“जोखिम ज़्यादा है, सेवानिवृत्ति के बाद नौकरी पाने की चाहत,
मुख्य न्यायाधीश श्री संजीव खन्ना ने सच्चे अर्थों में न्याय किया है और इसके लिए वे प्रशंसा के हकदार हैं।
हमारा संविधान देश की सबसे बड़ी और सबसे ताकतवर किताब है। इसमें तीन मुख्य स्तंभ बताए गए हैं – विधायिका (संसद/विधानसभा), कार्यपालिका (सरकार), और न्यायपालिका (अदालतें)। ये तीनों एक-दूसरे से स्वतंत्र होते हैं।
“जोखिम ज़्यादा है,
सेवानिवृत्ति के बाद नौकरी पाने की चाहत,

सेवानिवृत्ति से पहले के फैसलों को प्रभावित करती है।”
स्वर्गीय श्री अरुण जेटली
यह लेख वरिष्ठ अधिवक्ता – “सिकंदर हयात खान” पटियाला हाउस नई दिल्ली के अपने विचार है।

स्व. अरुण जेटली का यह बयान अगर हाल ही में माननीय मुख्य न्यायाधीश द्वारा वक्फ एक्ट पर दिए गए अंतरिम फैसले के संदर्भ में देखा जाए, तो यह उस पर लागू नहीं होता। बल्कि यह बयान उस समय के उन न्यायाधीशों पर ज्यादा सटीक बैठता है जिन्होंने राम मंदिर से जुड़ा फैसला सुनाया था और बाद में सरकार से क्या-क्या लाभ पाए, यह सभी को पता है।
इसके उलट, हाल ही में माननीय मुख्य न्यायाधीश श्री संजीव खन्ना ने जो फैसला दिया है, वह सरकार के पक्ष में नहीं है। क्योंकि वह 13 मई 2025 को रिटायर हो रहे हैं, यह साफ है कि उन्हें सरकार से रिटायरमेंट के बाद किसी तरह का फायदा मिलने की उम्मीद नहीं है। इसलिए श्री जेटली का यह बयान इस मौके पर ठीक नहीं बैठता।
मुख्य न्यायाधीश श्री संजीव खन्ना ने सच्चे अर्थों में न्याय किया है और इसके लिए वे प्रशंसा के हकदार हैं।
जहां तक संसद द्वारा बनाए गए कानूनों की बात है, उन्हें सुप्रीम कोर्ट संविधान के हिसाब से ही जांचता और परखता है। यह प्रक्रिया मनमाने तरीके से नहीं होती।
हमारा संविधान देश की सबसे बड़ी और सबसे ताकतवर किताब है। इसमें तीन मुख्य स्तंभ बताए गए हैं – विधायिका (संसद/विधानसभा), कार्यपालिका (सरकार), और न्यायपालिका (अदालतें)। ये तीनों एक-दूसरे से स्वतंत्र होते हैं।
विधायिका खुद अपना अध्यक्ष चुनती है। कार्यपालिका, यानी सरकार, बहुमत वाली पार्टी के नेता को प्रधानमंत्री चुनती है। तो फिर जब संसद और सरकार अपने नेता खुद चुन सकते हैं, तो न्यायपालिका यानी कोर्ट क्यों नहीं अपने जज खुद चुन सकती?
सुप्रीम कोर्ट संविधान का रक्षक है। जब भी सरकार कोई ऐसा फैसला लेती है जो आम लोगों के हक के खिलाफ होता है, तो सुप्रीम कोर्ट उसमें दखल देकर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है।
आजकल हर वह फैसला जो सत्ता में बैठे लोगों के हक में होता है, उसे ‘सही’ बताया जाता है। लेकिन लोकतंत्र में सिर्फ सरकार नहीं, न्यायपालिका ही वह संस्था है जो आम जनता के हक की लड़ाई लड़ती है।
इसलिए, आज के समय में हमें न्यायपालिका को सलाम करना चाहिए। श्री जेटली का बयान आज की परिस्थिति में सही नहीं बैठता।

