सत्ता के विरुद्ध जनता – बावजूद सत्ता मज़बूत?

ईडी, सीबीआई, आईटी ने जो प्रचार किया और चुनाव के लिए सरकार के अनुकूल जो उर्वरक जमीन तैयार किया उसके क्या कहने है।

भ्र्ष्टाचार की बहती गंगा में हाँथ धोते हैं यहां 80 प्रतिशत लोग। फिर कैसे संभव है कि दूसरा आएगा तो गंगा स्वक्ष बना डेगा?

भ्र्ष्टाचार की बहती गंगा में हाँथ धोते हैं यहां 80 प्रतिशत लोग। फिर कैसे संभव है कि दूसरा आएगा तो गंगा स्वक्ष बना डेगा?

एस. ज़ेड. मलिक  
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ताज्जुब लगता – मीडिया द्वारा सत्ता का धुआंधार प्रचार, सरकारी स्वतंत्र संस्थाने, और सरकारी खजाने का दुरुपयोग , खुले आम धड़ल्ले से सत्ता में बैठे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री से ले कर सभी मंत्री और सांसद, विधायक के अतिरिक्त इन मंत्रियों से लगे, व्यवस्थापक, जिसे अलग अलग पद से सम्मानित किया गया है, जिस पद की अपनी एक गरिमा है, जैसे सचिव, उपाध्यक्ष, ओएसडी, निर्देशक, उसमें भी अतिरिक्त, और संयुक्त, सहायक यहां तक निजी सचिव भी भ्र्ष्टाचार की बहती गंगा में हाँथ धोते रहते हैं, यही नहीं, इनकमटैक्स आला अधिकारीयों, के कार्यालयों के लगभग सभी कर्मचारियों, डीएम, एसडीएम, बीडीओ, सीओ, और इनके कार्यालयों के लगभग सभी छोटे बड़े कर्मचारीगण, भी मौके का लाभ भरपूर लेते हैं। यही नहीं न्यायपालिका जैसा महकमा, जो सरकार का एक मज़बूत स्तम्भ कहा जाता है, वह भी आज भ्र्ष्टाचार से अछूता नहीं है।
इस देश की जनता चाहे सरकार किसी की भी चुन ले, भ्र्ष्टाचार , रिश्वतखोरी, और बेमानी महकमे से समाप्त नहीं हो सकती है,  नहीं किया जा सकता। इसलिये की 80 प्रतिशत जनता ही भृष्ट है, और इन्हीं में से जनता ही अपना प्रतिनिधियों को चुनती है और सारे प्रतिनिधि मिल कर अपना मार्गदर्शक और अपना सरदार चुनती और सरदार, इन्ही में से व्यावस्थापक, संयोजक, और कार्यपालक बहाल करता है। फिर 20 प्रतिशत आम बुद्धिजीवी जनता सिवा मूकदर्शक बनी  किसी प्रकार पीड़ायुक्त अपना जीवन व्यतीत करती रहती है, जिसका कोई गिनती नहीं है। 
ऐसे में कितना सम्भव है भ्र्ष्टाचार का समाप्त होना, यह हर बुद्धिजीवी इंसान समझता है।
आइये एक समाजिक पीड़ायुक्त साधरण शिक्षित बुद्धिजीवी व्यक्ति जो जल-जंगल, औऱ ज़मीन को मानवता के अधिकार की लड़ाई में अपना जीवन समर्पित किया हुआ है जो अपनी संवेदना अपने लेखन से व्यतीत कर रहा है , जिसका नाम है सीताराम सोनवानी, जो राजगोपाल पीवी, के नेतृत्व में, और एकता परिषद के बैनर से आदिवासियों के सम्मान और उनके अधिकार के लिये समर्पित अपनी पीड़ा अपनी लेख द्वारा व्यतीत कर रहे हैं।
*अपनी हद और अहद के चलते जो एडीआर जैसे एनजीओ ने जो किया वह काबिल – ए – तारीफ है। सुप्रीम कोर्ट व्यावहारिक, वैधानिक और तकनीकी का हवाला देकर इतिहास में कई बार संवैधानिक गुंजाइश के बावजूद जनाकांक्षा के विपरीत आचरण करने से अवैध अलोकतांत्रिक कार्य को संरक्षण मिल जाती है।
