बिहार चुनाव 2025: पासमन्दा का सौदा

पिछड़े मुसलमान—जिनमें क़ुरैशी, अंसारी, नाई, धोबी, फ़क़ीर, हलालख़ोर जैसी सब ज़ातें शामिल हैं—आज भी बुनियादी सहूलतों, रोज़गार, तालीम और सियासी नुमाइंदगी से महरूम

2025 के चुनावात न सिर्फ़ सियासी लिहाज़ से अहम हैं बल्कि ये इज्तेमाई बैदारी और समाजी इंसाफ़ के लिए एक संग-ए-मील साबित हो सकते हैं,

बिहार चुनाव 2025:

अल्पसंख्यकों और खास तौर पर पिछड़े मुस्लिम समाज को अब क़ियादत भी खड़ी करनी होगी, सिर्फ़ वोट बैंक बनना बंद करें: एम.डब्ल्यू.अंसारी (आई.पी.एस) रिटायर्ड डी.जी

जैसे ही बिहार विधानसभा चुनाव की तारीख़ें क़रीब आ रही हैं, एक बार फिर वही पुराने नारे, वादे और सोशल मीडिया पर हंगामा-आराई तेज़ होती जा रही है। लेकिन इस बार सवाल सिर्फ़ हुकूमत बनाने का नहीं, बल्कि इंसाफ़, शनाख़्त और हिस्सेदारी का है। सवाल ये है कि क्या 2025 का बिहार चुनाव सिर्फ़ कुर्सी की रस्साकशी होगा या भारत के सबसे पिछड़े, सबसे नज़रअंदाज़ तबक़ात की आवाज़ भी बनेगा?

बिहार में मुसलमानों की आबादी तक़रीबन 20 फ़ीसद है, ख़ास तौर पर पटना (12%), कटिहार (43%), अररिया (42%), पूर्णिया (38%), मधुबनी (26%), दरभंगा (23%), सीतामढ़ी (21%), चंपारन (21%) के अलावा किशनगंज, भागलपुर, गोपालगंज, मुज़फ़्फ़रपुर वग़ैरह में कसीर आबादी है जिनमें एक बड़ा तबक़ा पिछड़ा है जो मआशी तौर पर कमज़ोर और तालीमी लिहाज़ से बहुत पीछे है। पिछड़े मुसलमान—जिनमें क़ुरैशी, अंसारी, नाई, धोबी, फ़क़ीर, हलालख़ोर जैसी सब ज़ातें शामिल हैं—आज भी बुनियादी सहूलतों, रोज़गार, तालीम और सियासी नुमाइंदगी से महरूम हैं और ये बात भी है कि जब तक क़ियादत नहीं होगी तब तक पिछड़े तबक़ात सरख़रू नहीं हो सकते।

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उनके मसाइल वही हैं जो हिंदू दलितों के हैं, मगर उनकी पहचान सिर्फ़ मज़हब की बुनियाद पर की गई और उन्हें ”वोट बैंक” का टैग देकर हक़ीकी हिस्सेदारी से महरूम रखा गया, जिसके लिए सभी पार्टियाँ ज़िम्मेदार हैं और ख़ासकर बरसर-ए-इक़्तेदार पार्टी।

10 अगस्त 1950 को सदर जम्हूरिया ने एक हुक्मनामा जारी किया जिसके तहत सिर्फ़ हिंदू मज़हब के मानने वालों को शेड्यूल कास्ट (SC) के ज़ुम्रे में शामिल किया गया। बाद में 1956 में सिख, और 1990 में बौद्ध को भी इसमें शामिल किया गया, मगर मुसलमान और ईसाई दलित आज भी इससे महरूम हैं और ये नाइंसाफ़ी आज भी जारी है जिसके लिए नाम निहाद सेक्युलर पार्टियाँ भी ज़िम्मेदार हैं।

