पर्यावरण एक बड़ी चुनौतियां – कूड़े का दर्शन

दरअसल कूड़ा हमारे आधुनिक जीवन की एक जरूरी बुराई की तरह है। कूड़े से हम बच नहीं सकते और कूड़े को हम देखना नहीं चाहते।

धन व प्रतिष्ठा ने दो देशों के बीच से लेकर दो परिवार ही नहीं दो मनुष्य के बीच तक अपना पांव पसार कर प्रकृति को सर्वनाश की पराकाष्ठा तक पहुंचाने में लगी है

पर्यावरण एक बड़ी चुनौतियां

मनोज कुमार झा

प्रकृति की सबसे अनुपम कृति यानि ‘मानव’ जिसके हाथ प्रकृति पृथ्वी को सौंप कर निश्चिंत होना चाहती थी। फिलहाल वह इससे अधिक कुछ कर भी नहीं सकती थी। लेकिन इसी मानव ने प्रकृति के सारी बनावट के आगे संकट पैदा कर दिया है। इस संकट से ऊबरने के लिए प्रकृति दिन-रात तत्परता से लगी है लेकिन कुछ भी सूत्र उसके हाथ आने से पहले मानव रोज-रोज नए-नए संकट पैदा कर रहा है।

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आज आधुनिकता के केंद्र में मनुष्य है। मनुष्य अपने भौतिक बिलासिता को पूरा करने के पीछे धन व प्रतिष्ठा अर्जित करने लगी है। धन व प्रतिष्ठा ने दो देशों के बीच से लेकर दो परिवार ही नहीं दो मनुष्य के बीच तक अपना पांव पसार कर प्रकृति को सर्वनाश की पराकाष्ठा तक पहुंचाने में लगी है। अब तो विकसित देश विकाशील देशों की ओर बड़े ध्यान के टकटकी लगाए देख रही है कि कहीं जो कुछ अपने विकास के लिए उसने किया है वही वह तो नहीं करने जा रहा।

थोड़े ही शब्दों में कहें तो पर्यावरण संकट पृथ्वी को भष्म कर समाप्त सकती है। यदि हम समय रहते सचेत नहीं हुए- केवल भारत ही नहीं विश्व के सभी देश को अपनी विकास की आधुनिक परिभाषा को बदलनी होगी। सभी देशों को अपनी सोच बदलनी होगी। दुनिया भर के कार्य और व्यापार के तौर-तरीके बदलने होंगे।

1992 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने जलवायु परिवर्तन संधि और 1997 में क्योटो-कॉल में यह आम सहमति बनी थी कि पृथ्वी को गर्म होने से बचाने में सभी देशों की जिम्मेदारी बनती है। किंतु जिन देशों ने अपने विकास यात्राओं के दौरान सबसे अधिक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन किया है उनका आर्थिक दायित्व अधिक-से-अधिक बनता है। लेकिन विकसित देशों को जो धन व तकनीक उपलब्ध कराने का वादा किया था, उसे वह अमल में नहीं ला रहा है।

पर्यावरण संकट के कारण हम क्या-क्या खोयेंगे इसकी लंबी लिस्ट है- लेकिन मुख्य रूप से हवा, जल, अनाज से सबसे अधिक प्रभावित होंगे। जल संकट से हमने जूझना प्रारंभ कर दिया है। इस संकट से हम थोड़ी-बहुत निजात पा भी लें, लेकिन वायु प्रदूषण के संकटों से हम उबर नहीं पाएंगे। जल प्रदूषण के बारे में थोड़ा देखिए- हमने भारत की लगभग सभी नदियों को प्रदूषित कर चुके हैं। अब हालात धीरे-धीरे और भी गंभीर होते जाएंगे। हमारी नदियों से ही धरती के पेट का पानी का भरण होता है। जिस दिन हानिकारक जीवाणु धरती के पेट के पानी को प्रदूषित कर दिया उस दिन मानव सभ्यता का अंत प्रारंभ हो जाएगा। दुनिया भर के प्रदूषित नदियों का पानी समुद्र में मिल रहा है। हमारा आकूत कचड़ा समुद्र में जमा हो रहा है। समुद्री जीव धीरे-धीरे नष्ट होते जा रहे हैं। वायु प्रदूषण के कारण अनेक प्रकार के मित्र जीवाणु हम खोते जा रहे हैं, इसका तनिक भी अंदाजा हमें नहीं है। पृथ्वी पर जीवनोपयोगी जीवाणु के अभाव का हम पर असर दिखने लगा है। फसलों में बेधरक रसायण उपयोग से जीव-जंतु समाप्त हो रहे हैं। पशु-पक्षी लगातार लुप्त होते जा रहे हैं। यहां यह बताने की जरूरत नहीं हैं कि कौन-कौन से पशु-पक्षी हमने अभी तक खोया है। प्रत्येक व्यक्ति व समाज अपने आसपास यह महसूस कर सकता है कि उसके बीच कौन-कौन थे जो अब नहीं दिखते। प्रकृति को लगातार सहायता करने वाली पक्षियों को पशुओं को हम खोते जा रहे हैं।

