BSF जवान शहीद: बिहार के जांबाज़ मो. इम्तियाज़ शहीद हुए, नम आंखों से बेटे ने क्या कह विदा किया?”
आज शहीद इम्तियाज़ का बेटा इमरान उस लड़ाई में है, जहाँ आंसुओं से भी हिम्मत पैदा होती है। हमने शहीद को श्रद्धा के फूल चढ़ाए, लेकिन सिर्फ़ श्रद्धांजलि काफ़ी नहीं होती। एक सवाल भी साथ उठता है:-क्या हमारे जवानों को सिर्फ़ शहादत के बाद ही याद किया जाएगा?
“हिम्मत रखो बेटे, तुम्हारे पापा का दर्जा सबको नहीं मिलता। माँ और परिवार का ख्याल रखना – यही उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।”
सच ही है, मृत्यु तो सबकी होती है, पर कुछ मौतें इतिहास बना जाती हैं। मोहम्मद इम्तियाज़ की शहादत भी उन्हीं में से एक है।
शहीद सब-इंस्पेक्टर मोहम्मद इम्तियाज़: सरहद पर शहीद हो कर अमर हुए बिहार के लाल की दास्तान


डीजी बीएसएफ और सभी रैंक उनके परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा …”हम 10 मई 2025 को जम्मू जिले के आर एस पुरा इलाके में अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर राष्ट्र की सेवा में बीएसएफ के बहादुर सब इंस्पेक्टर मोहम्मद इम्तियाज द्वारा किए गए सर्वोच्च बलिदान को सलाम करते हैं। बीएसएफ सीमा चौकी का नेतृत्व करते हुए, उन्होंने आगे बढ़कर वीरतापूर्वक नेतृत्व किया।


सैय्यद आसिफ इमाम काकवी
पटना एयरपोर्ट पर जब शहीद मोहम्मद इम्तियाज़ का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा पहुंचा, तब सिर्फ उनकी माँ की आंखें नहीं नम थीं, बल्कि पूरा बिहार रो रहा था। धन्य है वह माँ जिसने छपरा की ज़मीन पर इस लाल को जन्म दिया लाड़ प्यार से पाला पोसा और देश के हवाले कर दिया, और वह लाल जम्मू-कश्मीर की सरहद पर दुश्मनों से लड़ता हुआ अपने प्राणों की आहुति देकर वीरगती को प्राप्त हुए। आज देश उनपर गर्व कर रहा है। जब तक सूरज चाँद रहेगा शहीद मोहम्मद इम्तियाज़ आपका नाम रहेगा।
डीजी बीएसएफ और सभी रैंक उनके परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा …”हम 10 मई 2025 को जम्मू जिले के आर एस पुरा इलाके में अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर राष्ट्र की सेवा में बीएसएफ के बहादुर सब इंस्पेक्टर मोहम्मद इम्तियाज द्वारा किए गए सर्वोच्च बलिदान को सलाम करते हैं। बीएसएफ सीमा चौकी का नेतृत्व करते हुए, उन्होंने आगे बढ़कर वीरतापूर्वक नेतृत्व किया।
उनका बेटा इमरान जब एयरपोर्ट पर पिता के पार्थिव शरीर के सामने खड़ा हुआ, तो देश की आत्मा कांप उठी। शब्दों से ज़्यादा उस बालक की आंखों ने बताया कि पिता को खोने का ग़म क्या होता है।
“हिम्मत रखो बेटे, तुम्हारे पापा का दर्जा सबको नहीं मिलता। माँ और परिवार का ख्याल रखना – यही उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।”
सच ही है, मृत्यु तो सबकी होती है, पर कुछ मौतें इतिहास बना जाती हैं। मोहम्मद इम्तियाज़ की शहादत भी उन्हीं में से एक है। उनकी कुर्बानी देश की सरहदों पर दर्ज हो चुकी है – और आने वाली पीढ़ियाँ जब देशभक्ति का पाठ पढ़ेंगी, तब इम्तियाज़ साहब का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा।
व्यक्तिगत अनुभव:
मैं स्वयं उस दर्द को समझ सकता हूँ, जब एक बेटा अपने पिता को खोता है। मेरे पिताजी भी फौजी रहे हैं और उन्होंने भी युद्ध का सामना किया है। उनके शब्द आज मेरे कानों में गूंजते हैं – “सरहद पर हर गोली से पहले कोई माँ काँपती है, कोई बहन दुआ करती है, और कोई बेटा अपने पिता के लौट आने की आस रखता है।”
आज शहीद इम्तियाज़ का बेटा इमरान उस लड़ाई में है, जहाँ आंसुओं से भी हिम्मत पैदा होती है।
हमने शहीद को श्रद्धा के फूल चढ़ाए, लेकिन सिर्फ़ श्रद्धांजलि काफ़ी नहीं होती। एक सवाल भी साथ उठता है:
क्या हमारे जवानों को सिर्फ़ शहादत के बाद ही याद किया जाएगा?
क्या उनके परिवारों को वह सहायता, सम्मान और सुरक्षा मिलेगी, जिसकी वे वास्तविक रूप से हक़दार हैं?
मैंने पहले भी सरकार से यह अपील की थी कि शहीदों को केवल फॉर्मेलिटी के तौर पर नहीं, बल्कि राजकीय स्तर पर स्थायी सम्मान और सहयोग मिलना चाहिए।
तेजस्वी यादव जैसे युवा और ज़मीन से जुड़े नेता से हमें उम्मीद थी—तेजस्वी यादव ने उम्मीद पूरी की।
वे शहीद मोहम्मद इम्तियाज़ के पार्थिव शरीर के पटना आगमन पर स्वयं पहुंचे और उन्हें सीधे एयरपोर्ट पर श्रद्धांजलि दी। यह एक प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि संवेदनशीलता से जुड़ा कदम था।
अब वक्त है कि वे इस मुद्दे को बिहार विधान सभा में ज़ोरशोर से उठाएँ और एक “शहीद स्थायी सहायता योजना” की मांग करें जिसमें:
• शहीद के परिवार को आजीवन मासिक सहायता,
• बच्चों की मुफ्त शिक्षा,
• आश्रित को सरकारी नौकरी,
• और स्थानीय स्तर पर स्मारक व सम्मान शामिल हों।

