इंडिया इस्लामिक सेंटर पर संकट के बादल मंडराने लगे?

इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर का चुनाव - किसे बदलेगा? खुद सेंटर या चुनाव लड़ने वाले?

जो टीम 25 वर्षों में इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर का उद्धार नहीं कर पाई, आज वह टुकड़े टुकड़े गैंग बना कर किसका उद्धार करेंगी। 

एक हंगामा सा बरपा है – इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंट के चुनाव का बैल्ट पेपर चोरी – कहीं चोर ही शोर तो नहीं मचा रहा है?

एस. ज़ेड. मलिक

इंडिया इस्लामिक सेंटर – इस चुनाव के बाद क्या बनेगा ? अखाड़ा या अड्डा – चार बैलेट की चोरी कहीं यह एक साजिश का हिस्सा तो नहीं?
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जो टीम 25 वर्षों में इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर का उद्धार नहीं कर पाई, आज वह टुकड़े टुकड़े गैंग बना कर किसका उद्धार करेंगी।  
नई दिल्ली – अभी आने वाले 11 अगस्त को इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर के मैनेजमेंट कमेटी का चुनाव होना है , इस चुनाव में मुस्लिम कमेटी के बड़े बड़े  सफेद पॉश मुस्लिम कमेटी के अपने आपको रहनुमा कहने वाले कुछ तो इस चुनाव में अपना भाग्य आजमा रहे हैं, और कुछ अपना ज़ोर आज़मा रहे हैं। सच तो यह है कि एक दो को छोड़ कर बाकी क़ौम के रहबर नहीं बल्कि रहज़न है। अर्थात मार्गदर्शक नहीं बल्कि ?????.।
 इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर के नाम से ऐसा प्रतीत होता है जैसे यह भारत का बहुत बड़ा कोई मुसलमानों का इस्लामिक संस्था है, परन्तु यह सच बिल्कुल भी नहीं है , यह हास्यपद है, एक एक मिथ्य है। 
दरअसल जिन लोगों ने इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर के नाम से निब रखी, उनका उद्देश्य रहा होगा कि यहां इंडिया इस्लामिक कल्चर, यानी भारतीय इस्लामिक संस्कृतक को दर्शाना, और उसी के परिदृश्य में जो भवन बनाया गया और जो उसमें गुम्बत जो बनाया गया उसमें कुरान की आयात लिख कर इस्लाम का एक प्रतीक बनाना ही उनके उद्देश्य को उजागर करता है। जबकि उसकी बुनियाद अंततः IICC एक ‘सोसाइटी’ अप्रैल 1981 में पंजीकृत की गई।
सोसायटी के मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन, यानी इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर के मूल हस्ताक्षरकर्ता यह 7 लोग ही थे
    (1) जनाब हकीम अब्दुल हमीद – पहले अध्यक्ष बनाये गए
    (2) मुफ़्ती अतीकुर रहमान – उपाध्यक्ष
    (3) श्री बदर-उद-दीन तैयबजी, आईसीएस – निदेशक
    (4) श्री सैयद एस. शफ़ी – संयुक्त निदेशक
    (5) चौधरी मो. आरिफ- सचिव
    (6) श्री एम. डब्ल्यू. के. यूसुफजई – कोषाध्यक्ष
    (7) बेगम आबिदा अहमद – सदस्य रहे । 
इन लोगो ने जो मेहनत की, उसका परिणामस्वरूप लोधी रोड जैसी जगह पर भूमी का एक प्रमुख टुकड़ा आवंटित किया। जिसे अब मिलना मुश्किल हि नही न मुमकिन है। मैं नहीं समझता कि आज जो वर्तमान में लोगो इस धरोहर के ज़िम्मेदार बनना चाहते हैं वह  इसमे कुछ अलग से नया कर सकते हैं? कोई शैक्षणिक संस्थान चलाना कोई बड़ी बात नहीं, बड़ी बात तब होगी जब इस्लामिक क्लचर वहां दर्शाया जाये, इस्लामिक कल्चर का म्यूज़ियम, इस्लामिक सभ्यता, वहां दिखाई देना चाहिये था, जो दूर दूर तक नही है। 
 2000 के बाद जो इस संस्थान के ज़िम्मेदाराना चुने गये वह वर्तमान में भी जगजाहिर है, वहां अब तक जितने भी चेहरे दिखाई पड़ते है वह सब अपने आपमे दबंग, अफसर शाही, दलाल, और व्यापारी, जो घमंड में चूर ही दिखाई देते हैं।
  
