जंगलों की सुरक्षा में सैंकड़ो वर्षों से समर्पित विश्नोई समाज, फिर भी उपेक्षित
जो समाज जंगल की वर्षों से सुरकहा करते आ रहा है वह आज भी समाज मे उपेक्षित क्यूँ है?
सरकार आखिर जंगलों में रहने वालों को संरक्षण देने की बजाए जंगल अतिक्रमण के नाम पर जंगल कटवा कर शहरीकरण करने में लगी है, आखिर इन जैसे आदिवासियों की उपेकहा क्यों?
बिश्नोई समुदाय देश के पहले पर्यावरण योद्धा
– ओंकार तिवारी

बिश्नोई समाज ने मानव और सृष्टि के नाता को बहुत पहले ही समझ लिया था– लेकिन समाज में अच्छाई और बुराई दोनों चलता रहता है– इससे बिश्नोई समाज भी अछूता नहीं– फिर भी प्रकृति के प्रति उसका प्रेम हम सबके लिए अनुशरण योग्य ही है
राजस्थान की तपती रेत में, यहां जीवन अक्सर कठिनाइयों से जूझता है, वहां बिश्नोई समुदाय ने पिछले पांच सौ वर्षों से पर्यावरण संरक्षण की एक अनूठी मिसाल कायम की है– गुरु जंभेश्वर द्वारा 1485 में स्थापित बिश्नोई पंथ की 29 शिक्षाएं प्रकृति, वन्य जीवन और संसाधनों की रक्षा को जीवन का मूल मंत्र मानती हैं– आज बिश्नोई समुदाय की आबादी लगभग 6 लाख मानी जाती है, जो मुख्यत% राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में बसी है– कुछ स्रोतों के अनुसार, यह संख्या विश्वभर में 10 से 15 लाख तक हो सकती है, जिसमें पाकिस्तान और प्रवासी भारतीय भी शामिल हैं।
खेजड़ली हत्याकांड बलिदान की अमर गाथा
1730 में राजस्थान के खेजड़ली गांव में, अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 बिश्नोई स्त्री–पुरुषों ने खेजड़ी वृक्षों की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए– जोधपुर के महाराजा के सैनिक जब महल निर्माण के लिए पेड़ काटने आए, तो बिश्नोई महिलाओं ने पेड़ों से लिपटकर उन्हें कटने से रोका– यह बलिदान आज भी भारतीय पर्यावरण आंदोलन का प्रेरणास्रोत है और इसी भावना से 1970 के दशक में उत्तराखंड में चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई–
वन्यजीव संरक्षण% काले हिरण के प्रहरी
बिश्नोई समाज काले हिरण, चिंकारा, मोर जैसे वन्य जीवों को परिवार का हिस्सा मानता है– सूखे में भी ये लोग पशुओं को दाना–पानी देते हैं, यहां तक कि अनाथ हिरण शावकों को माताएं स्तनपान कराते हैं– 1998 में अभिनेता सलमान खान द्वारा काले हिरण के शिकार के मामले में बिश्नोई समाज ने न्यायालय में लड़ाई लड़ी, जिससे उनकी वन्यजीव संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता उजागर होती है–
टिकाऊ जीवनशैली और पवित्र वन
बिश्नोई अपने गांवों में ‘ओरण’ नामक पवित्र वन सुरक्षित रखते हैं, यहां मानव हस्तक्षेप वर्जित है– वे केवल सूखी लकड़ी का उपयोग करते हैं, हरे पेड़ नहीं काटते, और नीले वस्त्र नहीं पहनते क्योंकि इसका रंग बनाने के लिए बड़ी मात्रा में पानी और वनस्पति नष्ट होती है– उनका आहार शाकाहारी या नैतिक रूप से दुग्ध आधारित होता है, जिससे पर्यावरणीय प्रभाव कम होता है–
आधुनिक पर्यावरण आंदोलन में भूमिका
बिश्नोई समाज आज भी परमाणु संयंत्र जैसे परियोजनाओं का विरोध करता है, जो वन्यजीवों के आवास को खतरे में डालती हैं– वे वन विभाग के साथ मिलकर शिकार की घटनाओं की रिपोर्ट करते हैं और वृक्षों की रक्षा के लिए आंदोलन करते हैं– भारत सरकार द्वारा शुरू किया गया ‘अमृता देवी बिश्नोई वन्यजीव संरक्षण पुरस्कार’ उनके योगदान का सम्मान है–
सांस्कृतिक और वैश्विक प्रभाव
बिश्नोई दर्शन ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना से ओतप्रोत है, जिसमें प्रकृति और जीवों को परिवार का सदस्य माना जाता है– अमृता देवी जैसी महिलाओं की अगुवाई में इनका इको–फेमिनिज्म, जमीनी स्तर पर संरक्षण को नया आयाम देता है– इनकी शिक्षाएँ आज के जलवायु संकट और संसाधनों की कमी के दौर में व्यवहारिक समाधान प्रस्तुत करती हैं–
समालोचनात्मक दृष्टिकोण