ये सदारती हुक्मनामा आइन के आर्टिकल 14 (बराबरी) और आर्टिकल 15 (इम्तियाज़ी सुलूक पर पाबंदी) के बिल्कुल ख़िलाफ़ है। कई कमिशन, जैसे रंगनाथ मिश्रा कमिशन और सच्चर कमेटी ने इस हुक्म को ख़त्म करने की सिफ़ारिश की, लेकिन आज तक कोई भी हुकूमत इसे ख़त्म करने की हिम्मत न कर सकी। लेकिन ये बात भी क़ाबिल-ए-ग़ौर है कि किसी भी सियासी पार्टी ने या फिर वो मुस्लिम रहनुमा जो बीजेपी से जुड़े हुए हैं इस ऑर्डर को ख़त्म करने के लिए कोई जद्दोजहद नहीं की। सिर्फ़ पिछड़े तबक़े का इस्तेमाल वोट बैंक के लिए किया है। ये सदारती हुक्मनामा वो आइनी नाइंसाफ़ी है जो मज़हब की बुनियाद पर दलितों को उनके बुनियादी हुक़ूक़ से महरूम करती है और समाज को दो हिस्सों में मज़हब के नाम पर बाँटने का काम कर रही है।

आज़ादी के बाद से आज तक, मुल्क भर में दलितों, मुसलमानों, ईसाइयों और ख़ास तौर पर पिछड़े तबक़ात के साथ जो कुछ हुआ, वो एक साज़िशी ख़ामोशी का नतीजा है। मॉब लिंचिंग की एक तवील फ़ेहरिस्त है जिसमें अख़लाक़ ख़ान, तबरेज़ अंसारी जैसे कितने ही नौजवानों को अपना शिकार बनाया गया जिसमें झारखंड, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दीगर जगहों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है जिन्हें महज़ गाय के नाम पर क़त्ल किया गया। यूपी, मध्य प्रदेश और दिल्ली वग़ैरह में बग़ैर किसी अदालती कार्रवाई के अल्पसंख्यकों के घरों को ज़मीनदोज़ किया गया। हाथरस में जो हुआ, वो किसी ज़ी-शऊर इंसान को झंझोड़ने के लिए काफ़ी था। मणिपुर, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में गिरजा घरों को जलाया गया, इबादत पर पाबंदियाँ लगाई गईं। इन मज़ालिम के वक़्त ”क़ानून” ख़ामोश रहा, और अपोज़ीशन अक्सर रस्मी मजम्मती बयानों से आगे नहीं बढ़ सका।

दो साल क़ब्ल वज़ीरे आज़म ने ख़ुद पिछड़े तबक़ात से हमदर्दी ज़ाहिर की थी लेकिन सवाल ये है कि अगर वाक़ई वज़ीरे आज़म और उनकी हुकूमत इस तबक़े से हमदर्दी रखते हैं तो फिर 1950 के सदारती हुक्म को ख़त्म करने की बात क्यों नहीं करते? अगर पिछड़े तबक़ात के हक़ व इंसाफ़ के लिए आप अपने वादे में सच्चे हैं तो क्यों बतख़ मियाँ अंसारी को आज तक इंसाफ़ नहीं मिला? कितनी ही हुकूमतें आईं और गईं लेकिन सदर जम्हूरिया का किया गया वादा (53 बीघा ज़मीन) आज तक पूरा क्यों नहीं हुआ? सच तो ये है कि “पिछड़ा” लफ़्ज़ का इस्तेमाल सिर्फ़ और सिर्फ़ चुनावात में वोट हासिल करने के लिए किया जाता है।

अभी हाल ही में 14-15 अप्रैल को पिछड़े रहनुमा अली हुसैन आसिम बिहारी का यौम-ए-पैदाइश पूरे मुल्क में मनाया गया, इसी तरह आइंदा माह में पिछड़े रहनुमा अब्दुल क़य्यूम अंसारी का यौम-ए-पैदाइश है जिसे हर साल मनाया जाता है और हुकूमत अपने फ़र्ज़ से पूरे साल के लिए बरी हो जाती है। साल भर उनके मक़बरों को कोई पूछने वाला नहीं होता, उनके ख़ानदान वालों को पुरसां हाल कोई नहीं होता। हालाँकि अब्दुल क़य्यूम अंसारी को ‘भारत रत्न’ दिया जाना चाहिए, और उनके नाम से सेंट्रल यूनिवर्सिटी और स्टेट यूनिवर्सिटी भी बनाई जानी चाहिए।

