आओ अब चले गाँव की ओर – दिल्ली के भारत मंडपम में बिहार प्रवासियों का विशाल जन सभा विशाल
जाती सम्प्रदाय से उठ कर बिना भेद भाव के हम एक दूसरे का सहयोग करेंगे और बिहार को हम बनायेंगे"
बिहार को विकसित करने का खेल कहीं राजनीतिक से प्रेरित तो नहीं? क्या इस खिलाड़ी को भी राज्यसभा चाहिय? आज़ादी से आज तक बिहार का कोई प्रधानमंत्री क्यूँ नहीं बन पाया?
बिहार को संवारने की कोशिश – बिहार को विकसित करने का संकल्प। प्रेरित करो बिहार

एस. ज़ेड. मलिक

नई दिल्ली – नई दिल्ली के प्रगति मैदान स्थित भारत मंडपम में बिहार प्रवासियों का “आर लेट्स इंस्पायर बिहार” के बैनर तले “आओ प्रेरित करें बिहार” इस स्लोगन के साथ एक समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें बिहार@2047 विजन कॉन्क्लेव सीजन 2 के लिए एक प्रतिष्ठित कार्यक्रम जो स्टार्टअप के भविष्य पर चर्चा करने और रोजगार व समाधान तलाशने के लिए इनोवेटर्स, उद्यमियों और उद्योग जगत के उद्यमियों को एक प्लेटफार्म पर इकट्ठा करने का एक प्रयास किया गया। जबकि यह विज़न @2047 मोदी विज़न है, इससे स्पष्ट है कि यह संस्था संचालक कहीं न कहीं मोदी जी से प्रेरित तो है। जो इस कार्यक्रम के तहत बिहार को विकसित करने का सपना संयोगने वाले एक आईपीएस विकास वैभव ने अपने नेतृत्व में लगभग 2000 बिहार प्रवासीयों को इकट्ठा किया। यह अपने आपमे बहुत बड़ी बात, इसलिये की दिल्ली का भारत मंडपम जिसमे आम संस्था के बस की बात नही हैं वहां इतना बड़ा कार्यक्रम कराना, वहां जो अब तक कार्यक्रम होते मैंने देखा, उसमें सत्तारूढ़ यानी सरकार का कहीं न कहीं सम्बन्ध रहा है। तभी लाखों में जिसका एक दिन का किराया हो उसमें कोई कार्यक्रम कर सकता है। ऐसे में विकास वैभव एक आईपीएस होते हुए अपने पद का त्याग कर इतना बड़ा आयोजन, कहीं न कहीं बिहार की राजनीति में कुछ नया होने का संकेत है, क्या विकास वैभव तीसरे विकल्प के तौर पर उभरने की तैयारी कर रहे हैं? क्या विकास वैभव लालू और नीतीश के लिये चुनौती बन जाएंगे? इनके इस कार्यक्रम से कई अवधारणायें बन चुकि है और कई सवाल खड़े हो चुके हैं?

