इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर का चुनाव, देश या राज्य का चुनाव या सुसाईटी का चुनाव?
इसबार कोई ऐसा व्यक्ति ज़िम्मीवार बने जो इस सेंटर को बिजनेस हब न बना कर इसमें इस्लामिक कल्चर ही पैदा करे।
आईआईसीसी का चुनाव जीत कर कोई भी आये वह ऐसा काम करे जिसमे इस्लामिक मेज़ियम , इस्लामिक कल्चर से भरी लाइब्रेरी और इस्लामिक सभ्यता और संस्कार का माहौल भी वहां झलकना चाहिये।
इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर – क्लब बनाम इस्लामिक सांस्कृतिक धरोहर?



आईआइसीसी के चुनाव में शिक्षित, उदार और निःस्वार्थ सेवा करने वाले आर्थिक विशेषज्ञ, साहित्यक तथा सभ्य संस्कारी व्यक्ति को ही इसमे आना चाहिये –

आईआईसीसी का चुनाव जीत कर कोई भी आये वह ऐसा काम करे जिसमे इस्लामिक मेज़ियम , इस्लामिक कल्चर से भरी लाइब्रेरी और इस्लामिक सभ्यता और संस्कार का माहौल भी वहां झलकना चाहिये।
वक़्त का तक़ाज़ा है, हालात के साथ साथ शक्ल भी बदलनी चाहिय।
मंज़र , पसमंज़र हालात के तहत ख़्यालात भी बदलनी चाहिये।।
ज़िन्दगी उलझी हुई और उलझने हर सिम्त है, इन उलझनों से जिहाद कर अब हालात बदलनी चाहिय।।
एस. ज़ेड. मलिक
इन दिनों नई दिल्ली के लोदी रोड स्थित इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर के प्रबंधकीय कमेटी का 11 अगस्त में चुनाव होने वाला है, यह चुनाव ऐसा लग रहा रह है जैसे विधानसभा या लोक सभा चुनाव होने जा रहा है, इसलिये रेस्तरां और होटलों में मीडिया का मैनेज किया जा रहा है और उन्हें महंगे महंगे खाना खिलाया जा रहा है, जिसके लिये काफी गहमा गहमी चल रही है, कइएक खेमा चुनाव लड़ने के लिये तैयार है। अब कई लोग आईआइसीसी अर्थात इस्लामिक क्लचर सेंटर की व्यावस्था सम्भालने के लिये अग्रसर हैं,

शायेद बायलॉज के अनुसार पुराने अध्यक्ष सिराजुद्दीन कुरैशी साहब की चुनाव लड़ने की उम्र नहीं रही, यही हंगामे के साथ इसी धरोहर के कुछ सदस्य हाईकोर्ट का दरवाजा भी खट-खटा कर ऑब्जर्वर भी बैठा दिया शहएड प्रावधान के अनुसा 75 वर्ष जिस सदस्य की आयु हो जाएगी उसे किसी भी पद के लिये चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं रहेगा, परंतु इन्ही सदस्यों में से एक स्कॉलर ने आज उस क्लॉज को प्रदर्शित कर यह बताने की कोशिश की है कि
Rule Says:
– *Any member under the age of 75 can run for the position of President of the India Islamic Cultural Center.*
– *However, there is nothing written that says they must leave the president’s position upon turning 75.*
*Do you understand, or will you continue to mislead people with pointless logic?*
अर्थात रूल क्या कहता – इसे हिंदी में भी पढिये और जानिये – नियम कहता है:
– *75 वर्ष से कम आयु का कोई भी सदस्य इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर के अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ सकता है।*
– *हालाँकि, ऐसा कुछ भी नहीं लिखा है जो कहता हो कि उन्हें 75 साल का होने पर अध्यक्ष का पद छोड़ देना चाहिए।*
*क्या आप समझते हैं, या व्यर्थ तर्क से लोगों को गुमराह करते रहेंगे?* इनके इस क्लॉज को आज प्रदर्शित करने यह स्पष्ट हो जाता है, यह साहब सिराजुद्दीन क़ुरैशी साहब को अभी हटाना नहीं चाहिय था। या कांग्रेसी सलमान साहब को आयु के प्रति किसी कोई विरोघ नहीं करना चाहिये, बात तो सही है। लेकिन खेला तो हो गया, यही बात यदि उस समय हाईकोर्ट में साबित कर दी गई होती तो शायद आज सिराज साहब अपने स्थान व पद पर बने रहते।
बहरहाल, बात आई गई और अब समाप्त हो गई अब दुसरीं ओर कांग्रेस के दिग्गज दबंग नेता सलमान खुर्शीद साहब अपने दल बल के साथ इस व्यावस्था के अध्यक्ष पद के दावेदार हैं । इनके दल में और नेतृत्व में बीओटी और एमएसी यानी मेम्बर इक्सक्यूटिव कमेटी। सलमान खुर्शीद साहब केंजीतने बाद इंडिया इस्लामिक सेंटर राजनीतिक का अखाड़ा ज़रूर बन जायेगा,