हालांकि बिश्नोई समाज का समर्पण अनुकरणीय है, परंतु इसकी जड़ें धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में इतनी गहराई से जुड़ी हैं कि इसे अन्य समाजों में लागू करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है– इनकी संख्या सीमित और प्रभाव क्षेत्र मुख्यतः राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, पंजाब तक ही है– फिर भी, इनकी जीवनशैली और सिद्धांत वैश्विक स्तर पर सतत विकास के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं– बिश्नोई समाज के लोगों में ऐसी मान्यता है कि वो अगले जन्म में हिरण का रूप लेंगे– बिश्नोई समाज में यह भी माना जाता है कि गुरु जंभेश्वर ने अपने अनुयायियों से कहा था कि वह काले हिरण को उन्हीं का स्वरूप मान कर पूजा करें–
“अगर एक पेड़ काटना पाप है, तो उसे बचाने के लिए प्राण देना पुण्य है” — अमृता देवी बिश्नोई
बिश्नोई समाज ने न केवल राजस्थान की मरुभूमि को हरियाली दी, बल्कि भारत को पहला पर्यावरण योद्धा भी दिया– इनकी कहानी आज की पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा है कि प्रकृति की रक्षा केवल नीति या कानून से नहीं, बल्कि संस्कार, आस्था और सामूहिक प्रयास से होती है–
मैं अपने आसपास के क्षेत्र में बिश्नोई जैसी स्थिरता और संरक्षण की भावना कैसे फैला सकता हूँ
अपने क्षेत्र में बिश्नोई जैसी स्थिरता और संरक्षण
की भावना कैसे फैलाएं
1– पेड़–पौधों और वन्यजीवों की रक्षा करें 2– हरियाली बढ़ाने के लिए स्थानीय स्तर पर वृक्षारोपण अभियान चलाएँ और लोगों को हरे पेड़ न काटने के लिए प्रेरित करें
– वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए शिकार का विरोध करें और घायल या अनाथ जानवरों की देखभाल के लिए सामुदायिक केंद्र स्थापित करें–
2– जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग
3– – वर्षा जल संचयन (वर्षा जल संग्रह) जैसी तकनीकों को अपनाएं और पानी की बर्बादी रोकने के लिए जागरूकता फैलाएं–
4– – केवल आवश्यकता अनुसार संसाधनों का उपयोग करें, अनावश्यक उपभोग से बचें
3– सामूहिक प्रयास और सहभागिता – मोहल्ला, स्कूल या पंचायत स्तर पर सफाई, वृक्षारोपण, और पर्यावरण संरक्षण के लिए सामूहिक अभियान चलाएं–
4– स्थानीय स्वयंसेवी समूह, किसान क्लब या महिला मंडलों को जोड़कर सामुदायिक भागीदारी बढ़ाएं
शिक्षा और जागरूकता
पर्यावरण सु/ाार से मानव को एक गतिशील और जिज्ञासु के रूप में ढाला है इसलिए हम यात्राएं करते हैं ताकि हम प्रकृति और भौगोलिक क्षेत्रों से लेकर समाज–संस्कृति जैसे पहलुओं को गहराई से जान सकें– हमें जानना चाहिए कि कोई यात्रा मात्र एक भौतिक गतिवि/िा ही नहीं होती, यदा–कदा यात्रा भी मानव चिंतन में कुछ नए आयाम जोड़ जाती है– इसी का प्रमाण देता है यह आलेख किस तरह पानी पर थोड़ा काम करने वाले एक सामान्य कार्यकर्ता अविस्मरणीय प्रेरणा देता है–
– पर्यावरण संरक्षण पर कार्यशालाएं, सेमिनार और प्रतियोगिताएं आयोजित करें, जिससे लोग व्यावहारिक उपाय सीख सकें
– बच्चों और युवाओं को प्रकृति के महत्व और संरक्षण के तरीकों के बारे में शिक्षित करें
5– टिकाऊ जीवनशैली अपनाएं
– प्लास्टिक का प्रयोग कम करें, जैविक और बायोडिग्रेडेबल उत्पदों का उपयोग बढ़ाएं
– शाकाहारी या पर्यावरण के अनुकूल आहार अपनाएं, जैसे बिश्नोई करते हैं
6– सरकारी योजनाओं और स्थानीय संस्थाओं से जुड़ेंµ पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी सरकारी योजनाओं (जैसे ग्रीन इंडिया मिशन, नेशनल अफॉरेस्टेशन प्रोग्राम) का लाभ उठाएं
– स्थानीय स्वयंसेवी संस्थानों के साथ मिलकर बड़े स्तर पर काम करें–
– प्रेरणा और नेतृत्व
– अमृता देवी बिश्नोई जैसे प्रेरक व्यक्तित्वों की कहानियां साझा करें, जिससे समुदाय में संरक्षण की भावना जागृत हो–
– खुद उदाहरण बनें—अपने व्यवहार से दूसरों को प्रेरित करें–
– “एक सिर कटे तो कोई बात नहीं, पर एक पेड़ न कटे” अमृता देवी बिश्नोई–
पर्यावरण सुरक्षा वह मार्ग है जो हमें सांसारिक संबंधों के ऊपर स्वर्ग के द्वार तक पहुंचा देता है, क्योंकि सब कुछ तो मानव का पर्यावरण में निहीत है– पर्यावरण सुरक्षा की भावना हमें अत्यन्त विनम्र बनाता है, यही विनम्रता समाज को जीवन प्रदान करता है– “जीवन का अर्थ और अर्थमय जीवन” पूरा करता है–
बिश्नोई की तरह, यदि हम भी प्रकृति को परिवार मानकर उसकी रक्षा करें तो आने वाली पीढ़ियों को एक सुंदर भविष्य प्रदान कर सकते हैं–

