After all, what was the necessity of incorporating Article 368—which provides for constitutional amendments—into the Constitution? Did Babasaheb Bhimrao Ambedkar deliberately include this article, or was it the members of the Constituent Assembly who did so? If the members of the Constituent Assembly were pressuring for the inclusion of this article, why did Babasaheb not oppose it? Given that Babasaheb Ambedkar had drafted a superior Constitution in the interest of Dalits, the backward classes, Adivasis, and minorities, why was it deemed necessary to include an article that could potentially strip these very groups of their rights?

 

आखिर संविधान में संशोधन का आर्टिकल 368 संविधान में अंकित करने की क्या आवश्यता थी – क्या यह बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर ने यह आर्टिकल संविधान में जान बूझ कर अंकित किया या संविधान समिति के सदस्यों ने? यदि संविधान समिति के सदस्यों ने यह आर्टिकल डालने दवाब बना रहे तो बाबा साहब ने इसका विरोध क्यूँ नहीं किया? जब कि बाबा साहेब अंबेडकर दलितों पिछड़ों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के हित में एक बेहतर संविधान की रूप रेखा तैयार की थी तो दलितों पिछड़ों आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के अधिकार को छिनने वाल आर्टिकल संविधान में क्यूँ अंकित करना पड़ा????

मैं संविधान के उन आर्टिकल – अनुच्छेद 368 से बिल्कुल भी सहमत नहीं हूं, जिसमे यह सांसद सदस्यों की 2 तिहाई बहुमत से संविधान के किसी भी प्रावधान को बदला जाए या नया कानून बनाया जाए। इसका अनुच्छेद 368 का खुले आम दुरुपयोग हो रहा है।