भारत की समस्या यह है कि वह विकास की पटरी पर चल रहा है- वह उसे किस स्टेशन ले जाएगा, यह ठीक से विचार कर ही गाड़ी आगे बढ़ाएं। अभी हमारे सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न जो खड़ा है वह है- नदियों को पुनर्जिवित करना। जब तक हम नदियों को पुनर्जिवित नहीं करते तब तक हम जल संकट से निजात नहीं पा सकते। पृथ्वी की जीवनदायिनी क्षमता के सभी अवयवों को हमें पुनर्स्थापित करना होगा। इस कड़ी में हमें दो-तीन सौ साल पीछे जाकर देखना होगा कि हम कहां से अपने जीवनोपयोगी पर्यावरण को बचाने के बदले ध्वस्त कर तेजी से आगे बढ़ने लगे। अभी तक इस ओर ध्यान नहीं जा रहा है हमारा। प्रकृति भी बाजार के हाथों बिकेगी तो परिणाम ठीक नहीं होने वाला।

उदाहरण के तौर पर देखिए- पहले हम बाहर शौच आदि के लिए जाते थे। खेतों में गांव से काफी दूर नित्यक्रिया से निवृत होते थे। हमारे मल प्रकृति में आसानी से विसर्जित हो उपयोगी बन जाती थी। लेकिन अब हम अपना मल-मूत्र ही नहीं तमाम तरह के विकृत रसायण सीधे नदियों में डाल समझते रहे कि हमने बहुत ही अच्छा निस्तारण कर दिया है। फिर हुआ क्या हमने अपने सारे जलस्रोतों को तबाह कर दिया है।

हम सभी जानते हैं कि पर्यावरण को जलवायु भी कहते हैं- जल और वायु इन दो को ही यदि हम सुधार लें तो हम काफी संकटों से निजात पा सकेंगे। पर्यावरण तो जल, जंगल, जमीन, और वायु (वातावरण) को ठीक करने से ही हम बच पाएंगे। इसे सुधारने के जो भी समुचित और सच्ची प्रयास हो सकती है उसे हमें करना चाहिए।

मनोज कुमार झा

पर्यावरण कार्यकर्ता,

गांधी शांति प्रतिष्ठान,

नई दिल्ली-110002

 कूड़े का दर्शन

मनोज कुमार झा

कूड़ा अव्यवस्था से जन्म लेता है। लेकिन यह भी दिलचस्प है कि कूड़े की व्यवस्था करनी पड़ती है। सरकार का एक पूरा महकामा इसके लिए लगा है। दफ्तरी कामकाज के सारे तामझाम इसके पीछे हैं। कभी-कभी सोचता हूं, कूड़ा तो इन कूड़ा उठाने वाले दफ्तरों में भी होता होगा। पता नहीं उसे कौन उठाता है?

दरअसल कूड़ा हमारे आधुनिक जीवन की एक जरूरी बुराई की तरह है। कूड़े से हम बच नहीं सकते और कूड़े को हम देखना नहीं चाहते। इधर कूड़े की कुछ शक्ल भी बदली है। अब यह जल्दी असह्य हो जाता है। नाक, कान, आंख जैसी हमारी इंद्रियां इससे तुरंत उकता जाती हैं। आज कूड़ा ज्यादा बजबजाता है। पर्यावरण प्रदूषण के सारे सजावटी इश्तिहार इसे दखे ही स्मरण हो आते हैं। सरकार कूड़ा कहां फेंके, अब यह उसके लिए भी समस्या हैं प्लास्टिक से क्या नुकसान हो रहा है, यह दोहराने की भी जरूरत नहीं हैं जिन देशों से यह अक्लमंदी हमने सीखी है, अब वही हमें इनसे खबरदार होने की तमीज सिखा रहे हैं। बचपन से कुछ ऐसे लोगों के साथ रहने-सीखने का मौका मिला है जिन्हें आप प्रचलित शब्दावली में ‘गांधीवादी’ कह सकते हैं। वैसे खुद गांधी को भी अपने नाम में कभी इतनी शक्ति का एहसास नहीं हुआ कि उससे कोई ‘वाद’ चले। ऐसे में हम व्यक्तिवाद की भी बुराई नहीं कर पाएंगे।

