पश्चिम बंगाल में 80 प्रतिशत मुसलमानो का नाम मतदाता सूची से कटवा दिया गया – बंगाल में खेला हो गया
पश्चिम बंगाल में 80 प्रतिशत मुसलमानो का नाम मतदाता सूची से कटवा दिया गया। बंगाल में खेला हो गया। पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 भाजपा के पाला में?
नदीम के एक रिपोर्ट के अनुसार एक एक जिले से लगभग कहीं से 400000, चार लाख तो कहीं से साढ़े चार लाख, पांच लाख, तो कहीं से आठ, आठ लाख, मतदाताओं का नाम मतदाता सूची से काटा जा चुका है।
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बंगाल में खेला हो गया। पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 भाजपा के पाला में? बंगाल में 80 प्रतिशत मुसलमानो का नाम मतदाता सूची से कटवा दिया गया। दोषी कौन?

एस. ज़ेड. मलिक

लेकिन बीबीसी के अनुसार इस कृत्य मे ममता सरकार का सबसे बड़ा रोल है, प्रशासन तो राज्य सरकार के अधीन है, फिर डीएम, ज़िला प्रशासन तो पूर्ण रूप से राज्य सरकार के अधीन रहता है जबकि पुलिस प्रशासन केंद्रीय गृहमंत्रालय के अधीन होता है, फिर सवाल उठता है कि एसआईआर के बाद पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से अब तक 63 लाख से ज़्यादा नाम कैसे हटाए गये? बीबीसी के अनुसार – वहीं क़रीब 49 लाख मामले अब भी विचाराधीन हैं, जिनके निपटारे के बाद ये संख्या और बढ़ सकती है। आशंका है कि कई लोग इस बार वोट देने के अपने अधिकार से भी वंचित रह सकते हैं।

तृणमूल कांग्रेस के विधायक मोहम्मद अली का कहना है कि एसआईआर ऐसी कोई एक्सरसाइज़ नहीं है, जिसका मकसद इलेक्टोरल रोल्स को साफ़ सुथरा करना है।
बीबीसी के अनुसार – पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में कुछ ऐसे ऐसे लोहों के साथ खेल खेला गया जिनके पूर्वजों ने अपनी सारी विरासत यहीं छोड़ कर इसी मिट्टी में दफन हैं मीर जाफर के वंशज को बीबीसी ने अपने कहानी में कलंबन्द किया है दीखिये बीबीसी के अनुसार – सैय्यद आमिर मिर्ज़ा की तरह ही सैय्यद रेज़ा अली मिर्ज़ा भी मीर जाफ़र के वंशज हैं। उन्हें यहां लोग ‘छोटे नवाब’ के रूप में जानते हैं। परिवार के बाकी सदस्यों की तरह ही वो भी मुर्शिदाबाद के लालबाग स्थित निज़ामत क़िला परिसर में रहते हैं।