तो तीसरी तरफ रिटायर्ड आईएएस बिहार कैडर जनाब अफ़ज़ल अमानुल्लाह साहब इनके दल में और नेतृत्व में एक उपाध्यक्ष 6 लोग बीओटी और एक एमएसी, – अफ़ज़ल अमानुल्लाह साहब, जिन्होंने अपनी एक वीडियों जारी कर सदस्यों से बिनती की है, और जिनकी बिनती जाएज़ लगती है, लेकिन उनके टीम में एक सदस्य ऐसा है जिसके जीतने बाद वहां नौकरी देने वाली दुकान चलाने की संभावना है। ऐसे शरीफ और समुदायें हितैषी व्यक्ति के साथ यदि कोई गलत इंसान दो कदम अपने रास्ते चलता है तो देखने वालों की दृष्टि में एक शरीफ व्यक्ति का व्यक्तित्व धूमिल पड़ जाता है। और फिर वहां अलीग मगरमच्छों की एक बड़ी लॉबी स्थापित है जो किसी भी सही लोगों को न आने देंगे और न खुद सही काम ही करेंगे, सारे अलीग मोदी जी के चेला नज़र आते हैं, जो क़ब्ज़ा और बेचना जानते हैं परन्तु बनाना और संवारना नहीं जानतें। इन लोगों ने तो इस्लामिक कल्चर सेंटर को इस्लामिक कल्चर के नाम से एक मोर्डरन इस्लामिक क्लब बना दिया है, बस वहां कमी है तो सिर्फ एक स्विंग पुल, कैसिनो और बार की, जहां लोग जुआ खेलें और हांथों में शराब ले कर युवक युवतियां थिरकती दिखाई दें। अफ़ज़ल अमानुल्लाह साहब को यह जीतने नहीं देंगे, उसकी वजह यह भी की उनके साथ एक लाइज़नर खड़ा हो चुका है।

चौथे जानाब आसिफ हबीब साहब अध्यक्ष पद के दावेदार हैं जो कि यह भी मुस्लिम सफेदपोश बड़े व्यापारिओं में इनकी गिनती होती है। इन सब पर सिराजुद्दीन कुरैशी कहीं न कंही एक रत्ती बराबर ही सही एहसान है। मैं समझता हूं इन सब को जोड़ने वाले सिराजुद्दी कुरैशी साहब ही हैं, मैंने इनकी कामयाबी भी देखी है और ना कामयाबी भी, इनका उरूज भी देखा और इनको आज अस्त होते हुए भी देखनरहा हूँ, इतना ज़रूर कहूंगा इनमें घमंड नहीं देखा। इनके इसी अच्छाई की वजह लोग जुड़ते रहे और लूटते रहे। आज इनके अपने ही इनसे दामन बचाने लगे हैं।