बहरहाल विकास वैभव के नेतृत्व में उपस्थत बिहार प्रवासियों को संकल्प दिलाया ” जाती सम्प्रदाय से उठ कर बिना भेद भाव के हम एक दूसरे का सहयोग करेंगे और बिहार को हम बनायेंगे” इस अवसर पर विकास वैभव ने कहा बिहार विज़न कॉन्क्लेव में हम 2047 तक विकसित बिहार बनाने के लिए विज़न डॉक्यूमेंट जारी करेंगे। जबकि बिहार का शिक्षा का स्तर निचले पायदान पर होने के बावजूद आज भी अधिकतर आईएएस, आईपीएस बिहार से ही आते हैं तथा आज बिहार में सिविल इंजीनियर और एमबीए तो लगभग बिहार के आबादी के अनुपात लगभग 2 से 3 प्रतिशत तो होना ही चाहिए, उसके अतिरिक्त बिहार के कुछलोग बड़े उद्द्योगपति भी हैं तो कुछ बड़े व्यापारी भी हैं लेकिन यह विडंबना ही कहें और बिहार का दुर्भाग्य की बिहार में सब कुछ होते हुए भी बिहार कंगाल रहा 60 प्रतिशत आज भी गरीब है और बिहार के गरीब तबके के लोग आज भी डिग्री ले कर विदेश जाने का सपना संजोगे बिहार छोड़ भारत के बड़े महानगरों और विदेश में पलायन कर जाते हैं। जो बिहार में अपना मकान बनाने और बिहार के महानगरों में नई कॉलोनी बसाने का काम कर रहे हैं, और बहुत से लोग दिल्ली और मुम्बई जैसे बड़े महानगरों में बिल्डर का काम कर रहे हैं। तो कोई दिल्ली कोलकाता, मुम्बई, बंगलोर जैसे महानगरों में उद्योग चला रहे हैं तो कुछ रोजगार और नौकरी के तहत महानगरों में ही बस गये। बहुत ऐसे लोग जिन्होंने बिहार हमेशा के लिये छोड़ कर महानगरों में बस गये जिनका बिहार में अब रिश्तेदार के अलावा अब कुछ भी नहीं है।
आखिर कारण क्या है ? वर्तमान में सब से बड़ी जो समस्या है – वह गरीबी , जातिवाद, अतिस्वार्थ और हिंसा, और ओछी राजनीतिक यानी दलाली, ओछी राजनीत और दलाली इस समय अधिकतर सवर्णों और कुछ ओबीसी अर्थात यादवों, कुड़मीयों, और दूसरे मुस्लिम समुदायें में सैयदों, मलिकों शेखों में देखी जा रही है। और दुसरीं ओर सम्प्रदायिक दंगा। निस्वार्थ और मानवता के नाम पर सहयोगी मानसिकता के हज़ार में से 5 से 10, लोग ही मिल पायेंगे। यह भी एक कड़वी सच्चाई है, जहां इन सभी बुराइयों के साथ साथ शिक्षा में धर्म को कितनी आसानी से जोड़ दिया पता हिन चला जिसे आज बच्चों को शिवपुराण और रामायण तथा महाभारत के चैप्टर पढ़ना पढ़ रहा है। जो बच्चे बड़े होंगे तो उनका इत्तिहास यही होगा वह मंदिर बनाएंगे या उद्योग लगायेंगे? सवर्णों का वह तबका जो मंदिर पर आधारित है उनका जीविका ही मंदिर से और पूजा से ही चलता है, यह वह मंदिर माफिया हैं जिनका आज सत्ता में भागीदारी है। जिसका असर नफरत के रूप में सबसे अधिक उत्तर प्रदेश और बिहार में देखने को मिल रहा। @2047 मोदी विज़न अभी तक मुझे जो समझ मे आया वह है सिर्फ मंदिर वाला देश बनाने का और सांन्तियों का सत्ता पर काबिज रहने का। जहां सरकार ने ही युवाओं के दिलो दिमाग मे एक सम्प्रदाय के प्रति नफरत भर दिया वहां दो, चार, दस वह भी अलग अलग देश के विकास के लिये वार्षिक त्योहार की तरह इकट्ठा हो विलाप करेंगे तो उससे क्या होगा ? इसलिये की नफरत करने वाले अल्पसंख्यक होते हुये भी बहुसंख्यकों पर हावी हैं। जबकि एकता सौहार्द और विकास की विचारधारा पर काम करने वाले बहुसंख्यक होते हुए भी अलग अलग मंदिरों और दरगाहों पर भीख मांगने वाले अपंगों की तरह कतार में बैठे सौहार्द एकता और विकास की भीख मांग रहे हैं।
बहरहाल, संगोष्ठी में शिया समुदायें के गुरु क़लबे रूशैद भी मंच पर एक अलग भेसभुसा में दिखाई दिया मंच पर एक बिहारी सब पर भारी के तर्ज पर एकता की बात करते आये जबकि इनके यहां भी शिया-सुन्नी का बहुत बड़ा मसला है, जो एक दूसरे से न इत्तिफ़ाक़ रखते हैं न यह इत्तिहाद में ही है। बाकी अन्य समुदायें अपने अपने विचारों और जातिवाद में बटे हुये तो हैं हि। आज हर उस संगठन को नाकारने की आवश्यकता है जो समुदायें में धर्म का प्रचार प्रसार कर के इंसान को इंसान से दूर कर रहा है, क्या उसे समाजिक बहिष्कार किया जा सकता है? सौहार्द एकजुटता शिक्षा तथा विकास की बात करने वाले क्या अपने परिवार के किसी उस व्यक्ति को सामाजिक बहिष्कार उसका हुक्का पानी बन्द करेंगे जो समाज को तोड़ने का काम करता है जो सम्प्रदायिक उन्माद फैलाने का काम करता है? जो हिन्दू और सनातनी की बात करता है? सवाल यह भी महत्पूर्ण है, की क्या 2014 के पहले इस देश मे हिन्दू या सनातनी नहीं थे? भारत की आज़ादी के बाद डॉ राजेन्द्र प्रसाद के बाद बिहार के किन लोगों को राष्ट्रपति पद पर, स्वक्षा से राजनीतिक दलों ने बैठाया? क्या बिहार के लोगों में देश चलाने की समझ नही है? जिसे आज तक कभी प्रधानमंत्री के लिये चुना नहीं गया? क्या अब बिहार में शिक्षित आईएएस आईपीएस या जुडुसियरी के लोग राजनीत करेंगे एमपी एमएलए, मुखिया बनेंगे? विज़न चलाने वाले विकास वैभव जी अपने संस्था में कोई ऐसा प्रावधान बनायेंगे जिसमे गाँव गाँव मे जा कर एक अभियान रूपी दागी प्रतियाशियों को वोट न करने की अपील करेंगे? क्या संस्था हर विधायक या सांसदिये एवं मुख्या तथा निगम पार्षदों के क्षेत्रो में शिक्षा का मानक तय कर प्रतियाशियों को उतारेंगे?
इस संगोष्ठी में कुछ व्यावस्थापकों में कुछ लोगो से जब बिहार में बढ़ती सम्प्रदायिक नफरतों को कैसे समाप्त करेंगे? वहां के सुनियोजित सम्प्रदायिक दंगा को वहां उपस्थित संस्था के प्रतिनिधि एक घटना कह कर टाल दिया। इनके जवाब हमारे youtube चैनलwww.youtube.com/@ainaindianews पर क्लिक कर देखें और सब्स्क्राइब्स लाइक और शेयर जरूर करें। अच्छी बात है यदि संस्था दुर्भावना से दूर निस्वार्थ हो कर बिहार की सेवा करने के लिये अग्रसर हो है तो बदलाव ज़रूर आयेगा लेकिन यह भीड़ देखा कर यदि सरकार का एक हिस्सा बन जाते हैं यानी राज्यसभा ले कर शांत हो जाते हैं तो शायेद बिहार वासी फिर कभी इकट्ठा नहीं होंगे न कभी किसी संस्था पर विश्वास करेंगे।

