भारतीय लोकतंत्र की बदलती परिभाषा – सम्प्रदायिक, भ्रष्टाचार, दुराचार, आरक्जकता, और आस्था पर आधारित लोकतांत्रिक ढांचा
भारत में कुछ चुनावों में ध्यान ऐसे मुद्दों पर केंद्रित होता है जो विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, और रोज़गार जैसे असल विषयों से दूर हैं।
परन्तु, जब विभाजनकारी मुद्दों को उभारा जाता है, तो यह समाज में दरार पैदा करता है और असली मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं।
साम, दाम , दण्ड , भेद, चाहे जैसे भी सत्ता हासिल करना है।

सैयद आसिफ इमाम काकोवी
भारत में चुनावी मुद्दों के गिरते स्तर जहाँ अमेरिका जैसे देश चुनावों में ग़रीबी, टैक्स कट, श्रमिक अधिकारों, और स्वास्थ्य जैसे वास्तविक समस्याओं पर चर्चा करते हैं, वहीं भारत में कुछ चुनावों में ध्यान ऐसे मुद्दों पर केंद्रित होता है जो विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, और रोज़गार जैसे असल विषयों से दूर हैं। यह विचारणीय है कि लोकतंत्र में चुनाव केवल जीतने का साधन नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं के समाधान की दिशा में प्रयास करने का एक अवसर होना चाहिए। जब नेता अपने भाषणों में विभाजनकारी भाषा का प्रयोग करते हैं, तो यह केवल समाज में नफरत और असंतोष को बढ़ावा देता है। नेताओं की भूमिका समाज में एकता, शांति, और विकास को आगे बढ़ाने की होनी चाहिए। देश के प्रधानमंत्री का कर्तव्य यह सुनिश्चित करना है कि उनकी वाणी से देशवासियों को एकजुटता और भरोसा मिले। परन्तु, जब विभाजनकारी मुद्दों को उभारा जाता है, तो यह समाज में दरार पैदा करता है और असली मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप देश में विकास, रोजगार, और शिक्षा जैसे जरूरी विषयों पर ध्यान कम हो जाता है।
चुनावी माहौल में जब नेता ऐसे मुद्दे उठाते हैं, जो केवल समाज में विघटनकारी प्रभाव डालते हैं, तो यह चिंताजनक है। नागरिकों को जागरूक होना आवश्यक है कि वे नेताओं से असली मुद्दों पर जवाबदेही मांगें और समाज के वास्तविक विकास की दिशा में आगे बढ़ें। अगर हम अपने लोकतंत्र को मजबूत बनाना चाहते हैं, तो यह आवश्यक है कि चुनावी चर्चा में गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मूलभूत मुद्दों को प्राथमिकता दी जाए, न कि केवल भावनात्मक या धार्मिक भावनाओं को उकसाने वाले मुद्दों को।आने वाले कुछ सालों में भारत हिंदू राष्ट्र घोषित हो जाए. इसके लिए ज़मीनी स्तर पर काम शुरू हो चुका है. मुसलमान शासकों के इतिहास और शहरों, गलियों के नाम बदलने से लेकर किताबों में बदलाव का काम बदस्तूर जारी है. पिछले 11 सालों में हर उस शख़्स को देशद्रोही साबित करने की कोशिश की गयी जो हिंदुत्व की विचारधारा से सहमत नहीं था या मुखर विरोध करता पाया गया। तीन तलाक़, अनुच्छेद 370 और नागरिकता क़ानून तीनों ही संसद से पास हुए और संविधान में बदलाव के बाद अस्तित्व में आए। और तीनों ही मामलों में मुसलिम तबक़ा ही प्रभावित हो रहा है। अब बीजेपी पूरे देश में एनआरसी लागू करने की बात कर रही है। भारत का संविधान कहता है कि जाति, धर्म और जेंडर के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा लेकिन नागरिकता संशोधन अधिनियम या सीएए को मुस्लिम विरोधी कानून की तरह देखा जा रहा है. गोलवलकर ने यूँ ही नहीं कहा था कि मुसलमानों के भारत में कोई नागरिक अधिकार नहीं होने चाहिए। दीन दयाल उपाध्याय भी इसी संदर्भ में कहते हैं कि मुसलमानों को देश से बाहर तो नहीं भेज सकते। पर वह संविधान को बदलने की बात करते हैं। यह अकारण नहीं है कि संघ परिवार हमेशा से यह कहता रहा है कि भारतीय संविधान विदेशी मूल्यों से प्रभावित है। वह कहना ये चाहते हैं कि संविधान में बदलाव करना होगा। बीजेपी 11साल से सत्ता में है और उसका दावा है कि इस बारे में बहुत सारा काम अभी अधूरा है. आपको कुछ समय देना होगा. 100 साल पहले संघ की शुरुआत हुई थी और वो बहुत कुछ हासिल कर चुका है. देश की सियासत में इन दिनों ‘हिन्दू राष्ट्र’ का मुद्दा छाया हुआ है, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भारत को हिंदू राष्ट्र बताया है। उन्होंने कहा है कि भारत हिंदू राष्ट्र था, है और रहेगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि एक ना एक दिन अखंड भारत बनना ही है और पाकिस्तान भारत में विलय करेगा। क्योंकि एक एक आदमी को ये यक़ीन है कि मोदी भारत को हिंदू राष्ट्र बना देंगे. दरअसल समाज में इतनी नफरत आ चुकी है कि उस पर किसी और का असर ही नहीं पड़ता। बाकी हिंदुत्व का बुखार इतनी जल्दी नहीं उतरने वाला इसमें वक्त लगेगा. पिछले 11 सालों बीजेपी ने 3 लोक सभा चुनाव और दो विधान सभा चुनाव स्वीप किए हैं. बीजेपी का वोट शेयर चालीस परसेंट से ऊपर है. हिंदुत्व गहरा बैठ चुका है जब तक विकास और महंगाई की राजनीति करेंगे विपक्ष वाले हारते ही रहेंगे. राजनीतिक विचारधारा से चलती है. और भारत में सिर्फ़ एक ही विचारधारा है । हिंदू राष्ट्र की टाइमलाइन को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है. लेकिन उनके समर्थकों को लगता है कि ‘हम लोग ट्रांजिशन फेज़ में हैं’ उत्तर प्रदेश एक आदर्श राज्य बन ही चुका है. एक हिंदू राष्ट्र कैसा होना चाहिए, उसकी एक झलक यूपी दिखाता है. लेकिन ये सच है कि आज़ादी के 78 साल पूरे होने पर ये सवाल ज़ोर से उठ रहा है कि क्या इस देश का कलेवर बदल जाएगा. आज BJP लोकसभा में बहुमत प्राप्त है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत अनेक महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्ति मूलतः संघ के पूर्व प्रचारक हैं. इनमें से जो राजनीतिक रूप से अधिक सजग हैं, वे संविधान के दायरे में रहकर बात करते हैं लेकिन बहुत-से ऐसे भी हैं जिनके मन की बात होंठों तक आ ही जाती है.
सैय्यद आसिफ इमाम काकवी