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यह एक बहुत ही गहरा, गंभीर और महत्वपूर्ण सवाल है। जब हम आज के संदर्भ में देखते हैं, तो ऐसा लग सकता है कि **अनुच्छेद 368 (Article 368 – संविधान संशोधन की शक्ति)** एक ऐसा हथियार है जिससे किसी के अधिकार छीने जा सकते हैं। लेकिन जब हम इतिहास की परतों को खोलते हैं और बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर और संविधान सभा की सोच को समझते हैं, तो तस्वीर बिल्कुल बदल जाती है।
आइए समझते हैं कि बाबासाहेब और संविधान समिति ने इस अनुच्छेद को क्यों शामिल किया और इसके पीछे की असली कहानी क्या है:
## 1. क्या यह आर्टिकल जानबूझकर डाला गया या दबाव में?
यह आर्टिकल किसी ‘दबाव’ में नहीं, बल्कि **एक सोची-समझी दूरदर्शी रणनीति** के तहत डाला गया था। बाबासाहेब अंबेडकर स्वयं इस बात के पक्षधर थे कि संविधान लचीला (Flexible) भी होना चाहिए और कठोर (Rigid) भी।
संविधान सभा की बहसों (Constituent Assembly Debates) में बाबासाहेब ने स्पष्ट किया था कि हम एक ऐसा संविधान नहीं बनाना चाहते जो इतना कठोर हो कि समय बदलने पर वह टूट जाए।
> **बाबासाहेब का प्रसिद्ध तर्क:**
> *”संविधान को इतना भारी और अपरिवर्तनीय नहीं होना चाहिए कि आने वाली पीढ़ियां अपनी जरूरतों के हिसाब से इसमें बदलाव ही न कर सकें। यदि हम संविधान को बदलने का कोई रास्ता नहीं छोड़ते, तो भविष्य की पीढ़ियों के पास क्रांति या विद्रोह करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।”*
>
## 2. अधिकारों को ‘छीनने’ के लिए नहीं, बल्कि ‘बढ़ाने’ के लिए था यह आर्टिकल
आपकी यह चिंता पूरी तरह जायज है कि इस आर्टिकल का इस्तेमाल दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के अधिकार कम करने के लिए किया जा सकता है। लेकिन बाबासाहेब ने इसे **अधिकारों को सुरक्षित करने और समय के साथ उन्हें और मजबूत करने** के लिए बनाया था।
इसके कुछ मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
* **बदलते समय की जरूरतें:** 1950 में जो परिस्थितियां थीं, वे हमेशा वैसी नहीं रहने वाली थीं। बाबासाहेब जानते थे कि भविष्य में दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को आगे बढ़ाने के लिए नई नीतियां और नए कानूनों की जरूरत होगी, जिसके लिए संविधान में संशोधन करना ही पड़ेगा।
* **आरक्षण का विस्तार:** मूल संविधान में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए राजनीतिक आरक्षण सिर्फ 10 साल के लिए था। अगर अनुच्छेद 368 न होता, तो 10 साल बाद इसे बढ़ाना असंभव हो जाता। आज जो आरक्षण बढ़ रहा है, वह इसी अनुच्छेद 368 की बदौलत संभव हो पाया है।
* **मंडल आयोग और OBC आरक्षण:** मूल संविधान में पिछड़े वर्गों (OBC) के लिए नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण का सीधा प्रावधान उस तरह नहीं था जैसा आज है। बाद में संविधान संशोधनों के जरिए ही OBC समाज को उनका अधिकार और आरक्षण मिला।
## 3. बाबासाहेब ने इसका विरोध क्यों नहीं किया?
बाबासाहेब ने इसका विरोध इसलिए नहीं किया क्योंकि **वे खुद इसके मुख्य रचनाकारों में से एक थे।** वे जानते थे कि एक जीवित और प्रगतिशील समाज के लिए उसका कानून भी जीवित होना चाहिए, न कि पत्थरों की लकीर।
हालांकि, बाबासाहेब इस बात को लेकर भी सतर्क थे कि कोई तानाशाह सरकार आकर पूरे संविधान को ही न बदल दे। इसलिए उन्होंने अनुच्छेद 368 को ऐसा बनाया कि **संविधान को बदलना इतना आसान भी न हो**।
* कुछ हिस्सों को बदलने के लिए संसद के दोनों सदनों में **दो-तिहाई (2/3) बहुमत** की जरूरत होती है।
* राज्यों के अधिकारों से जुड़े मामलों में देश के आधे से अधिक राज्यों की विधानसभाओं की मंजूरी भी जरूरी होती है।
## 4. सुरक्षा कवच: “मूल ढांचा” (Basic Structure) का सिद्धांत
भले ही अनुच्छेद 368 के तहत संसद को संशोधन की शक्ति मिली, लेकिन बाबासाहेब की दूरदर्शिता और बाद में न्यायपालिका (Supreme Court) सजग रही। 1973 के प्रसिद्ध **केशवानंद भारती केस** में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया:
> **मूल ढांचे का सिद्धांत:** संसद संविधान में संशोधन तो कर सकती है, लेकिन वह संविधान के **’मूल ढांचे’ (Basic Structure)** को नष्ट नहीं कर सकती।
>
दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों के मौलिक अधिकार, समानता का अधिकार, और धर्मनिरपेक्षता हमारे संविधान का मूल ढांचा हैं। कोई भी सरकार बहुमत के दम पर भी इन बुनियादी अधिकारों को हमेशा के लिए खत्म नहीं कर सकती।
## निष्कर्ष
संक्षेप में कहें तो, अनुच्छेद 368 दलितों, पिछड़ों या अल्पसंख्यकों के अधिकार **छीनने के लिए नहीं, बल्कि देश के बदलते हालातों के अनुसार उनके हक में नए कानून जोड़ने के लिए** रखा गया था। यह बाबासाहेब की लाचारी नहीं, बल्कि उनकी बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता का प्रमाण था।
क्या आपको लगता है कि वर्तमान समय में इस अनुच्छेद के सुरक्षा मानकों को और कड़ा करने की आवश्यकता है, ताकि कोई इसका दुरुपयोग न कर सके?

