लालू प्रसाद यादव बिहार के राजनीति अखाड़े में एक बार फिर लंगोट बांधेंगे? या बेटे के लिये शिक्षक प्रचारक रहेंगे?

“हवाओं की तो आदत है चरागों से ख़फ़ा रहना, जिसे महफूज़ ख़ुदा रखे, उसे तूफां से क्या डरना…”

लालू यादव आज भी बिहार के राजनीतिक अखाड़े में व्यावस्थापक और एक रेफरी रोल बख़ूबी निभा रहे हैं। क्या लालू प्रसाद यादव बिहार के राजनीति अखाड़े में एक बार फिर लंगोट बांधेंगे? या बेटे के लिये शिक्षक प्रचारक रहेंगे?

लालू प्रसाद यादव बिहार की राजनीति के एक मजबूत स्तंभ

सैय्यद आसिफ इमाम काकवी

“हवाओं की तो आदत है चरागों से ख़फ़ा रहना,
जिसे महफूज़ ख़ुदा रखे, उसे तूफां से क्या डरना…”

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यह शेर बिहार की राजनीति के सबसे करिश्माई नेता, लालू प्रसाद यादव पर बिल्कुल सटीक बैठता है। तमाम मुश्किलों के बावजूद, वे आज भी बिहार की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। राजनीति के मंच पर ऐसे बहुत कम नेता हुए हैं, जिन्होंने जनता के दिलों में इतनी गहरी छाप छोड़ी हो।

आज प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा लालू प्रसाद यादव से लैंड फॉर जॉब मामले में पूछताछ की जा रही है। सुबह 11:00 बजे जब लालू यादव ईडी ऑफिस पहुंचे, तो उनके समर्थकों ने ज़ोरदार नारेबाजी कर अपना समर्थन जताया। उनके साथ उनकी बेटी मीसा भारती भी थीं। इससे पहले मंगलवार को ईडी ने उनकी पत्नी और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और उनके बेटे तेज प्रताप यादव से भी पूछताछ की थी।

2004 से 2009 के बीच, जब लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री थे, तब ग्रुप डी की नौकरियों के बदले कथित तौर पर जमीन लिए जाने का यह मामला सामने आया। इस मामले की जांच के चलते उन्हें कई बार पूछताछ का सामना करना पड़ा है।

बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का क़द हमेशा ऊंचा रहा है। और रहेगा, दशकों तक मुख्यमंत्री कोई भी रहा हो, परन्तु बिहार की ज़मीनी राजनीतिक के असली समाजवादी नेता के रूप में बिहार की जनता ने हमेशा लालू यादव को ही देखा।

उनके भाषणों में जो सादगी और जनता से जुड़ाव था, वह अन्य नेताओं में कम ही देखने को मिलता है। उनके नाम पर आज भी हजारों लोग सड़कों पर उतर आते हैं, नारे लगाते हैं और उन्हें अपने नेता के रूप में स्वीकार करते हैं।

लालू यादव सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की एक आवाज़ हैं। उन्होंने गरीबों, दलितों, पिछड़ों और वंचितों के हक के लिए जिस तरह से संघर्ष किया, वैसा कम ही नेता कर पाते हैं। उन्होंने समाज के उस तबके को सम्मान दिलाया, जिसे राजनीति में हाशिए पर रखा गया था।

लालू यादव सिर्फ एक राजनेता ही नहीं, बल्कि एक शानदार प्रशासक भी रहे हैं। जब वे रेल मंत्री थे, तब भारतीय रेलवे 90,000 करोड़ रुपये के मुनाफे में आई, और वह भी बिना किसी निजीकरण के। यह एक ऐसा प्रबंधन चमत्कार था, जिसने दुनियाभर का ध्यान खींचा।

हावर्ड यूनिवर्सिटी जैसी दुनिया की शीर्ष संस्थाओं ने उन्हें अपने छात्रों को प्रबंधन के गुर सिखाने के लिए आमंत्रित किया। उन्हें “मैनेजमेंट गुरु” का खिताब दिया गया। यह किसी भी भारतीय राजनेता के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी। मगर, दुर्भाग्य से भारतीय मीडिया ने इस महान उपलब्धि को नजरअंदाज कर दिया और उन्हें “चारा चोर” कहकर संबोधित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

इतने संघर्षों और राजनीतिक उठापटक के बावजूद, लालू प्रसाद यादव झुके नहीं। उनकी आवाज़ को दबाने की कई कोशिशें हुईं, लेकिन बिहार की जनता आज भी उनके साथ खड़ी है। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब भी वह किसी राजनीतिक सभा में जाते हैं, हजारों लोग उनकी एक झलक पाने के लिए उमड़ पड़ते हैं।

उनकी सेहत को लेकर उनके समर्थक चिंतित रहते हैं और उनके बेहतर स्वास्थ्य की कामना करते हैं।

“बेबाक है, ज़िद होश है, ज़िंदादिल है लालू,

मैदाने सियासत का पहरेदार है लालू।

हरगिज़ नहीं घबराना, तेरे साथ है जनता,

हम तेरी कियादत के तरफदार हैं लालू।”

लालू प्रसाद यादव सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि एक विचारधारा हैं, एक संघर्ष की कहानी हैं। उनकी राजनीति ने बिहार को एक नई पहचान दी, और उनका संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा बना रहेगा। अब सवाल उठता है कि 2014 के बाद जिस प्रकार लालू प्रसाद को बिहार के राजनीतिक अखाड़े में चारो ओर से घेर कर गिराया गया, उनके साथ दूसरे नेता संसार छोड़ गए और कुछ राजनीतिक छोड़ गए, बावजूद लालू डटे रहे, यहां तक राजनीतिक षड्यंत्र के तहत लालू प्रसाद को रांची जेल में जान से मारने का भी अथाह प्रयास किया गया, यह जगज़ाहिर है, और तेजस्वी यादव अपने बाप को बचाने के लिये एक सच्चा सपूत होने हर सम्भव अपना दायत्व का निर्वाह किया जिसका नतीजा आज लालू यादव आज भी बिहार के राजनीतिक अखाड़े में व्यावस्थापक और एक रेफरी रोल बख़ूबी निभा रहे हैं। अब सवाल है – लालू प्रसाद यादव बिहार के राजनीति अखाड़े में एक बार फिर लंगोट बांधेंगे? या बेटे के लिये शिक्षक प्रचारक रहेंगे? अब देखना ऊंट किस करवट बैठता है?

 

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