भोपाल में मोशायरा और कविसम्मेलन का मैत्री कार्यक्रम

दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय में सफल कवि सम्मेलन एवं मुशायरा संपन्न*

नीत भावना जायसवाल
“रिश्ते न अब काम के हैं, रह गए बस नाम के हैं
मन हुआ खट्टा भी जिनसे, वो भरोसे राम के हैं।”

भोपाल में गूंजी कविता और शायरी की महफ़िल*

 

*दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय में सफल कवि सम्मेलन एवं मुशायरा संपन्न*

Mpnn Desk News

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साहित्य प्रेमियों के लिए शुक्रवार की शाम भोपाल में बेहद खास रही, जब दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय में आयोजित एक भव्य कवि सम्मेलन एवं मुशायरे ने श्रोताओं को कविता और शायरी के सुरों से सराबोर कर दिया। यह कार्यक्रम “माइक ऑन” और “राइटर वर्ल्ड इंडिया” के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन से हुई, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में माननीय शुभम चौहान तमोत जी की गरिमामयी उपस्थिति रही। देशभर से पधारे नामचीन कवियों और शायरों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से वातावरण को सुरमयी बना दिया।

गुरुग्राम से नीत भावना जायसवाल, दिल्ली से समय और प्रांशु दुबे ‘प्राण’, तथा शायर अनुज कपूर ने अपनी शानदार प्रस्तुतियों से खूब सराहना बटोरी। वहीं भोपाल के मशहूर शायर दिनेश गुप्ता ‘मकरंद’, औरंगजेब आज़म, खुशबू-ए-फातिमा और आनंद ‘गुस्ताख’ ने मंच संचालन की ज़िम्मेदारी बख़ूबी निभाई। कार्यक्रम की सदारत भोपाल के ग़ज़लकार आमिर अज़हर खान ने की।

इस मुशायरे एवं कवि सम्मेलन का सफल आयोजन अनुराग भरत, आरती शर्मा और प्रियांशु पंडित द्वारा किया गया। विशेष रूप से अनुज कपूर, औरंगजेब आज़म और आमिर अज़हर की शायरी को श्रोताओं ने खूब सराहा। सभागार लगातार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा।

“माइक ऑन” संस्था के संस्थापक प्रियांशु पंडित ने बताया कि संस्था का उद्देश्य देशभर में साहित्यिक आयोजनों के माध्यम से साहित्य को प्रोत्साहन देना है। भविष्य में भी ऐसे आयोजन नियमित रूप से होते रहेंगे। कार्यक्रम में भोपाल के कवि संदीप द्विवेदी और उर्दू अकादमी से रिज़वान साहब की विशेष उपस्थिति रही।

कार्यक्रम के समापन पर अनुराग भरत ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों और श्रोताओं का आभार प्रकट किया।

*मुशायरे में प्रस्तुत कुछ विशेष शेर :*

🔸 नीत भावना जायसवाल
“रिश्ते न अब काम के हैं, रह गए बस नाम के हैं
मन हुआ खट्टा भी जिनसे, वो भरोसे राम के हैं।”

🔸 आमिर अज़हर
“हमें ग़म थे मगर कम थे, बहरहाल,
बहुत कम थे मगर हम थे, बहरहाल।”

🔸 अनुज कपूर
“ज़िन्दगी भर मैं कहीं महरूम ही न रह जाऊँ,
ग़म के सिवा क्यों मुझे कुछ लिखना नहीं आता।”

🔸 औरंगजेब आज़म
“जब हमारे गांव आओगे दिखाएंगे तुम्हें,
धान और गेहूं की सूरत, लहलहाती ज़िंदगी।”

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