शाह – शहंशाह ने सरकार के पुनर्स्थापना के अपने पूरे कार्यकाल में अरबों रुपए प्रचार विज्ञापन आदि – इत्यादि में जो खर्च किया वह तो निर्बाध गति से खर्च किया ही है। ईडी, सीबीआई, आईटी ने जो प्रचार किया और चुनाव के लिए सरकार के अनुकूल जो उर्वरक जमीन तैयार किया उसके क्या कहने है।
सुप्रीम कोर्ट ने एक संविधान सम्मत चुनाव आयोग का गठन किया था, उसके इतर उससे असहमत होकर मोदी सरकार ने बहुमत का बेजा इस्तेमाल कर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित *चुनाव आयोग* को रद्द कर अपने अनुसार अपने लोगों का चयनित कर 2024 के चुनाव के मद्देनजर जो *चुनाव आयोग* बनाया वह चुनाव आयोग पूरे समर्पण और स्वामी भक्ति के साथ सत्ता के लिए कार्य कर रही है।
इस चुनाव में सत्ता के खिलाफ जो आक्रोश दिखाई दे रही है। वह केवल सत्ता परिवर्तन के लिए नही उससे आगे उसके बाद के तस्वीर का रेखांकन करती नज़र आ रही है, अफसोस इस वक्त ऐसी कोई राजनीतिक शक्ति – संगठन नही है, जो उपजे जनाक्रोश – जनाकांक्षा को फलीभूत कर सकें।
*क्या है फार्म 17 सी ? जिसको चुनाव आयोग से जारी कराने के लिए एडीआर, महुआ मोइत्रा और पवन खेड़ा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं लगाई !*
Conduct Of Election Rules 1961 के अधीन बनाए गये अतिमहत्वपूर्ण प्रावधान फार्म 17 सी है। यदि चुनाव आयोग फार्म 17 सी को जारी कर देगा तो भारत के आम मतदाताओं को यह जानकारी आसानी हो जायेगी कि *किस मतदान केंद्र में कितने मत पड़े, कौन सी सरल क्रमांक की ईवीएम कौन से मतदान केंद्र में लगी है एवं उसमें कितने मत पड़े, हर मशीन में कितने मत पड़े।
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष फार्म 17 सी जारी नही करने के लिए जो तर्क दिया वह वास्तव में तर्क नही कुतर्क है। चुनाव आयोग ने हलफनामे मे कहा है, कि चुनाव आयोग के पास मानव शक्ति नही है अर्थात स्टाफ की न्यूनता है, *यह कौन सी नई बात है ?* चुनाव आयोग के पास अपना कोई अमला है ही नही, लेकिन जब चुनाव कराना होता है चपरासी से लेकर बाबू तक, कलेक्टर से लेकर कमिश्नर तक, मास्टर, डाक्टर, पटवारी, पुलिस, फौज सबको चुनाव ड्यूटी में तैनात कर दिए जाते है। इस पूरे  कालखण्ड में आदर्श आचार संहिता के नाम पर जनता के रोजमर्रा के कार्य पूरी तरह ठप्प कर दिये जाते हैं।
चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट से कहती हैं, मी लॉर्ड यदि फार्म 17 सी जारी हो गयी तो देश में अराजकता फैल जायेगी। हम तो यह उम्मीद कर रहे थे, कि सुप्रीम कोर्ट कहेगी कि जारी नही करोगे तो अराजकता फैल जायेगी।
*पूंजीवादी व्यवस्था के अंग उपांग के जनविरोधी आचरण के कारण कहते हैं, जीते कोई हारती जनता है।*
ZEA

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