स्वर्गीय अब्दुल समद का जीवन आस्तिक था : डॉ खालिद मुबश्शिर

प्रसिद्ध रचनात्मक आलोचक और पत्रकार हक्कानी अल-कासिमी के दिवंगत पिता बेहद सुदूर विचार, मधुर स्वाभाव सादगीपसंद, स्वाभिमानी, हमदर्द और समय की सदूपयोग करने व्यक्तित्व के धनी इंसान थे।

प्रसिद्ध रचनात्मक आलोचक और पत्रकार हक्कानी अल-कासिमी के दिवंगत पिता बेहद सुदूर विचार, मधुर स्वाभाव सादगीपसंद, स्वाभिमानी, हमदर्द और समय की सदूपयोग करने व्यक्तित्व के धनी इंसान थे।

स्वर्गीय अब्दुल समद का जीवन आस्तिक था : डॉ खालिद मुबश्शिर

स्वर्गीय अब्दुल समद साहिब

प्रसिद्ध रचनात्मक आलोचक और पत्रकार हक्कानी अल-कासिमी के दिवंगत पिता के लिए शोक सभा।

 

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एस. ज़ेड.  मलिक (स्वतंत्र पत्रकार)
नई दिल्ली – पिछले दिनों प्रसिद्ध रचनात्मक आलोचक और प्रसिद्ध पत्रकार हक्कानी अल-कासिमी के पिता स्वर्गीय अब्दुल समद साहिब के पुण्य एवं स्मरण के लिए डॉ खालिद मुबश्शिर के आवास स्थित अबुल फजल एन्क्लेव में शोक सभा आयोजन किया गया। जिसमे उनके अपने परिवार के अतिरिक्त अपने सगे-सम्बन्धी, मित्रों एवं हमदर्दों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
इस अवसर पर शोकाकुल सभा को संबोधीत करते हुये सहायक प्रोफेसर डॉ खालिद मुबश्शिर ने कहा कि जीवन में कुछ ऐसे प्रस्थितियां आती हैं जिनका न चाहते हुये भी सामना करना पड़ता हैं। जैसे माता-पिता की मौत, आज हमारे बीच हक्कानी साहब हैं और वह किस दर्द से गुजर रहे हैं, हम इसे अच्छी तरह महसूस कर सकते हैं। उन्होंने कहा स्वर्गीय अब्दुल समद साहब का जीवन पूर्णतःआस्तिक था। अर्थात धार्मिक था। इस से पहले उनके व्यक्तित्व और उनके सेवाओं का पता नहीं था, लेकिन उनके इस त्रासदी के बाद, उनके द्वारा लिखित स्मर्णीय लेख जब प्रकाश में आया तो उसे पढ़ने के बाद पता चला कि उनमें गुणों का भंडार। उन्होंने अपने लेख में नबी के तरीके के तहत बच्चों के सभ्यता संस्कार और भविष्यवाणी पद्धति को बड़े ही सोंच विचार और योजनाबद्ध तरीके से समझाने का प्रयास किया है।
  चालीस साल पहले इन्होंने अररिया को अपना कार्यक्षेत्र के रूप में चैनियत कर प्रयोगशाला के रूप इस्तेमाल किया और अपने पैतृक गांव बगढिरा में जहां युवाओं को शिक्षा के लिये प्रोतसाहित करना बड़ा ही चुनौतीपुर क़दम था, उस चुनौती को स्वीकार करते हुए आने वाली पीढ़ीयों के उज्जवल भविष्य के मद्देनज़र युवाओं को प्रशिक्षित और उन्हें अध्ययन के लिए प्रोत्साहित करने विचार स्वरूप एक प्रशिक्षण संस्थान के रूप में अल-किताब, अल-खलील मेमोरियल लाइब्रेरी, के नाम से किताबों का बड़ा संग्रह, स्थापित किया तथा इस्लामिक दृष्टिकोण से एक ऐसा बैंक का भी स्थापित किया जो ब्याजमुक्त था, इस्लाम के तहत मुस्लिम समाज मे ब्याज लेना और देना दोनों हराम क़रार दिया गया जिसे घिनौनी दृष्टिकोण से देखा जाता है, इसके मद्देनजर इन्होंने एक ब्याजमुक्त बैंक हंड्रेड नाम से एक गैर-लाभकारी बैंक की स्थापना की।
इस सभा मे उपस्थित मासिक पत्रिका “योजना” के संपादक अब्दुल मनन साहिब ने मरहूम को स्मरण करते हुए कहा, “मैं पहली बार उनसे 1958 में मिला, और उनके साथ यात्रा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, और यात्रा के दौरान उनके साथ कुछ पल बिताने पर एक सुखद एहसास और एक नया अनुभव प्राप्त हुआ, उनकी जितनी भी प्रसंशा की जाए वह कम ही होगा, मृदंग उर्दूभाषी और उर्दू साहित्यतिक रचनाकार थे, तथा वह बेहद सुदूर विचार, मधुर स्वाभाव सादगीपसंद, स्वाभिमानी, हमदर्द और समय की सदूपयोग करने व्यक्तित्व के धनी इंसान थे। मुझे तो उनपर और उनके उर्दू साहित्यिक रचनायों पर गर्व और मैं समझता हूं कि हर उर्दूभाषी समुदायों को उनपर गर्व करना चाहिये, इसलिये की इनलोगों के कारण ही आज उर्दू जगह ब जगह और हम जैसों में उर्दू जीवित है। 