बहरहाल, कई बार कुछ शिविरों और ऐसी ही गांधीवादी संस्थाओं में गया हूं। कई मौकों और कई जगहों पर इस रूप में देखकर जरूर आश्चर्य हुआ कि वहां कूड़े को समस्या की तरह नहीं निपटाया जाता। एक गांधीवादी युवक
(बूढ़े ने नहीं) ने बताया कि सफाई का मतलब समझते हो? मैंने कहा, कूडे को ठिकाने लगाना- सफाई तो यही हैं उसने फिर से प्रश्न जड़ दिया- कूड़ा पैदा क्यों होता है? मैंने कहा, जब कोई चीज हमारे काम की नहीं रहती तो वह कूड़ा हो जाती है। वह युवक अब खुश था। शायद उसकी नजर में मैंने अपनी सारी बुद्धिमानी जाहिर कर दी थी। वह मुझे प्रेमभाई के वनवासी सेवा आश्रम मिर्जापुर के कुछ रास्तों पर बड़े भाई की तरह पीठ पर हाथ रखकर घुमाने निकला। मैंने गोबर से बनती गोबर गैस देखी, फिर गैस दे चुके गोबर से बनती खाद देखी और फिर देखी उस खादसे तैयार सुंदर फसल। मैंने खुद से हर संभव काम को करने की ललक ‘आश्रम के लोगों में महसूस की। मेरे लिए यह जीवन का नया पाठ था।

दो-एक दिन बाद युवक से मुझे अपना बकाया जवाब मिला। उसने बताया- सफाई का मतलब सभी चीजों का फायदेमंद इस्तेमाल। बाद में तो यह मेरा प्रिय विषय ही बन गया। गांधीजी के जीवन और उनसे जुड़े लोगों के प्रसंग मुझे याद आद रहे हैं।

बात आजादी के कुछ साल पहले की है। गांधीजी उन दिनांे बंबई में थे। एक बड़ी सभा होने वाली थी। सभा से पूर्व अपनी आदत के मुताबिक गांधीजी शहर के विभिन्न तबके के लोगों से मिलते, बात करते। सभी अपनी बातें उनके आगे रखने के लिए लालायित रहते। सूरज भी ऐसे ही एक दिन उनसे मिला। सूरज अब सिर्फ सफाई कर्मचारी नहीं, उसकी यूनियन का नेता था। बातें तार्किक की जगह सहज ज्यादा थीं। सहजता से ही पूछा- बापू, क्या आप मेरी भी बात सुनेंगे? गांधी ने कहा- क्यों नहीं। सूरज ने शर्त रखी, ऐसे ही चलते-चलते नहीं, बैठकर पूरी तसल्ली से सुननी होगी। गांधीजी सूरज से भी आगे हो गए। कहा- तो चलो तुम्हारे घर ही चलते हैं। सूरज अवाक था। जिसके पीछे दुनिया पागल है, वह मेरे घर खुद आना चाह रहा है!

सूरज ने कहा- बापू मैं आज भी पेशे से एक सफाई कर्मचारी ही हूं। यूनियन की पगड़ी इन लोगों की दी हुई है। पहले रात भर सफाई का काम करता था। अकेले कई किलोमीटर सड़के बुहार देता था। आज उसी काम को करने के लिए हम छह लोग हैं। हमारे औजार भी बढ़ गए हैं। झाडू के अलावा अब कूड़ साफ करने की गाड़ी लेकर हम घूमते हैं। लेकिन लगता है कि कूड़े की ही शक्ल बदल गई है। कमबख्त चुड़ैल के मेकप के लिए ये सारे समान पूरे नहीं पड़ते। इसकी शक्ल वैसे ही बजबजाती रह जाती है। यह क्या हो गया है?

अगले दिन भरी सभा में गांधी ने सूरज को दूर से ही पहचान निकाला। पास आकर उससे मिले। वहां के लोगों के लिए यह सब हैरत भरा था। बाद में सभा में बोलते हुए गांधी ने कहा, मुझे ‘अंग्रेजों’ से नहीं ‘कूड़ों’ से आजादी चाहिए। दरअसल गांधी का कोई एजेंडा बदला नहीं था, बल्कि वे अपने एजेंडे की तामील के लिए लोगों का सोच बदलना चाहते थे। गांधी ने कहा, कूड़ा सामान ही नहीं, जीवन भी होता है। वैसे ही जैसे हमारे जीवन में कुछ समान रद्दी और कूड़ा होता है। दरअसल अपनी उपयोगिता और उद्देश्य खो चुका जीवन हो या फिर कोई समान, वह कूड़ा है।

आज हमारे जीवन को सजाने वाली जिन चीजों से जीवन की सजावट होनी थी, शायद उन्होंने प्रकृति की सारी बनावट के आगे एक संकट पैदा कर दिया है। ‘दर्शन’ की जगह ‘दिखावा’ हमें हार्दिक पनाह देता है और जब हम इन सबसे थकते हैं तो अपने आसपास के कूड़ामय होने का रोना रोते हैं। शायद इस रुदन में भी कोई करुणा होती, लेकिन यह तो एक कूड़े का दूसरे कूड़े के लिए रोना है।

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