पांचवे जानाब अबरार साहब जो आईआरएस रिटायर्ड हैं, इन्हों ने सिराजुद्दीन कुरैसी साहब को पद छोड़ने पर मजबूर कर दिया, इन्होंने सिराजुद्दीन कुरैसी साहब की की उम्र पर सवाल उठाते हुए मामला न्यायलय तक पहुंचा दिया इन्ही के कारण आज आईआइसीसी का चुनाव न्यायलय की निगरानी में होने जा रहा है। यह जानाब ने यह साबित कर दिया टेक्स कैसे वसूला जाता है।
मुझे लगता है कि आईआइसीसी में पद पाने की लाइन में लगे हुए लोग अधिकतर व्यापारी और लाइज़नर ही हैं जो समाज या समुदायें के हितैषी नही हैं बल्कि संस्था को 5 वर्षों तक अपने निजी कार्यों के लिये उपयोग करने के लिये होड़ में जद्दोजहद कर रहे हैं। इसलिये की सिराजुद्दीन क़ुरैशी साहब को 25 वर्षों से उससे जुड़ा उनके कार्यकाल को भली भांति देखा, उनके कार्यकाल में संस्था में कोई विशेष उन्नति नही देखी। हां, इतना ज़रूर देखा कि वहां बड़े विदेशी व्यापारिओं की मीटिंग और वीवीआइपी लोगों की पार्टी, शादियों की पार्टी, ग़ज़ल की शाम और अनेकों प्रकार के सामाजिक कार्यक्रम होता रहा है। नाम के अनुकूल वहां कोई भी इस्लामिक संस्कार देखा न इस्लामिक संस्कृति देखा न सभ्यता देखा तो मुसलमानों का सही व्यवहार देखा घमंड में चूर लोगों को आस्तीन मिलाते देखा। काश की इस संस्था को भी सरकार अपने अधीन चलती तो कम से कम थोड़ा बहुत दिखावे का ही सही इस्लामिक संस्कृति ज़रूर दिखाई देता।
पिछले महीने इसी संदर्भ में वहां इसी चुनाव के सिलसिले में एक हंगामी बैठक चल रही थी बैठ बहुत मामूली बात पर लोगों को उलझते देखा, जिसका कोई औचित्य नही था, बहरहाल उस बैठक में रिटायर्ड पुलिस अधिकारी जानाब कमर अहमद, भी मौजूद थे, मीटिंग बाद वह अपने घर के लिये जब रवाना हो रहे थे तो कम्पस में अचानक से उनका सामना हो गया, मैंने, सलाम किया और तुरंत उनसे सवाल पूछ दिया, सर, मीटिंग का क्या परिणाम निकला, उन्होंने तुरंत कहा, क्या होना है चुनाव होना नये लोगों को चुना जायेगा किसी नये लोगों ज़िम्मेदारियां दी जायेगी, फिर मैंने तुरंत दूसरा सवाल किया, सर इस बिल्डिंग का नाम इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर है, क्या यहां कल्चरल कार्यक्रम या कोई इस्लामिक सांस्कृतिक ऐसी कोई चीज़ नज़र तो नहीं आती इस पर आपकी क्या राय है, उन्होंने कहा, यहां गैर इस्लामिक काम क्या होता है, एक भी बताओ, तुरंत मैन उनसे कहा , यहां शादियों की पार्टियां, संगीत ग़ज़ल और अनेक जो गैर इस्लामिक है, तो रूरन्त उनका दो टूक जवाब मिला इसका मेंटेनेंस कहां से चलेगा , सदस्य कोई चंदा देता है क्या? और फिर वह अपने गाड़ी में बैठे और चले गये, इनका इस तरह का बे तुका जवाब, इस बिल्डिंग का नाम बदलने पर मजबूर करता है, फिर तो इस संस्था को चलाने के लिये, मोजरा घर, बना दिया जायेगा तो पैसे की कमी नही होगी। इस प्रकार के मानसिकता के लोग यहां पर सदस्य हैं।
बहरहाल सलमान खुर्शीद साहब इस समय उम्र शायेद 73 वर्ष की हो चुकी है, अब इनके साथ सवाल यह खड़ा होता है कि जब यह 73 वर्ष के हो चुके हैं तो 2 वर्षों में जीत कर क्या कर लेंगे? प्रावधान के अनुसार क्या फिर से चुनाव होगा? या उन्हें 2 साल का न्यायलय से स्टे दिलवाया जायेगा? कम से कम इस चुनाव में आईआइसीसी के प्रावधान के अनुसार जहां उम्र की सीमा तय की गई है वैसे लोग न उतरें, जिनकी उम्र पूरी होने में 2 साल या 3,4 साल बची हुई है। ताकि उम्र के कारण मध्यवती चुनाव न कराना पड़े जिसके कारण सेंटर के कार्य मे रुकावट पड़ती रहेगी।