इस अवसर पर “कंदील” के संपादक अब्दुल बारी कासमी ने अपने शोक शब्दों में कहा कि दिवंगत बहुत अच्छे इंसान थे, उन्हें भी पठन- पाठन का बेहद शौक़ रखते थे और दूसरों को पढ़ने का शौक दिलाया करते थे। उन्होंने नई पीढ़ी और युवाओं के प्रशिक्षण के लिए एक संस्था के रूप में अकेले काम किया, उन्हें चित्रकला की भी महारत हासिल थी। उनका स्मारक स्वरूप अल-किताब अलखलील पुस्तकालय सम्मारक के रूप में मौजूद है। जो काम लोग बड़े शहरों में किया करते हैं उस काम को मरहूम ने अपने सीमांत क्षेत्र में जमा कर लोगों को अचंभित कर दिया। उन्होंने हदीस में उल्लेख करते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति की लंबी उम्र है और उसके कर्म हैं अच्छा है, तो वह जन्नत में जाएगा। और मरहूम में ये दो गुण मौजूद थे।
वहीं डॉ. नोमन कैसर ने कहा कि चाचा अब्दुल समद का जीवन जो मैंने देखा वह संघर्ष से भरा था और जीवन एक यात्री की तरह था, दुनिया पाने की कोई लालसा और न इच्छा थी, वे हमेशा एक लंबी दूरी तय करने वाले एक यात्री की तरह रहा। मेरा उनके साथ पच्चीस वर्षों का एक गहरा रिश्ता बना रहा। वह एक बहुत सक्रिय व्यक्ति थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन लोगों को जगाने में बिताया। उन्होंने सभी बच्चों को अच्छी शिक्षा दी। उन्होंने शिक्षा के महत्व को महसूस किया। अलखलील मेमोरियल लाइब्रेरी में बड़ी संख्या में इस्लामी और ऐतिहासिक उपन्यास मौजूद। , समाज और गरीबों के लिए बहुत सहानुभूति है रखते थे।
डॉ. मंज़र इमाम ने अपने भाषण में कहा कि श्री अब्दुल समद के साथ दो संक्षिप्त बैठकें हुईं, यह मेरे जीवन का एक बहुत ही यादगार क्षण रहा। हम महसूस करते हैं कि यह एक ऐसा आघात है जिससे उबरने में लंबा समय लगता है।
मशहूर पत्रकार मौलाना अब्दुल कादिर शम्स कासमी के बेटे मौलाना अम्मार जामी कासमी ने कहा कि उन्हें दिवंगत से मिलने के कई मौके मिले। वह बहुत ही दयालु, सरल और सज्जन व्यक्ति थे।
 मुझे माफ कर दो
इस अवसर पर प्रसिद्ध कवि और लेखक अता आबिदी ने कहा कि उनका हक्कानी के साथ तीन दशक से अधिक समय से संबंध रहा है। इसे प्राप्त करना अफ़सोस की बात है। हक्कानी साहिब में जो विनम्रता थी, वह आज भी है। जो पहले था तो आज भी है। हाँ, हर किसी को एक न एक दिन दुनिया छोड़नी ही पड़ती है। अल्लाह हम सभी को स्वर्गीय हक्कानी साहब के गुणों का पालन करने में मदद करे।
हक्कानी अल-कासिमी ने दिवंगत पिता का जिक्र करते हुए कहा कि स्वर्गीय अब्दुल समद साहब मेरे पिता ही नहीं मेरे शिक्षक भी थे। मैंने उनके साथ उर्दू, अंग्रेजी और अन्य विषयों का अध्ययन किया। मेरे अन्य भाई गणित और अंकगणित में बहुत मजबूत हैं। , मेरे पिता की ड्राफ्टिंग भी बहुत अच्छी थी, उनके पास केवल मैट्रिक पास था लेकिन उनके पास आज के उच्च डिग्री धारकों की तुलना में अधिक अध्ययन की गुंजाइश थी, उनके पास पत्रिकाओं का एक विशाल संग्रह था। ट्वेंटीथ सेंचुरी, शमा, मनाडी, मौलवी, अस्ताना, आदि अपने पिता के पास देखे गए, स्पष्ट है कि अबू को पत्रिकाएँ पढ़ने का बहुत शौक था, खूब पढ़ता था, खासकर तीन दिन की दावत बहुत ध्यान से। मैं पढ़ता था, मुझे अपने पिता पर गर्व है और उन्हें भी मुझ पर गर्व था, वह मुझसे बहुत प्यार करते थे। उनमें गुणों का एक पुलन्द था।
ZEA

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