लेकिन इस सबसे बढ़कर सवाल ये पैदा होता है कि क्या मुसलमानों की अपनी कोई मज़बूत सियासी क़ियादत है? बदक़िस्मती से जवाब है: ”नहीं”। आज़ादी के बाद से मुसलमानों को मुनज़्ज़म सियासी क़ियादत देने में नाकामी एक बड़ी वजह है कि वो हमेशा दूसरों के मंशूर का हिस्सा बने, ख़ुद अपने एजेंडे के मिमार न बन सके। वक़्त आ गया है कि मुसलमान क़ियादत के लिए खड़े हों जो सिर्फ़ वोट माँगने न आए, बल्कि जवाबदेही के साथ इवान में उनकी नुमाइंदगी करे। हर पार्टी से आबादी के तआदुल के मुताबिक़ टिकट और शिराक़त की बात करनी चाहिए।

आज दलित, पिछड़े मुसलमान, ईसाई और SC-ST अलग-अलग तबक़ों में बँटे हैं, लेकिन ज़ुल्म इन सब पर यकसां हो रहा है। ज़रूरत इस बात की है कि ये सब तबक़े एक मुश्तरका एजेंडे पर मुत्तहिद हों।

उनके एजेंडे में सबसे अहम मुतालिबा 1950 का सदारती हुक्म ख़त्म करना हो। सभी मज़लूम तबक़ात को आइन के दाएरे में क़ानूनी तौर पर रिज़र्वेशन मिले। अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ तशद्दुद के ख़िलाफ़ सख़्त क़ानून बने। बुलडोज़र कल्चर पर पाबंदी लगे। पिछड़े इलाक़ों में तालीम व रोज़गार के ख़ास इक़दामात किए जाएँ।

2025 का बिहार चुनाव महज़ सीट जीतने का खेल न हो, बल्कि ये इस मुल्क के उन तबक़ात की बैदारी का पैग़ाम बने जो दशकों से सिर्फ़ वोट डालने का हक़ इस्तेमाल करते आ रहे हैं लेकिन हुकूमत बनाने में कभी हिस्सा नहीं बन सके। ये वक़्त है सवाल उठाने का, क़ियादत माँगने का, और इवान में अपनी बात रखने का।

ज़ाती मर्दम शुमारी कराई जाए, पुरानी पेंशन स्कीम नाफ़िज़ की जाए, किसानों के MSP को बढ़ाया जाए और पिछड़े तबक़ात को नुमाइंदगी के भरपूर मौक़े फ़राहम किए जाएँ, इस लिए कि ये मुल्क सिर्फ़ अक़्सरियत का नहीं, बल्कि हर दलित, हर अल्पसंख्यक, हर पिसे हुए इंसान का है। जब तक ये मज़लूम तबक़ात मुत्तहिद नहीं होंगे, तब तक न बुलडोज़र रुकेगा, न मॉब लिंचिंग, न नाइंसाफ़ी। 2025 बिहार चुनाव एक मौक़ा है—या तो फिर से वोट बैंक बनो, या अपनी सियासी, समाजी और मआशी शनाख़्त के लिए खड़े हो जाओ।

ये भी हक़ीक़त है कि 2025 के बिहार इंतिख़ाबात में पिछड़े तबक़ात को न सिर्फ़ अपनी सियासी हैसियत को मज़बूत करने का मौक़ा मिलेगा बल्कि उन्हें अपनी शनाख़्त, हुक़ूक़ और इंसाफ़ के लिए खड़े होने का भी एक सुनहरी मौक़ा फ़राहम करेगा। मुसलमानों और दीगर पिछड़े तबक़ात को सिर्फ़ वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल करना अब काफ़ी नहीं है; उन्हें अपने हुक़ूक़ की मुकम्मल बाज़याबी और इज्तेमाई मफ़ादात के लिए जद्दोजहद करनी होगी। इसके लिए ज़रूरी है कि ये तबक़ात अपनी मज़बूत क़ियादत खड़ी करें, जो सिर्फ़ इवानों तक रसाई हासिल न करे बल्कि उनके मसाइल को हक़ीक़त में हल करे। 1950 के सदारती हुक्मनामे को ख़त्म करने, मज़हब की बुनियाद पर तबक़ात को तक़सीम करने की सियासत को ख़त्म करने और पिछड़े तबक़ात को उनके हुक़ूक़ देने के लिए एक मुश्तरका एजेंडे की ज़रूरत है। 2025 के चुनावात न सिर्फ़ सियासी लिहाज़ से अहम हैं बल्कि ये इज्तेमाई बैदारी और समाजी इंसाफ़ के लिए एक संग-ए-मील साबित हो सकते हैं, बशर्ते पिछड़े तबक़ात एक हो कर इस नेक मक़सद के लिए जद्दोजहद करें।

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