 बेशक सीराजुद्दीन क़ुरैशी साहब ने चाहे क़र्ज़ ले कर ही इस बिल्डिंग को बनवाया और जो काम इसमे शुरू किया गया वह सरहनीय था, उसमें इस्लामिक का अक्स 2009 से 2014 तक वर्ष व तिथि आगे पीछे हो सकता है, दिखाई था, पर वह क्यूं बन्द कर दिया गया इसका सही जानकारी सीराजुद्दीन क़ुरैशी साहब ही दे सकते हैं। इन्ही की टीम के नेतृत्व में हैदराबाद के एक भारतीय स्लामिक स्कॉलर मनुव्वर साहब जो आज भी सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं, वही यहां पर  प्रतिभाशाली बच्चों में इस्लाम के प्रति जागरूक करने तथा उनके अंदर छुपी प्रतिभा को उभारने के उद्देश्य से एक संस्था चला रहे थे जिसकी व्यावस्था वर्तमान में जानाब साजिद साहब जो इस समय इंकलाब के एडिटर हैं और काज़मी साहब जो वर्तमान में स्टार न्यूज़ एजेंसी चला रहे हैं, यह लोग उस समय के आईआइसीसी के अध्यक्ष जानाब सीराजुद्दीन क़ुरैशी साहब, एडवोकेट नोमान साहब, सफदर खान साहब, एस एम खान साहब और कुछ नामीग्रामी क़ौम के हमदर्द की निगरानी में एक संस्था के रूप मे संचालन किया जा रहा था, तब वहां कुछ चहल पहल दिखाई दे रहा था। उस समय इस्लामिक सेंटर जैसा प्रतीत होता था परन्तु उसके बाद न जाने कब और कैसे वह एक दम से बन्द हो गया – यह अंदर की बात है, इसका पता नहीं चल सका। किसकी नज़र लग गई समझ मे नही आया। बहरहाल – आज जो लोग भी आईआइसीसी के ज़िम्मीदार पद के लिए उम्मीदवार बने हैं उनमें से शायेद एक को छोड़ कर सभी एक समय में सीराजुद्दीन क़ुरैशी साहब के एक मज़बूत टीम मेम्बर हुआ करते थे। फिर सवाल उठता है उस 25 वर्षों के दरमियान आईआइसीसी का कोई विकास नहीं हुआ, थ किसी ने उस समय सवाल क्यूं नहीं उठाया, जबकि कलीम हफ़ीज़ जैसे एक होटल व्यापारी अब 300सौ ₹ का हिसाब मांगते हैं जिसका वीडियों वाइरल सभी जगह वाइरल हो गया और लगभग सभी सदस्यों उनके द्वारा उठाये गये सवालों का समर्थन किया, और फिर आरोप लगाने वाला वही इंसान आज सीराजुद्दीन क़ुरैशी साहब के टीम में उपाध्यक्ष पद के लिये चुनाव लड़ रहे हैं। और तो और एक ताज्जुब की बात और देखने और सुनने को मिली, जिन लोगों ने सीराजुद्दीन क़ुरैशी साहब के उम्र के मामले को कोर्ट में ले गए और मजबूरन कोर्ट को अपना एक ऑब्जर्वर बहाल करना पड़ा, वह दोनों इंसान भी आज सीराजुद्दीन क़ुरैशी साहब के पैनल में शामिल हो कर बोर्ड ऑफ ट्रस्टी के उम्मीदवार है, इसका मतलब तीनो के साथ सौदेबाज़ी तय हो गई होगी इसी लिये आज यह तीनों सीराजुद्दीन क़ुरैशी साहब के पैनल यानी टीम शामिल इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर पर अपना क़ब्ज़ा बरक़रार रखना चाहते है, 4 बैलेट की चोरी, यह भी – साजिश का एक हिस्सा है। चोरी और सीना जोरी, यह साबित के दिया कि हम आरएसएस के एक सक्रिय टीम के सदस्य है जिसके ट्रेनिंग का लाभ इस आईआइसीसी के चुनाव में लेने की कोशिश की है, “मेरा ही क़त्ल करके इल्ज़ाम मुझ पे लगाते हो – खुद क़ातिल, खुद ही मुंसिफ, खुद ही वकील, हो तुम – हम इंसाफ तुम से क्यों करें, सच कहने वालों को तुम फांसी लगाते हो”।। 