अब एक सवाल और जन्म लेता है, इस चुनाव में जो भी लोग अध्यक्ष पद लिये चुनाव लड़ रहे हैं उन्हें देख रहा हूँ कि काफी वीआईपी लोग हैं जो अपने अपने सदस्यों को महंगा महंगा वीवीआइपी वाला खाना खिला रहे हैं, कोई होटलों में तो कोई रेस्तरां में तो कोई किसी कम्युनिटी हाल बुक कर 100 , 200 लोगों को दावाते खिला रहे हैं, और अपने अपने स्तर के अनुकूल स्थानीय सोशल मीडिया वालों को भी काफी कुछ दे रहे हैं, इससे ज़ाहिर होता है कि जो भी पद के लिये चुनाव लड़ रहा है वह सेवा करने के लिये नहीं बल्कि मेवा खाने के लिये यह चुनाव लड़ रहा है। जो जीत जाएगा तो 5 वर्षों तक मेवा खायेगा। इसका मतलब इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर लाभ देने वाली संस्था है। जो जीतने के बाद 5 वर्षों में लखपति से करोड़पति बन जायेगा, करोड़पति से अरबपति बन जायेगा।
एक इंसान और मुसलमान तथा हिंदुस्तान जैसे लोकतंत्र में पैदा होने तथा लालन पालन शिक्षा दीक्षा हिंदुस्तान में होने कारण औरों की तरह मैं भी फ्री में सुझाव ज़रूर दूंगा , स्वीकार करे या न करे इस चुनाव में प्रावधान के अनुसार उन लोगों को ही इस चुनाव में भाग लेना चाहिये जिसमे निःस्वार्थ समाज सेवा की भावना हो और उसकी सेवा करनी उम्र कम से कम 5 साल से ऊपर बची हुई हो, दूसरे युवा पीढ़ी को सेवा करने अवसर देना चाहिये इसलिये की इससे बड़े बड़े पूंजीपति जुड़े हुए है इस संस्था एक भी मेम्बर गरीब नही है ना मध्यवर्गीय है, करोड़पति लोग ही सदस्य हैं, तो उन्हें ही इस संस्था के बेहतरी के लिये सोंचना चाहिए और निःस्वार्थ सेवा करने वाले शिक्षित और साहित्यिइक मधुर वाणी तथा सभ्य संस्कारी वैसे युवाओं को भी सामने आना चाहिए जिनके अंदर समाज को बदलने और बेतर बनाने की भावना हो, यहां से जुड़े पूंजीपतियों को चाहिये कि ऐसे ही युवाओं को प्रोत्साहित करें और उन्हें हर प्रकार से सहयोग करें।
अब पूर्व अध्यक्ष ने अपने बेटे को भी चुनावी मैदान में उतारा हुआ है। यहां भाई भतीजवाद भी नहीं होनी चाहिये।
वैसे पिछले कई वर्षों से इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर लाइजनिंग का अड्डा बन सा गया है, बड़े बड़े सफेद पोशों के वहां ज़ैदी साहेब के कैंटिंग और आईआइसीसी के लांच के बन्द कमरे में बैठे ऐसी की हवा में अपनी अपनी बिज़नेस डील करते देखा है, और आज कुछ लोगों को छोड़ कर जितने भी चेहरे चुनाव में पद के लिए सामने दिखाई दे रहे हैं उनमें से अधिकतर व्यापारी और नौकरी दिलवाने वाले और ठेकेदारी करने वाले और ठेकेदारी की दलाली करने वाले अधिकतर अपनी गर्दन ऊंची कर चल रहे हैं।
वैसे इसमे कोई शक नहीं कि सिराज कुरैशी साहब ने आईआइसीसी को मुस्लिम व्यापारी के एक अड्डे की शक्ल में विदेशों तक पहचान दी है।
लेकिन इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर को जिस मक़सद से जिन क़ौम के सच्चे रहबरों जद्दोजहद करके सरकार से ज़मीन मुहैया किया था , उनके गुज़र जाने के बाद न वह इस्लामिक रहा न इस्लामिक कल्चर ही उसमें देखने को मिला, हाँ इसमे इतना ज़रूर देखने को मिला, यहां जब भी किसी से मिलने आया तक बड़े बड़े घमंडी सफेदपोश बिज़नेस मैन ज़ैदी साहब की कैंटिंग बैठे ज़रूर मिले।
बहरहाल, पता नहीं एक व्यस्था और भी देखने को मिली हो सकता है मेरी नज़रिया गलत हो, और मुझे जानने की उत्सुकता भी है, क्या जो आईआइसीसी का सदस्य होगा वही कैंटिंग चलायेगा? यह एक प्रश्न मेरे मनोमष्टिस्क में हमेशा गूंजती रहती है। मेरे विचार से वहां कैंटिंग व्यावस्था की ओर से होना चाहिये और संचालक प्रबंधक बाहर का बेरोजगार समुदायें के शिक्षित युवा होने चाहिये। हर दो से तीन वर्षों का ठेका के समान होना चाहिये, वहां सदस्यों 25 प्रतिशत की छूट हो और आम ग्रहनको के लिये पूरी पेमेन्ट होनी चाहिये।
बहरहाल इसबार कोई ऐसा व्यक्ति ज़िम्मीवार बने जो इस सेंटर को बिजनेस हब न बना कर इसमें इस्लामिक कल्चर ही पैदा करे। ताकि कोई बाहर से आये तो पता चले कि वाकई यही भारतीय इस्लामिक कल्चर है। इसमे इस्लामिक मेज़ियम , इस्लामिक कल्चर से भरी लाइब्रेरी और इस्लामिक सभ्यता और संस्कार भी वहां झलकना चाहिये।
एस. ज़ेड. मलिक (पत्रकार)


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