पहलगाँम आतांकि हमला एक सोंची समझी साजिश तो नही?

कश्मीर में हत्या – इंसानियत के खिलाफ एक अमानवीय हमला

इस हमले की जितनी भी आलोचना, जितनी भी भर्त्सना, जितनी भी निंदा की जाये कम कम ही होगी, लेकिन केंद्र सरकार को अपनी नीति सुनिश्चित करनी चाहिये, कहीं आतांकि के नाम पर किसी विशेष समुदायें के निदोष लोगों निशाना न बनाया जाने लगे।
सिक्के के दो पहलू होते हैं हम भारत वासियों को यह भी याद रखना चाहिये।

कश्मीर में 27 लोगों की हत्या – इंसानियत के खिलाफ एक अमानवीय हमला

 आतंकियों के शिकार इन सभी मृतकों को भावभीनी श्राद्धाञ्जली😭😭😭🙏🏽🙏🏽🙏🏽ईश्वर इनके आत्मा को शान्ती एवं इनके परिवार जनों को इस दुख की घड़ी में संतावना दे🙏🏽🙏🏽🙏🏽

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सैय्यद आसिफ इमाम काकवी

इस हमले की जितनी भी आलोचना, जितनी भी भर्त्सना, जितनी भी निंदा की जाये कम कम ही होगी, आतांकि तो आतांकि हैं चाहे वह जिस रूप में हों? बक्शा तो नहीं जाना चाहिये – लेकिन ……केंद्र सरकार को भी अपनी ज़िम्मीदारिया तय करनी चाहिये एवं नीति सुनिश्चित करनी चाहिये, कब तक के आतंकी ऐसे घटना को अंजाम देते रहेंगे? कब यह समाप्त होंगे?

परन्तु सरकार को यह भी ख्याल रखना होगा कि कहीं आतंकी के नाम पर किसी विशेष समुदायें के निर्दोष लोगों निशाना न बनाया जाने लगे? हम भारत वासियों को बहुत सैय्यम और समझदारी के साथ प्रतीक्षा करना होगा, इस हमले के पीछे एक गहरी साजिश की बू आ रही है, जैसे आतंकीयों ने धर्म पूछा और गोलियां बरसानी शुरू कर दी, परन्तु फिर वहां मुस्लिम के तीन लोगों को गोलियां कैसे लगी? तुरंत इस प्रकार का भृमक प्रचार आंधी में जैसे हिंदुस्तान के हर उस घर मे पहुँच गया जो 80 प्रतिशत मोदी जी के अनुयायी हैं, यह गहन विचारणीय है, जबकि स्थानीय कश्मीरी परिवार जिसका बेटा और बहू दो आतंकी के शिकार हो गए, उनका कहना है, “आतंकी तो बस अपना काम करने आये थे उन्होंने अपना काम किया निकल गये, उन्होंने न किसी से पूछा न कुछ बोला बस देखते देखते गोलियां बरसाने लगे।

एक ओर वक़्फ़ संशोधन बिल पर हो हल्ला भारत को एक फिर अशांत कर दिया वहीं दूसरी ओर बंगाल में दंगा होना और उसकी साजिश का पर्दाफाश होना, और फिर इधर कश्मीर के पहलगाँव में धर्म और नाम पूछ कर 27 लोगों की हत्या, यह वह सीन याद दिला रहा है जैसे उत्तरप्रदेश में नाम और धर्मपुछ कर मुसलमानो को मारा जाता रहा और उनका घर जलाया जाता रहा और उन्हें ही, दंगे का आरोपित कर जेल में डाल दिया जाता रहा, तब भी मुसलमानो ने सरकार से ही गुहार लगाई, भारतीय संविधान पर भरोसा करते हुए न्यायालय से ही अब तक अपनी सुरक्षा की गुहार लगा रहे हैं, उन्होंने कभी हत्यार नहीं उठाये। 

हिन्दू भाई हमेशा मुसलमानो के साथ खड़े रहे आज भी हैं और कल भी रहेंगे, इसलिये की, भारत, हिंदुस्तान, इंडिया में हर कोई अंधभक्त नहीं है, यह विचारणीय है, की वहां से जिस प्रकार की खबरें छान कर आ रही है उससे तो यही प्रतीत होता है, की हिंदुओं और मुसलमानों को कभी एक जुट रहने नहीं देंगे, इसलिये यह जान बूझ कर पूरे प्लान के साथ किया गया यह भी प्रयोजित हत्या है। पुलवामा हमला जिसका आज तक कोई निष्कर्ष नहीं निकला? 

