महिला दिवस पर गीतकार नटेसन मुनि के यादगार गीत आशा भोंसले के नाम “कहीं फूल कहीं कही कांटे”
लिंग संवेदनशीलता पर प्रसिद्ध गायिका आशा भोंसले द्वारा गाया गया अंतिम हिंदी गाना जो अमूर्त बन गया।
नमचलों की संवेदनशील हरकतों पर प्रसिद्ध लेखक”नटेसन मुनी” द्वारा लिखित जिसे स्वर मधु “आशा भोंसले” ने गा कर इस गीत को अजय – अमर बना दिया।


“कहीं फूल, कहीं कांटे” यह गाना अपने आपमें समाज मे एक अलग मुकाम रखता है जो समाज की विकृतियों को दर्शाता है। इस गाने के लेखक “फ़िल्म मेकर निर्देशक नटेसन मुनी ने समाज की विसंगतियों को देखते हुये एक लघु-फ़िल्म बनाने का निर्णय लिया “और लक्ष्मण रेखा” के नाम से एक कहानी लिखी जिसमे समाज की विकृतियों को दर्शाते हुये महिलाओं को सशक्त बनाने का संदेश देते हैं। नटेसन मुनी अपनी उस लधु फिल्म में स्वयं की गाना लिखा है। नटेसन मुनी ने पहले भी देश भक्ति पर कई गाने लिखे और उस पर अल्बम भी बनाये हैं जो यूट्यूब पर चल रहे है। वह अपनी फिल्म “लक्ष्मण रेखा” के लिखे अपने गाने के बारे बताते हैं कि यह गाना मेरे लिये यादगार बन गया है। वह बताते हैं – 2016 में, आशा भोंसले ने दिल्ली आयीं थीं, तब दिल्ली की एक सामाजिक संगठन “पाथफाइंडर्स क्लब ऑफ इंडिया” द्वारा एक हिंदी लघु फिल्म “लक्ष्मण रेखा” बनाई गई थी, जिस में लिंग संवेदीकरण पर नटेसन मुनि ने “कहीं फूल कहीं कांटे” एक गीत लिखा था। उस गीत को गवाने के लिये, कई गीत कारों के चक्कर लगाते हुए जब उस्ताद उस्ताद अली अकबर ख़ान की बेटी के पास गये और नटेसन मुनि ने उनसे आग्रह कर किसी वर्कर उन्हें गाना गाने के लिए मना तो लिया, लेकिन उन्हें उस गाने की रिहर्सल करने में तीन दिन लग गए, अंततः उन्होंने भी मना कर दिया, नटेसन मुनि बताते हैं की अंत मे आशा दीदी के पास गये और उन्हें बहुत बिनती कर गाने के लिये नमाया लिया और अंत मे आशा भोंसले जी यह गाना “कहीं फूल हैं, कहीं कांटे हैं” को गाया था, उस समय हिंदुस्तान टाइम्स के “एचटी सिटी” पेज में भी यह रिपोर्ट छपी थी जिसमे आशा जी ने अपनी बाइट देते हुए इस “फूल और कांटे” गीत का उल्लेख किया था। उन्होंने पत्रकार से कहा कि “मेरे गायकी जीवन के तीन इतने मुश्किल गाने थे जिन्हें गाने का फैसला लेने में कई दिन लग गए”।


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