उत्तर से पूर्वोत्तर तक हिंदी ही हृदयधारिणी
विश्व की तीसरी सर्वाधिक लोकप्रिय भाषा के रूप में इसने अपनी वैश्विक स्थिति तो मजबूत कर ली पर यह उत्तर पूर्व के अपने ही प्रांतों में यह पिछड़ गई।
भाषाओं की प्रयोगशाला माने जाने वाले इस क्षेत्र ने तकरीबन 200 बोलियो के प्रचलित स्वरूप को स्थान दिया है। बावजूद इसके हिंदी एक बड़ी संपर्क भाषा के रूप में पूर्वोत्तर के फलक पर तेजी से उतर रही है।
उत्तर से पूर्वोत्तर तक हिंदी ही हृदयधारिणी

डॉ दर्शनी प्रिय
संपादक
बीते दिनों प्रधानमंत्री के एक अभिभाषण में क्षेत्रीय भाषा सहित प्रमुख भारतीय भाषाओं को रोजगार परक बनाने और उसके व्यावहारिक पक्ष को व्यावसायिकता से जोड़ने पर बल दिया गया।राजभाषा हिंदी व्यावसायिकता और व्यावहारिकता की धूरी बन रोजगार सृजन में अपनी अहम भूमिका का निर्वहन करे इसे महत्वपूर्ण रूप से रेखांकित करते हुए इसके विभिन्न पहलुओं को विकास, रोजगार और स्वाबलंबन के साथ जोड़ने की भी बात कही गई। विशेष तौर से पूर्वोत्तर इस उद्दाम विस्तार का एकल केंद्र बने इसकी आवश्यकता को सार्वजनिक किया गया।

मौजूदा समय में हिंदी अकेली ऐसी सामर्थ्यवान भाषा है जो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में विपणन माध्यम का मजबूत आधार बन कर उभरा है। इसके सामर्थ्य और योग्यता पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि पेशेवराना रवैया अपनाते हुए एक सक्रिय अभिनेता की भांति इसे विपणन बाजार का हिस्सा बनाया जाए। जाहिर है इसके लिए सघन नीति और दूरदर्शी दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी।
उत्तर भारत से कटे राज्यों में इसके जरिए रोजगार सृजन के अवसरों की तलाश शुरू हो चुकी है। जिस तरह वैश्विक बाजार में यह भाषा अपने कदम मजबूत कर रही है उसे देखते हुए घरेलू बाजार में भी इसे व्यापार विनमय का माध्यम बनाना आवश्यक होगा। विश्व की तीसरी सर्वाधिक लोकप्रिय भाषा के रूप में इसने अपनी वैश्विक स्थिति तो मजबूत कर ली पर यह उत्तर पूर्व के अपने ही प्रांतों में यह पिछड़ गई।
अपनी ऐतिहासिक यात्रा में अनन्य बाधाओं को पार कर दशकों पहले इसने पूर्वोत्तर की धरती पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कर ली थी ।तब से लेकर अब तक असंख्य साहित्य,हिंदी भाषा में सृजित किए जा चुके है। इससे जुड़े स्तरीय शोध कार्य और साहित्य विस्तार पर अपेक्षित परिणाम भी प्राप्त हुए।कालक्रम में अपेक्षित रूप से यह परिमार्जित और परिष्कृत होती रही लेकिन सांस्थानिक रूप से कभी यह व्यवसायिक पाठ्यक्रमों का हिस्सा नहीं बन पाई।दरअसल कभी सुनियोजित तरीके से इस पर विचार ही नहीं किया गया। पेशेगत इकाइयों में इसकी भूमिका अहम हो सकती है।इसके ज़रिए रोजगार के गहनतम स्त्रोतो की तलाश भी की जा सकती है।