सैय्यद आमिर मिर्ज़ा कहते हैं, ”मुर्शिदाबाद में बहुत मेल-मिलाप है. यहां हिंदू-मुसलमान सब एक साथ रहते हैं. सामने देखिए जुमा मस्जिद है और वहीं पूजा भी होती है. तो ये जगहें हमने ही तो दी और अब हमलोगों को बाहरी बता रहे हैं. ये क्या है? ये पॉलिटिकल खेल है. इसकी जगह कुछ नहीं है.”
मुर्शिदाबाद के विधायक और बीजेपी के नेता गौरी शंकर घोष एसआईआर प्रक्रिया में हुई इस त्रुटि के लिए तृणमूल कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.
उनके मुताबिक़, ”टीएमसी सरकार ने इस प्रक्रिया में जिन बीएलओ, बीडीओ और एसडीओ को लगाया है, उन्हीं के कहने पर ये हुआ है. टीएमसी यही चाहती है कि दो चार लोगों के नाम हटा दो, दो चार संप्रदाय के नाम हटा दो. ममता बनर्जी ने सबके साथ मिलकर कुछ भारतीय लोगों के नाम भी वोटर लिस्ट से हटवा दिए ताकि परिस्थिति बीजेपी के ख़िलाफ़ जा सके.”
स्थानीय प्रशासन का क्या है कहना?
वहीं, तृणमूल कांग्रेस के नेता एसआईआर की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं।
मुर्शिदाबाद में लालगोला से तृणमूल कांग्रेस के विधायक मोहम्मद अली का कहना है, ”लोगों को मिसगाइड करने के लिए ये कहा जा रहा है. एसआईआर ऐसी कोई एक्सरसाइज़ नहीं है, जिसका मकसद ये था कि इलेक्टोरल रोल्स को साफ़ सुथरा किया जाए।”
“सुप्रीम कोर्ट के ऑब्ज़र्वेशन में आया है कि अगर किसी का नाम इस वोटर लिस्ट में न रहे तो ऐसा न सोच कर बैठ जाए कि उसका नाम ज़िंदगीभर के लिए निकाला जा रहा है, मतलब ये हुआ कि इस इलेक्शन में नहीं आ रहा है तो अगले चुनाव में आ जाएगा…इसका मतलब ये हुआ कि अब कोर्ट भी मानने लगे हैं कि जो लिस्ट बन रही है…वो ग़लत है…ग़लत लिस्ट बन रहा है, सही लिस्ट नहीं बन रही।”
स्थानीय प्रशासन का कहना है कि वैसे लोग जिनके नाम वोटर लिस्ट से कटे हैं और जिनके पास तमाम दस्तावेज़ हैं, वह ट्राइब्यूनल में अपील कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें पर्याप्त सहयोग किया जा रहा है।
मुर्शिदाबाद के ज़िलाधिकारी आर अर्जुन कहते हैं, ”हम सिर्फ़ नवाब परिवार ही नहीं, बल्कि मुर्शिदाबाद की पूरी आबादी की मदद कर रहे हैं. ज़िला प्रशासन की ओर से लोगों को यह बताया जा रहा है कि अपील के क्या-क्या विकल्प मौजूद हैं और वे कैसे अपील कर सकते हैं.”
“अगर लोग अपने दस्तावेज़ लेकर आते हैं, तो वे खुद भी व्यक्तिगत रूप से अपील कर सकते हैं, या फिर एसडीओ कार्यालय या डीएम कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं…जहां हम उनकी ऑनलाइन अपील दर्ज कराने या उसे डिजिटाइज़ करने में मदद कर रहे हैं.”
49 लाख मामले विचाराधीन
एसआईआर के बाद पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से अब तक 63 लाख से ज़्यादा नाम हटाए जा चुके हैं. वहीं क़रीब 49 लाख मामले अब भी विचाराधीन हैं, जिनके निपटारे के बाद ये संख्या और बढ़ सकती है।
आशंका है कि कई लोग इस बार वोट देने के अपने अधिकार से भी वंचित रह सकते हैं. पर मीर जाफ़र के वंशजों के लिए…ये केवल अधिकार का मसला भर नहीं है, बल्कि उनके आत्मसम्मान और उनकी पहचान पर उठते सवाल का भी है।
सैय्यद रेज़ा अली मिर्ज़ा नम आंखों के साथ कहते हैं, ”आज अगर हम वोट देते हैं, तो मेरा एक वजूद होता है कि मैं एक भारतीय नागरिक हूं. अब जब मैं मरूंगा तो मेरे बाप-दादा की जहां क़ब्र है जाफ़रागंज में, वहीं मिट्टी पाऊंगा. लेकिन जब मैं भारतीय नागरिक ही नहीं रहूंगा तो लोग गुस्सा नहीं करेंगे कि नवाब की मिट्टी यहां क्यों होगी? इनको बांग्लादेश भेजो।”
“तो मेरी जो आख़िरी ख़्वाहिश है, वो ये है कि मरने के बाद दो ग़ज़ ज़मीन हमें मिल जाए। बहादुर शाह ज़फ़र की तरह रंगून में रहकर तड़पे न…कि मैं हिंदुस्तान नहीं जा पाया. मेरी रूह भटकती रहेगी।”
सैय्यद आमिर मिर्ज़ा की तरह ही सैय्यद रेज़ा अली मिर्ज़ा भी मीर जाफ़र के वंशज हैं. उन्हें यहां लोग ‘छोटे नवाब’ के रूप में जानते हैं. परिवार के बाकी सदस्यों की तरह ही वो भी मुर्शिदाबाद के लालबाग स्थित निज़ामत क़िला परिसर में रहते हैं।
वो बताते हैं कि उन्हें जब इस बात की ख़बर लगी कि उनका और उनके परिवार के दूसरे लोगों का नाम इस बार की मतदाता सूची से हटा दिया गया है…तब उन्हें दो दिनों तक नींद नहीं आई।

सैय्यद रेज़ा अली मिर्ज़ा का कहना है, ”मैं दो रात नहीं सोया. मैं 82 साल का हो गया. सालों से वोट दे रहा हूं. कभी ऐसा वाकया नहीं हुआ।”
वो पूछते हैं, ”हमने क्या अपराध किया है कि तुम भारतीय नागरिक नहीं मान रहे हो, मेरा वोटर लिस्ट से नाम क्यों काट दिए हो भाई? मेरे बाप-दादा तीन सौ साल हुकूमत कर के गए, सिराजुद्दौला, उनके बाप-दादा सब हुकूमत कर के गए, मेरे नाना ने मुर्शिदाबाद ज़िले को आज़ादी दिलाई, भारत में शामिल करवाया…तो फिर मेरा नाम और हमारी पीढ़ी का नाम क्यों हटाया भाई?”
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