बहरहाल स्पेशल जीबीएम की मीटिंग में यह बात आई थी कि 75 वर्ष की उम्र में चनाव लड़ सकते हैं या नही , इस मुद्दे पर कुछ लोगों ने सीराजुद्दीन क़ुरैशी साहब को दुबारा अध्यक्ष पद का चुनाव लड़वाने की पैरवी कर रहे थे जबकि ज़्यादा तर लोग, उन्हें इस चुनाव से बाहर रखना चाहते थे और कुछ लोग तो उन्हें संस्था के गतिविधियों से ही बाहर ही रखना चाहते थे, लेकिन उनकी आजीवन सदस्यता तो समाप्त तो नहीं किया जा सकता। इस चुनाव में उन्होंने अध्यक्ष पद के लिये अपने विशेष अनुयायी डॉ. माजिद को ले कर आये, वही मेम्बर इक्सक्यूटिव के पद के लिये अपने बेटे को आप खुद तो बोर्ड ऑफ ट्रस्टी के पद के उम्मीदवार तो हैं ही, शायेद मक़सद यह है कि किसी भी कीमत पर मलाई की प्लेट नहीं छोड़ेंगे, चाहे कोई कुछ भी कहले?
वहीं कांग्रेस के दिग्गज सलमान खुर्शीद, रिटायर आईएएस, अफ़ज़लमनुल्लाह साहब, रिटायर आरएएस इबरार साहब, इत्यादि अब सवाल यह है कि इस संस्था के वोटर्स कितने सजग और समाज हितैषी और समझदार हैं, और किसे संस्था का असली कार्यवाहक मान कर वोट करते हैं यह संस्था के वोटर्स का भी इम्तेहान होगा। 
 जैसा कि आज सदस्यों में इस बात का खौफ है कि संस्था कहीं गलत हांथों में चला जाये तो इस पर आरएसएस का क़ब्ज़ा हो जायेगा, जैसा कि जामा मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी , अलीगढ़ यूनिवर्सिटी का हुआ वह आज पूरी तरह से आरएसएस के क़ब्ज़े में है। इस संस्था का भी हाल यही होने वाला है। इसे बचाने के लिये इस समय सबको पैनल एक जुट होते और किसी गैर राजनीतिक प्रशासनिक व्यक्ति को साथ दे कर उसे जिम्मेवारी सौंप देते, लेकिन यह सम्भव नहीं है , मुसलमान स्वार्थी हो चुका है , हराम और हलाल की पहचान उसके अंदर समाप्त हो गई है, उसे अच्छे या बुरे से कोई फर्क नही पड़ता, आज हिंदुस्तान में मोसल्मानों को मोब्लिंचिंग कर मराया जा रहा है , सीराजुद्दीन क़ुरैशी साहब ने कब आवाज़ उठाई, आज वक़्फ़ की भूमि हड़पने के लिये सरकार ने नया विधयेक ला रही है, क्या सीराजुद्दीन क़ुरैशी या डॉक्टर जो मुस्लिम मोर्चा का दम भर रहे हैं, अपने  मोदी जी से या शाह जी इस विधेयक को रोकवाने की कोई बात की? इस मसले से किसी भी इस्लामिक कल्चर सेंटर के नाम पर जो चुनाव लड़ रहे हैं उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। 
बहरहाल – राहत इंदौरी साहब का वह शेर याद आ रहा है।
लगेगी आग तो आएंगे कई मकान ज़द में – यहां अकेला मेरा मकान थोड़े ही है।   
ZEA

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