पर हाल ही में केंद्र के निर्देशों के अनुपालन में उत्तर पूर्व के विश्वविद्यालयों में हिंदी के शिक्षण अवसरों को बढ़ाने पर जोर दिया गया है। यह इस बात के स्पष्ट संकेत है कि पेशेगत क्षेत्र में इसके जरिए रोजगार की रस्साकसी शुरू होचुकी है। उधर मिजोरम के राज्यसभा को लेकर चर्चा गर्म रही कि राज्य में हिंदी शिक्षकों की मौजूदा संख्या बढ़ाई जाए ताकि प्राथमिक स्तर पर राष्ट्रभाषा सीखने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए जाए और भविष्य में इसे व्यवसायिक गतिविधियों से जोड़ा जा सके। मिजोरम में समग्र शिक्षा योजना के तहत हिंदी के 855 पद स्वीकारें गए है।इससे सरकारी स्कूलों और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में हिंदी शिक्षकों की आवश्यकता को पूरा किया जा सकेगा। अगर समय रहते इन्हें भर लिया गया तो हिंदी की व्यवसायिक संभावनाओं के नए मार्ग खोले जा सकेंगे।
सवाल है जब सिक्किम में 7.9 फीसदी, अरुणाचल में 7.09 फीसदी, नगालैंड में 3.18 फीसदी, मिजोरम में 0.97 फीसदी, मणिपुर में 1.11 फीसदी,असम में 6.73 फीसदी और त्रिपुरा में 2.11 फीसदी हिंदी बोलने वाले है तो क्या कारण है कि अब तक यह व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का हिस्सा नहीं बन पाई।
आखिरी जनगणना के डाटा को आधार बनाएं तो देश में करीब 43.63 फीसदी जनता की पहली भाषा हिंदी है। यानी आज से 10 साल पहले देश के 125 करोड़ लोगों में से लगभग 53 करोड़ लोग हिंदी को ही मातृभाषा मानते थे।पूर्वोत्तर भारत में कोई भी प्रदेश ऐसा नहीं रह गया है जहाँ के लोग हिंदी न समझते हों ।
1934 में अखिल भारतीय हरिजन सेवा संघ की स्थापना से पूर्वोत्तर में हिंदी का वास्तविक रूप सुनिश्चित किया गया था। थोड़ा ध्यान से देखे तो साल 1938 में गुवाहाटी असम हिंदी प्रचारिणी समिति की स्थापना ने इसके विस्तार को गति दी।
भारत में तेजी से बढ़ती टेक्नोलॉजी और इंटरनेट के विकास के चलते इस क्षेत्र में रोजगार के कई अवसर खुले है। वेबसाइट डि़जाइनिंग,वीएफएक्स,एनिमेशनइस,सॉफ्टवेर इंजीनियरिंग, कंप्यूटर पेरिफ्रल रिपेयरिंग, डिप्लोमा इन नेटवर्किंग एंड कम्यनिकेशन, इंटरनेट मार्केटिंग एंड सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन, प्रोग्रामिंग लैंग्वेज,हार्डवेअर और नेटवर्किंग, वीएफएक्स और एनिमेशन के कोर्स में विजुअल इफेक्ट, एनिमेशन, 3डी टेक्नोलॉजी और ग्राफिक्स,वेब डिजाइनिंग कोर्स के अंतर्गत कोडिंग और लैंग्वेज आदि जैसे हजारों ऐसे पाठ्यक्रम है जिनमें हिंदी की केन्द्रीय भूमिका के जरिए इच्छित परिणाम हासिल किये जा सकते है। पूर्वोत्तर के युवाओं को इससे जोड़ कर राष्ट्रीय आर्थिकी कोष में वृद्धि भी की जा सकती है।