आतंकी चाहे कोई भी हो, उसे कतई भी बक्शा जाना नहीं चाहिये। चाहे वह मस्जिद पर भगवा फहराने वाला हो, या किसी का नाम या धर्म पूछ कर उसकी हत्या करने वाला या जबरन नाम।परिवर्तन करनवाने वाला ही क्यूँ न हो, यह सभी आतंक के कैटगरी में आने चाहिये और इन पर भी सख़्त से सख्त कारवाई होनी चाहिये।

 केंद्र सरकार जब भी को नया कानून बनाती है उसे पास करना होता है, या कोई नया कारनामा करना होता है तो अक्सरहां देखा गया है कि हिंदुस्तान में कोई बड़ी घटना हुई ,  चाहे पुलवाना अटैक हो या रेल दुर्घटना , या कहीं आकस्मिक दंगा, इसके के पीछे केंद्र सरकार ने कोई न कोई अपना बड़ा प्रोजेक्ट को अंजाम दिया है, चाहे अडानी को ज़मीन या लू लू यूसुफ को बहुत बड़ा धंधा? या इस के आड़ में कोई अपना हिन्दू राष्ट्र का एजेंडा संविधान में जोड़ना हो तो भी कहीं न कहीं हंगामा करवा कर अपना काम निकाल लेते हैं। यह खेल शुरू से चल रहा यह भली भांति सभी राजनीतिक पार्टयाँ वाले जानते है, थोड़ा चीख चीला कर चुप हो जाते हैं। इसलिये की हिन्दू राष्ट्र के मुद्दे पर आंतरिक तौर पर सभी भाजपा के नीति के साथ हैं।

सिक्के के दो पहलू होते हैं हम भारत वासियों को यह भी याद रखना चाहिये।

कश्मीर, जिसे धरती का स्वर्ग कहा जाता है, एक बार फिर से अमानवीय हिंसा की आग में झुलस गया है। हाल ही में सामने आई खबर, जिसमें धर्म पूछकर निर्दोष पर्यटकों की हत्या की गई, न केवल दिल दहला देने वाली है, बल्कि हमारे समाज की सामूहिक चेतना पर भी एक सवाल खड़ा करती है।
क्या किसी की धार्मिक पहचान इतनी बड़ी “वजह” बन सकती है कि उसकी जान ले ली जाए? यह कृत्य न केवल एक व्यक्ति विशेष पर हमला है, बल्कि यह पूरे देश की विविधता, सहिष्णुता और मानवता के मूल्यों पर भी प्रहार है।
जिस धरती ने कश्मीरी सूफी परंपरा, रहमान और रहीम की बातें सिखाई, वहाँ अब निहत्थे, निर्दोष पर्यटकों की जान सिर्फ उनके धर्म की वजह से ले ली जाती है — यह किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्म की बात है। पहलगाम में हुआ हमला कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत पर हुआ हमला है। यह हाल के वर्षों में हुआ सबसे बड़ा हमला है। इस हमले के आतंकी बख्शे नहीं जाने चाहिए। ये आतंकी कश्मीरियत के दुश्मन हैं, जम्हूरियत के दुश्मन हैं और इंसानियत के दुश्मन हैं।

यह समझना जरूरी है कि इस तरह की हिंसात्मक घटनाओं का मज़हब से कोई वास्ता नहीं होता। यह आतंक है — और आतंक हमेशा कायरता से जन्म लेता है। जो लोग निहत्थे लोगों पर हमला करते हैं, वो इंसानियत के दुश्मन हैं, और इनका कोई धर्म नहीं होता।

सरकार की यह नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह ऐसे अपराधियों को नेस्तनाबूत करे। सिर्फ निंदा या बयानबाज़ी से काम नहीं चलेगा। कश्मीर को फिर से शांति, विकास और इंसानियत की राह पर लाना है तो हर नागरिक, हर धर्म, और हर विचारधारा को सुरक्षा की गारंटी देनी होगी।

साथ ही, मीडिया और समाज को भी इस मुद्दे पर संवेदनशीलता के साथ काम करना चाहिए — ताकि नफरत की आग में घी न डाला जाए, बल्कि समझदारी और मानवता का रास्ता दिखाया जाए।

यह समय नफ़रत का नहीं, एकजुटता का है। हमें धर्म, जाति, भाषा के नाम पर बाँटने वालों से सावधान रहना होगा। कश्मीर में मारे गए निर्दोष पर्यटकों की आत्मा की शांति के लिए हम प्रार्थना करते हैं और साथ ही यह संकल्प भी लेते हैं कि हम ऐसे हर विचारधारा का विरोध करेंगे जो इंसान को इंसान नहीं समझती।

ZEA
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