पूर्ण हिंदुस्तान को गुमराह कर एक दूसरे लड़वाते रहते हैं, ठीक उसी प्रकार मुस्लिम सफ़ेद पोश वक़्फ़ ज़मीन माफ़िया भी आज वही कर रहे हैं, इन्होंने ने ही अशराफ, अरजाल, जैसे शब्दों का उपयोग कर मुसलमानो को उलझा कर आपस में बांट दिया है। और आज जब इनकी ज़मीन छीना रही है तो यह धर्म की दुहाई दे रहे हैं।

एक क़ुरआन, एक अल्लाह एक रसूल को मानने वाले मोमिन कलाते है, फिर विभन्न फ़िरक़ों में क्यों?

क़ुरआन ने तो फ़िरक़ों में तो नहीं बंटा है परन्तु क़ुरआन से जो मैंने समझा है, वह सूरह बक़रह में मौजूद है, अल्लाह ने फ़िरके दो बनाएं है एक औरत और एक मर्द, और इनके लिए कुछ अच्छे बुरे सिफ़ाते बनाई है अर्थात गुण, तथा सिफ़तों अर्थात गुणों के आधार पर यहूदी, नस्सारा, मोमिन अर्थात मुसलमान की उपमा दिया है मुसलमानो में अल-मुस्लेमीन, और वल-मुस्लेमात का ज़िक्र है, अल-मुस्लेमीन अर्थात मुसलमान मर्द, पुरुष, और वल-मुस्लेमात अर्था मुसलमान स्त्री, महिला, औरत, और इंसानों में कुछ यहूदी अर्थात हट्ठि, ज़िद्दी, दुष्ट अपने आपको ज़बरदस्ती मालिक कहलवाने वाला दुष्टमनुवादी, अपने मन की सुनने वाला और उसी पर अमल करने वाला और नस्सारा, अर्थात खोजी, हुनरमंद, विचारवान, लेखक, जिसमें खोजने और बनाने , जोड़ने तथा शोध करने की क्षमता होती है, और वहीं क़ुरआन ने मुसलमान का ज़िक्र किया है जिसका गन बताया है कि मुसलमान कौन होगा जो इन गुणों को अपने अंदर उतारेगा, वह मुख्य गुण हैं, तौहीद और तक़वा, – तौहीद अर्थात सच्चाई, ईमानदारी और एक ईश्वर दिव्या शक्ति , प्रकृतिक, जो निराकार है और क़यामत पर अड़ंगीत विश्वास रखना, अपने वादे पर स्थिर रहना, और तक़वा, अर्थात सारे बुराईओं से परहेज़गार और हर कदम पर अपने परवरदिगार से डरते रहना और हमेशा अपने परवरदिगार से माफी मांगते रहना। एक मुसलाम होने की सिफ़ात अर्थात गुण यही है। मुसलमान – जिसके लिए यह दुनियाँ मात्र एक इम्तेहान की जगह है, जहां से फिर वापस अल्लाह ही के पास लौटना है।
अल्लाह अपने पवित्र कुरआन में कह रहा है, मैंने आदम की शक्ल में इंसान पैदा किया है तो उसमें नफ़्स अर्थात ख्वाहिश अर्थात इच्छा, यह विशेष गुण हर इंसान के दिल और दिमाग से जोड़ दिया है। जो इंसानों की सोंच से उसके अंदर उत्तपन्न होगा।

मेरे शोध के अनुसार क़ुरआन अर्थात विधि विधानों के साथ कर्मो का प्रमाण उक्त प्रतीकात्मक आदेशों का संग्रह, अर्था संविधान, वैसा संविधान जिसमे किसी भी प्रकार के बुराई की कोई गुंजाईश ही नही है, और इत्तिहास के हवाले से प्रमाणित कर सुखमय जीवनयापन की सीख देता है।
इससे नफ़रत करने वाले हर वह व्यक्ति है जो अपने इच्छा का गुलाम है। अय्याश परस्त, शराबी, पैसा कमाने के लिये साम दाम दण्ड भेद की नीति अपनाने वाले, ब्याज खाने वाले, ऐसे लोग क़ुरआन और मुसलमान शब्द से नफ़रत करते हैं।

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