हालांकि पूर्वोत्तर एक अहिन्दी भाषी क्षेत्र है। बावजूद इसके पेशेगत तौर पर हिंदी की उपादेयता से इंकार नहीं किया जा सकता। यहाँ के 8 राज्यों में असमीया के साथ ही बंगला, नेपाली, मणिपुरी, अंग्रेजी, खासी, गारो, निशी, आदि, मोनपा, वांग्चु, नागामीज, मिजो, काॅकबराक, लेप्चा, भुटिया आदि जैसी विभिन्न भाषायें एवं बोलियां प्रचलित हैं। अधिकांश भाषा एवं बोलियां तिब्बत-बर्मी परिवार की होने के कारण अलग से पहचानी जाती हैं।
भाषाओं की प्रयोगशाला माने जाने वाले इस क्षेत्र ने तकरीबन 200 बोलियो के प्रचलित स्वरूप को स्थान दिया है। बावजूद इसके हिंदी एक बड़ी संपर्क भाषा के रूप में पूर्वोत्तर के फलक पर तेजी से उतर रही है।300 से अधिक विभिन्न जातियों की के बीच हिंदी संपर्क भाषा के रूप में अपनी स्थिति बनाए हुए हैं।असम में भी बड़ी संख्या में राजस्थान और हरियाणा से आए हुए लोग,व्यापारी वर्ग, उत्तर प्रदेश, बिहार से लाखों की संख्या में मजदूर हिंदी को रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल कर अपना जीवन यापन कर रहे है।व्यवसायिक कारोबारी, रिक्शा चालक, नाई, कूलियों, रेलकर्मचारियों, मजदूरों तथा सेना के मध्य हिन्दी का काम चलाऊ प्रयोग होता रहा है। तो क्यों न कॉरपोरेट और बड़े व्यवसायिक पाठ्यक्रमों में इसे आय के स्त्रोत के तौर पर प्रस्तुत किया जाए।
हिंदी भाषी प्रदेशों के लोग पूर्वोत्तर में दूरस्थ अंचलों तक फैल हुए हैं । ये लोग स्थानीय जनसमुदाय की रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल हो गए हैं । इन्हीं के साथ हिंदी का मास मीडिया भी (आडियो, वीडियो, टी वी, फ़िल्म आदि) क्रमश: फैलता जा रहा है ।हिन्दी भाषा का प्रयोग अधिकांश प्रवासी हिन्दी भाषियों द्वारा आपस में किया जाता है।
सवाल है कि हिंदी इतने बड़े स्तर पर बोली, सुनी और प्रयोग में लाई जा रही है तो उससे जुड़े व्यवसायिक निहितार्थ क्यों नहीं तलाशे जा रहे। विश्विद्यालयों में प्रोफेशनल कोर्स का माध्यम बनाकर इसे ऐच्छिक रूप से पाठ्यक्रमों में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए।केवल तभी बात बनेगी। समय आ गया है कि उत्तर भारत से इतर पूर्वोत्तर में हिंदी, छात्रों के भविष्य का निर्धारण करें। इसके व्यावसायिक नोहितार्थों की समय रहते पहचान की जाए।पूर्वाग्रह इसकी राह में बाधा न बने इसके पुरजोर प्रयास करने होगे। इस धारणा को स्वीकार करना होगा कि भाषा का निर्माण संस्थान अथवा सरकारें नहीं आम लोग करते हैं क्षैतिज और उर्ध्वाधर विविधता से भरी हिंदी के इस व्यापक भूगोल को जितनी जल्दी हो स्वीकार लिया जाए तभी पेशेगत रूप में छात्र और आम जन इससे जीविकोपार्जन का माध्यम बना सकेंगे। पूर्वोत्तर में हिंदी भाषियों की बढ़ती संख्या और उत्तरोत्तर बढ़ते व्यवसाय को देखते हुए इसे पेशवर अंदाज में पेश करना ही होगा। क्योंकि हिंदी प्रोफेशनल वैश्विक जगत में अपनी भूमिका के साथ तैयार है।बस उन्हें प्रशिक्षण और व्यावसायिकता से जोड़ने की दरकार है।
डॉ दर्शनी प्रिय
संपादक
राज्यसभा सचिवालय
नई दिल्ली यह इनके अपने विचार है।

