ज़िन्दगी का सफर – है यह कैसा सफर?
भारत मे घरेलू महिलाओं की ज़िंदगी – चाहे वह अमीर हो या चाहे गरीब हो। कशमकश में ही गुजरती है – बिहार में महिलाओं पर यह भी मिसाल बड़ा प्रचलित है, ” बेलदार की बेटी ने नहिरे सुख न सौहरे सुख”,,,,…
छुपा के दर्द सीने में ज़िन्दगी गुज़ारदी……चेहरे पर शिकन, दर्द का कभी आने न दिया।
एस ज़ेड मलिक
आज मैं एक ऐसी जीवंत कहानी सर्वजनिक करने जा रहा हूँ, जिसका शायद इस संसार मे मिसाल होगा, यह मैं नहीं कह सकता, लेकिन, आज उस खामोश, शांत, इच्छाविहीन महिला की अंतिम यात्रा में मैंने आज जो देखा और महसूस किया, वह आने वाली नस्लों के लिये एक सीख और प्रेरणा ही होगा।
मेरी बचपन की कुछ यादें तो लग भग पैदाइश से ले कर मेरी उम्र के 7 या 8 सालों तक मेरे होश सम्भालते तक, और अपने बुजुर्गों से सुनी कुछ कहानी, तथा कुछ उनके अपनो से !—- जो देखा सुना और महसूस किया। इस कहानी की शुरुआत पटना ज़िला के मुसलमानो के एक छोटा सा कस्बा नदौल, जहां रेलवे स्टेशन और उसके साथ जिसे गया पटना मार्ग कहा जाता था, आज राष्ट्रीय राज मार्ग वहां से गुजरता है, उस समय यानी 1965 में वह वह गिट्टी बिछी हुयी कच्ची संकीर्ण सड़क हुआ करती थी, जिस मार्ग पर बैल गाड़ियां और घोड़ा गाड़िया, साइकल तथा डोली और पैदल सब-डिवीज़न तारेगना या जहानाबाद यह नदौल के उत्तर और दक्षिण में छोटे शहर हुआ करते थे। तब नदौल में एक जमींदार जिनका नाम….. हुआ करते थे। उनके दो बेटे थे, बड़े का नाम शायेद ज़हूर क़ासिम और छोटे का नाम जिनका नाम ज़ुबैर क़ासिम, उर्फ नन्हू था, छोटे भाई नन्हू चाचा के पास एक बेटा और चार बेटी हैं, सबसे बड़ी बुन्नी उर्फ

नन्हू चचा, उर्फ ज़ुबैर क़ासिम, साहब

