मृत्यु का मर्म और मोक्ष का मेला”

कभी कहते — "भीड़ में मरे तो मोक्ष मिलेगा", अब कहते — "भीड़ से डर है, व्यवस्था कड़ी रखो भैया।" क्या यही है त्याग? यही सन्यास? या है धर्म अब एक सुरक्षित विकास?
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पाखंडी बाबा – मुख पर राम राम बगल में छुरी

बाबा यदि वाकई आत्मा की अमरता में विश्वास रखते हैं, तो उन्हें सबसे पहले वाई श्रेणी सुरक्षा का त्याग करना चाहिए — क्योंकि असली संत वही है, जो सत्य के साथ निर्भय खड़ा हो।
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प्राकृति से छेड़-छाड़ के कारण वर्षा के बदल जाते हैं पैटर्न प्राकृति आपदाओं की भी बढ़ जाती है आवृति

क्योंकि, पेड़ की कटाई से कई तरह के नुकसान हो रहे हैं। साइंस का मानना है कि पेड़ न रहने के कारण पर्यावरण, पारिस्थितिकी तंत्र, जलवायु और मानव जीवन पर कई प्रकार के प्रभाव होते हैं।
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कांग्रेस अब मात्र एक सोडा बोतल के समान – Congress Only Like to A Soda Not tel.

अमूमन देखा गया है अब गांधी परिवार में सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी पर जब समाजिक शत्रु भाजपा सत्तारूढ़ भाजपा के अटैक बाद ही कांग्रेस प्रदर्शन का ड्रामा करती है।
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पत्रकारिता के माध्यम से बाबा साहेब ने की वैचारिक क्रांति: प्रो.संजय द्विवेदी

भारतीय विदेश नीति एवं सुरक्षा, श्रम सुधारों, सिंचाई व जल प्रबंधन एवं भाषा नीति आदि सभी विषयों पर उनके विचार एवं कार्य आज भी प्रासंगिक है।
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प्राइवेट सिस्टम का खेल: आम आदमी की जेब पर हमला

भारत एक ऐसा देश है जहाँ शिक्षा और स्वास्थ्य को बुनियादी अधिकार माना जाता है। लेकिन जब यही अधिकार एक व्यापार का रूप ले लें, तो आम आदमी की जिंदगी में यह अधिकार बोझ बन जाते हैं।
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जाति की जंजीरें: आज़ादी के बाद भी मानसिक गुलामी आस्था पेशाब तक पिला देती है, जाति पानी तक नहीं पीने…

यह सवाल उठाता है कि यदि आस्था किसी बाबा की पेशाब को ‘पवित्र’ मान सकती है, तो एक दलित का पानी ‘अपवित्र’ कैसे हो सकता है? यह कैसा धर्म है?
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