बेंगलुरु में बड़े पैमाने पर किसानों की जमीन का अधिग्रहण – किसानों ने किया सतत संघर्ष का ऐलान
मेरा सवाल यह है कि क्या विकास केवल और केवल किसान, किसानी और गांव को समाप्त कर ही किया जा सकता है ?
यदि जवाब हां है, तो इसे विनाशकारी विकास कहा जाएगा। जिसका किसान संगठन विरोध करते थे, करते हैं और करते रहेंगे। सरकार सुनिश्चित करे कि क्या सरकार इसे अंतिम विकल्प के तौर पर ही मानकर यह परियोजना पर आगे बढ़ रही है?
*बटोगे तो हारोगे*
*जुड़ोगे तो जीतोगे*
डॉ सुनीलम
राष्ट्रीय अध्यक्ष
(किसान संघर्ष समिति)


मैं पिछली बार बेंगलुरु में दक्षिण भारत के पांच राज्यों के संयुक्त किसान मोर्चे के सम्मेलन में गांधी भवन में आया था, तब कर्नाटक के किसानों ने बताया था कि बड़े पैमाने पर किसानों की जमीन का अधिग्रहण अलग-अलग परियोजनाओं के लिए किया जा रहा है। एसकेएम ने कृषि भूमि के अधिग्रहण के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया था और सतत संघर्ष का ऐलान किया था।
आज तक जहां कहीं भी अधिग्रहण किया गया है, वह विकास के नाम पर किया गया है। मेरा सवाल यह है कि क्या विकास केवल और केवल किसान, किसानी और गांव को समाप्त कर ही किया जा सकता है ? यदि जवाब हां है, तो इसे विनाशकारी विकास कहा जाएगा। जिसका किसान संगठन विरोध करते थे, करते हैं और करते रहेंगे।
विकास की कीमत कौन चुकाएगा? यह भी सबसे बड़ा सवाल है। दुनिया में अमरीका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक आदिवासियों को विकास के नाम पर खत्म कर दिया गया? यही प्रक्रिया किसानों के साथ भी चल रही है। क्या सरकारें यह भी नहीं जानती कि जब किसान की जमीन अधिग्रहित की जाती है तो इसका मतलब होता है कि किसान परिवार के स्थाई जीविकोपार्जन के साधन को यानि जीवनयापन के श्रोत को छीन लेना ,किसान परिवारों का रोजगार समाप्त कर देना।
मेरा सवाल यह है कि सरकार जब बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध कराने की स्थिति में नहीं है तब उसे रोजगार से लगे किसानों को उजाड़ने का क्या अधिकार है? इसलिए जब 2013 में अंग्रेजों के जमाने के 1894 के भू अधिग्रहण कानून को बदलकर कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने नया कानून लाया था, तब यह कहा गया था कि किसानों की बहु फसलीय जमीन का अधिग्रहण अंतिम विकल्प के तौर पर किया जाएगा।
मैं सरकार से जानना चाहता हूं कि क्या सरकार इसे अंतिम विकल्प के तौर पर ही मानकर यह परियोजना पर आगे बढ़ रही है? आज देश के किसानों के सामने और देश के सामने खेती को बचाने का सबसे बड़ा संकट है। खेती बचेगी, तो देश बचेगा, खेती खत्म होगी तो देश की खाद्य सुरक्षा पर संकट आ जाएगी। इसलिए नए कानून में कहा गया की अंतिम विकल्प के तौर पर सरकार यदि किसानों की जमीन अधिग्रहित करती हैं तो सरकार को अन्य जमीनों को कृषि योग्य बनाकर किसानों को देना होगा।
मैं सरकार से यह भी जानना चाहता हूं कि उनकी ही पार्टी और सरकार द्वारा 2013 में बनाए गए और संसद में पारित किए गए कानून को मानती है या नहीं? इस कानून को
अस्वीकार करने वाले बंगलुरू के विकास के लिए जो
कानून बनाया गया है उसको लेकर उनका क्या विचार है?
कांग्रेस पार्टी कर्नाटक में जब विपक्ष में भी थी तब सदन के बाहर और सदन के अंदर भूमि अधिग्रहण का विरोध करती थी, भूमि अधिग्रहण के तौर तरीकों पर सवाल खड़े करती थी, किसानों के पक्ष में खड़ी होती थी। लेकिन आज यह स्थिति क्यों और कैसे बदल गई ? क्या सरकार पर भू माफिया हावी हो रहा है? क्या बिल्डर लॉबी सरकार पर ग्रेटर बेंगलुरु बनाने के लिए दबाव डाल रही है ?
