“सीमा पर तनाव है, देशवासियों में डर है… और गोदी मीडिया फेक न्यूज़ में मशगूल है!”

हमें उन पत्रकारों और प्लेटफॉर्म्स का साथ देना चाहिए जो सच बोलने का साहस रखते हैं।

सीमा पर तनाव, महंगाई, बेरोजगारी, गिरती अर्थव्यवस्था पर न कोई बहस होती है, न सवाल। गोदी मीडिया की स्क्रीन पर बस चल रहा है:

“सीमा पर तनाव है, देशवासियों में डर है… और गोदी मीडिया फेक न्यूज़ में मशगूल है!”

लेखक: सैय्यद आसिफ इमाम काकवी

पत्रकारिता कभी ‘जनता की आवाज़’ कहलाती थी, आज वो सत्ता की दासता में तब्दील हो चुकी है। देश की असल समस्याओं — सीमा पर तनाव, महंगाई, बेरोजगारी, गिरती अर्थव्यवस्था पर न बहस न कोई सवाल, 

सरकारी मीडिया झूठ परोसने के लिये अपने दायित्व का निर्वाह कर रही है

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जब देश की सीमाओं पर हलचल होती है, तो हर जागरूक नागरिक का दिल धड़क उठता है। सैनिकों की सुरक्षा, देश की गरिमा और राष्ट्रीय एकता की चिंता हर भारतवासी के मन में होती है। आज की तारीख में, जब देश की सीमाओं पर तनाव चरम पर है, आम आदमी दुआओं में डूबा है — हर गली, हर शहर, हर गांव में लोग अपने-अपने तरीक़े से देश के लिए चिंतित हैं।
लेकिन दुर्भाग्य देखिए — हमारे देश की तथाकथित ‘मुख्यधारा मीडिया’ यानी गोदी मीडिया, इन असली चिंताओं से पूरी तरह बेखबर है।
आज मीडिया का बड़ा तबका अपना मूल उद्देश्य ही भूल चुका है। पत्रकारिता कभी ‘जनता की आवाज़’ कहलाती थी, आज वो सत्ता की दासता में तब्दील हो चुकी है। देश की असल समस्याओं — सीमा पर तनाव, महंगाई, बेरोजगारी, गिरती अर्थव्यवस्था पर न कोई बहस होती है, न सवाल। गोदी मीडिया की स्क्रीन पर बस चल रहा है:
क्या यही पत्रकारिता है?
नोएडा के स्टूडियो — झूठ के मठ
आज कई चैनलों के स्टूडियो झूठ फैलाने के आधुनिक केंद्र बन चुके हैं। वहां से उठने वाली आवाज़ें न तो तथ्यों पर आधारित होती हैं, न सत्य के प्रति जवाबदेह। वे सिर्फ एक काम करती हैं — जनता को भटका कर, सत्ता का महिमामंडन करना।
सवाल उठता है – जब देश संकट में हो, तब मीडिया का काम जनता को सच्चाई दिखाना है या फिर सत्ता की तारीफों में डूब जाना?
हर दिन कोई न कोई चैनल एक ‘एक्सक्लूसिव’ ब्रेकिंग न्यूज़ चलाता है, जो बाद में झूठी निकलती है। लेकिन कभी कोई माफ़ी नहीं, कभी कोई स्पष्टीकरण नहीं। बस जनता के दिमाग़ में ज़हर भर देने की जल्दी है — TRP चाहिए, देश नहीं।
और ये सिलसिला लगातार चल रहा है — जब लोग रोजगार मांगते हैं, तो ये मीडिया उन्हें “देशद्रोही” करार देती है। जब छात्र आंदोलन करते हैं, तो उन्हें “टुकड़े-टुकड़े गैंग” का हिस्सा बना देती है।
क्या सरकार की कोई ज़िम्मेदारी नहीं?
क्या सरकार को नहीं देखना चाहिए कि देश की सबसे बड़ी सूचना प्रणाली कैसे झूठ का व्यापार बन गई है? अगर सरकार वाकई पारदर्शिता और जवाबदेही में विश्वास रखती है, तो गोदी मीडिया के खिलाफ कड़ी कार्यवाही क्यों नहीं करती?
आज अगर देश की 90% मीडिया फेक न्यूज़ से मुक्त हो जाए, तो आधे से ज़्यादा तनाव, डर और भ्रम अपने-आप खत्म हो जाएगा।
अब समय आ गया है कि हम, जनता, खुद तय करें कि हम क्या देखें, किसे सुनें और किन्हें नजरअंदाज़ करें। हमें यह समझना होगा कि सच्चाई शोर में नहीं होती, वो खोज में होती है। हमें उन पत्रकारों और प्लेटफॉर्म्स का साथ देना चाहिए जो सच बोलने का साहस रखते हैं।
मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होता है। लेकिन जब यही स्तंभ सड़ा हुआ हो, झूठ और एजेंडे का भार उठाए हुए हो — तो उस लोकतंत्र की नींव हिल जाती है।
आज का भारत बदलाव चाहता है। और ये बदलाव तब आएगा जब लोग झूठ की दुकानें बंद कर, सच्चाई की राह अपनाएंगे। देश को चाहिए सच्ची पत्रकारिता — और इसके लिए हमें भी ज़िम्मेदार बनना होगा।

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