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यह एक बेहद गहरा और विचारणीय सवाल है। जब हम आज के संदर्भ में देखते हैं, तो ऐसा लग सकता है कि संविधान संशोधन की शक्ति (आर्टिकल 368) का उपयोग हाशिए पर मौजूद समाजों के अधिकारों को कमजोर करने के लिए किया जा सकता है। लेकिन अगर हम 1940 के दशक के उस दौर में जाएं जब संविधान बन रहा था, तो बाबा साहब डॉ. बी.आर. अम्बेडकर और संविधान सभा की सोच बिल्कुल अलग और बहुत दूरदर्शी थी।
आर्टिकल 368 को किसी दबाव में नहीं, बल्कि **एक सोची-समझी रणनीति और भविष्य की जरूरतों को देखते हुए** संविधान में शामिल किया गया था। आइए इसके पीछे के असली कारणों और बाबा साहब के तर्कों को समझते हैं:
### 1. एक ‘जीवंत’ संविधान की जरूरत (बदलाव ही प्रकृति का नियम है)
बाबा साहब अम्बेडकर का मानना था कि संविधान कोई जड़ या अपरिवर्तनीय (static) दस्तावेज नहीं होना चाहिए। समय के साथ समाज बदलता है, नई चुनौतियाँ आती हैं और नई जरूरतें पैदा होती हैं।
यदि संविधान को पूरी तरह से ‘अपरिवर्तनीय’ बना दिया जाता (जैसा कि अमेरिका का संविधान काफी हद तक है), तो भविष्य की पीढ़ियों के हाथ बंध जाते। बाबा साहब ने खुद संविधान सभा में कहा था:
> “सभा ने संविधान पर अंतिम और अपरिवर्तनीय होने की मुहर नहीं लगाई है। ऐसा करके उसने खुद को कनाडा की तरह रूढ़िवादिता से और अमेरिका की तरह अदालती मुकदमों से बचाया है।”
>
### 2. क्या यह आर्टिकल बाबा साहब ने जानबूझकर रखा या समिति के दबाव में?
यह निर्णय किसी दबाव में नहीं लिया गया था। बाबा साहब अम्बेडकर (जो मसौदा समिति यानी Drafting Committee के अध्यक्ष थे) और संविधान सभा के अन्य प्रमुख सदस्यों (जैसे जवाहरलाल नेहरू और सर अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर) के बीच इस पर लंबी चर्चा हुई थी।
* **लचीलेपन और कठोरता का संतुलन:** बाबा साहब एक ऐसा संविधान चाहते थे जो न तो इतना लचीला हो कि कोई भी सरकार अपनी मर्जी से इसे रोज बदले, और न ही इतना कठोर हो कि देश की प्रगति ही रुक जाए। इसलिए आर्टिकल 368 में संशोधन के लिए **विशेष बहुमत (Special Majority)** और कुछ मामलों में राज्यों की सहमति की शर्त रखी गई, ताकि कोई भी सत्ता का दुरुपयोग न कर सके।
### 3. दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के अधिकारों की सुरक्षा
आपका यह डर बिल्कुल वाजिब है कि इस आर्टिकल से अधिकार छीने जा सकते हैं, लेकिन बाबा साहब की सोच इसके बिल्कुल उलट थी। वे जानते थे कि आने वाले समय में **शोषितों को और अधिक अधिकार देने के लिए भी संशोधन की जरूरत पड़ेगी।** इतिहास गवाह है कि ऐसा ही हुआ:
* **पहला संविधान संशोधन (1951):** यह संशोधन खुद बाबा साहब के कानून मंत्री रहते हुए (और नेहरू जी द्वारा) लाया गया था। इसके जरिए जमींदारी उन्मूलन को कानूनी सुरक्षा दी गई और **पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण (Article 15(4)) का रास्ता साफ किया गया**, जिसे अदालतों में चुनौती दी जा रही थी।
* **सैल्यूटरी संशोधन:** बाद के वर्षों में एससी/एसटी को पदोन्नति में आरक्षण (Promotion में Reservation) देने या नौवीं अनुसूची के जरिए कल्याणकारी कानूनों को अदालती दखल से बचाने के लिए भी इसी आर्टिकल 368 का सहारा लिया गया।
यानी, यह आर्टिकल केवल अधिकार छीनने के लिए नहीं, बल्कि **बदलते समय के साथ शोषितों के हक में नए कानून बनाने और पुराने कानूनों को मजबूत करने का एक जरिया था।**
## सुप्रीम कोर्ट का ‘कवच’: बुनियादी ढांचा (Basic Structure)
बाबा साहब की दूरदर्शिता को पूरा करने के लिए 1973 में सुप्रीम कोर्ट ने **’केशवानंद भारती मामले’** में एक ऐतिहासिक फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि संसद के पास आर्टिकल 368 के तहत संशोधन की शक्ति तो है, लेकिन वह **संविधान के बुनियादी ढांचे (Basic Structure) को नष्ट नहीं कर सकती।**
इस बुनियादी ढांचे में क्या-क्या शामिल है?
* **मौलिक अधिकार और सामाजिक न्याय**
* **धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र**
* **संविधान की सर्वोच्चता**
इसका मतलब यह है कि आज की तारीख में भी कोई भी सरकार आर्टिकल 368 का इस्तेमाल करके दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों या अल्पसंख्यकों के मूल अधिकारों को पूरी तरह से खत्म नहीं कर सकती। अगर कोई ऐसा प्रयास होता है, तो न्यायपालिका (सुप्रीम कोर्ट) उस संशोधन को असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर सकती है।
### निष्कर्ष
संक्षेप में कहें तो, बाबा साहब ने आर्टिकल 368 को किसी मजबूरी या दबाव में नहीं, बल्कि देश और समाज की प्रगति को जारी रखने के लिए एक **’सुरक्षा वाल्व’** के रूप में रखा था। उनका मानना था कि एक पीढ़ी आने वाली सभी पीढ़ियों के भाग्य को हमेशा के लिए एक ही कानून में नहीं बांध सकती। दोष आर्टिकल 368 में नहीं है, बल्कि इसका उपयोग करने वाली राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है।

ZEA
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