मैं सरकार के लोगों को याद दिलाना चाहता हूं कि कर्नाटक की सरकार किसानों ने बनाई है। भाजपा को किसान विरोधी नीतियां लागू करने के कारण सत्ता से हटाया है। वह किसान ही है जिसके चलते मोदी 400 पार की बात करते हुए 240 पर सिमट गए । हरियाणा में हाल ही के चुनाव में भी किसानों ने भाजपा को हराने के लिए वोट दिया लेकिन भाजपा ईवीएम की तिकड़म से, सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग से, अडानी अंबानी के पैसे के दम पर केवल 0. 6% वोट से जीत पायी। महाराष्ट्र और झारखंड में भी किसान भाजपा को हराएंगे। हम किसान संगठन भाजपा को हराने के लिए ‘भाजपा को बेनकाब करो, विरोध करो, दंडित करो’ अभियान चला रहे हैं।
मैं तो एक और खुला प्रस्ताव सरकार को देना चाहता हूं। वह महाराष्ट्र रायगढ़ की तरह किसानों के बीच रायशुमारी करा लें। महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में किसानों ने SEZ का विरोध किया, तब सरकार ने वहां रायशुमारी कराई, वोटिंग कराई। 90% किसानों ने खिलाफ में वोट किया। फिर वह योजना रद्द हो गई। वह योजना एशिया की सबसे बड़ी अंबानी की योजना थी।
मैं सरकार से अनुरोध करूंगा कि वह चुनाव कराए ताकि उसे किसानों की राय मालूम हो सकें, लेकिन चुनाव में यदि किसान अधिग्रहण के पक्ष में वोट देते हैं तो अधिग्रहण का क्या तरीका होगा इस पर सरकार किसानों से बात करें। अपने ही बनाए हुए 2013 के कानून को कितने प्रभावशाली तरीके से लागू कर किसानों को अधिक से अधिक लाभ दिया जा सकता है, यह सुनिश्चित करें। एक मॉडल देश के सामने प्रस्तुत करे।
यह एक अवसर है जिसका उपयोग सिद्धारमैया जी के नेतृत्व में चल रही सरकार अवश्य करेगी यह मेरा विश्वास है।
मैं किसानों से कहूंगा कि वह मेरे साथ नारा लगाए *”कोई नहीं हटेगा, प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ेगा “, “जान देंगे पर, जमीन नहीं देंगे।*
किसानों से मैं यह भी अपील करना चाहूंगा कि वह ग्राम सभा और मोहल्ला सभा में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर सरकार को भेजें। अधिक से अधिक चिट्ठियां डाक से और ईमेल से मुख्यमंत्री महोदय को भेजें।
मेरा यह भी सुझाव होगा कि किसानों को जल्द से जल्द भूमि अधिग्रहण के खिलाफ अनिश्चितकालीन सत्याग्रह की शुरुआत करनी चाहिए, वह भी इस संकल्प के साथ जब प्रोजेक्ट रद्द किया जाएगा तब ही पीछे हटेंगे।
यदि कुछ लोग ऐसे हैं जो चाहते हैं कि उन्हें जमीन का ज्यादा से ज्यादा मुआवजा मिलें उन्हें मैं बताना चाहता हूं कि मेधा पाटकर जी के नेतृत्व में नर्मदा घाटी में जब किसानों ने भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन शुरू किया था, तब जमीनें 50 हजार रुपए एकड़ से अधिग्रहित की जाती थी लेकिन आंदोलन के चलते सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर घाटी के तमाम किसानों को 60 लाख रुपए तक देने पड़े थे। छिंदवाड़ा में पेंच व्यपवर्तन परियोजना के लिए की जा रही भूमि अधिग्रहण का 50 हजार रूपए मुआवजा दिया जा रहा था, हमने जब इसके खिलाफ आंदोलन शुरू किया तब 10 लाख रुपए देने को मजबूर होना पड़ा।
मैं सरकार से मांग करता हूं कि वह अब तक कर्नाटक में किसानों की जमीनों के अधिग्रहण प्रभावित किसानों के पुनर्वास को लेकर श्वेत पत्र जारी करे।
यहां उपस्थित किसानों से अपील करूंगा कि वे बंगलुरू के जिन किसानों का संपूर्ण पुनर्वास नहीं हुआ है ,उनके संघर्ष में शामिल हों और उन्हें अपने संघर्ष के साथ जोड़ें।
आजकल एक जुमला चल रहा है ‘बटोगे तो काटोगे, । मैं किसानों से कहना चाहता हूं कि यदि
*बटोगे तो हारोगे*
*जुड़ोगे तो जीतोगे*
किसान एकता जिंदाबाद !
अपना हक लेकर रहेंगे !!

