स्वार्थी मुसलमानों की महफील ईद मिलान में बिहार के मुख्यमंत्री सुसाशन बाबू नीतीश कुमार
ईद की दावत नहीं, हमें चाहिए हमारा हक़ — वक़्फ़ क़ानून पर मुसलमानों की चुप्पी अब टूट रही है।
अब नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का चेहरा रखना भाजपा के लिए सम्भवता मुश्किल हो, परन्तु बिहार में भाजपा के पास मुख्यमंत्री का कोई चेहरा भी नही है।
ईद की दावत नहीं, हमें चाहिए हमारा हक़ — वक़्फ़ क़ानून पर मुसलमानों की चुप्पी अब टूट रही है।

सैय्यद आसिफ इमाम काकवी / एमपीएनएन
बिहार में सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था, थोड़ा बहुत तो राजनीतिक उथल पुथल तो रहती है, लेकिन मनुवादी केंद्र की सरकार जब से सता में आई है तब से देश मे कोई भी व्यक्ति सकून से नहीं है, हर व्यक्ति असमंजस और भय में जी रहा है, एन.अर.सी, और सीएए, के बाद अब केंद्र ने एक नया शगूफा छोड़ा , वक़्फ़ बोर्ड संशोधन बिल बना कर, एक बार फिर समाज मे हलचल पैदा कर दिया है, परन्तु इस बार भारतीय हिन्दू के अलावा शिक्षित और समझदार स्वर्ण भी मुसलमानो के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं, लेकिन जिन्हें केंद्र का साथ नहीं देना चाहिए था उन्होंने ने पिछली बार एनआरसी और सी ए ए, की तरह इस बार भी वक़्फ़ बोर्ड संशोधन बिल को पास करने में केंद्र सरकार का साथ दे कर नीतीश बाबू ने बिहार के मुसलमानों के उम्मीदों पर पानी फेर दिया, वहीं दूसरी ओर चंद्र बाबू नायडू ने भी अपने आपको और अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिये केंद्र रकार की शर्तों को मानते हुए न चाहते हुए भी केंद्र सरकार का समर्थन करना पड़ा, तो नीतीश बाबू को भी अपनी जद्दी और अपने जीवन को सुखी रखने के लिये न चाहते हुए भी केंद्र सरकार का समर्थन करना पड़ा, इनके समर्थन करते ही बिहार की राजनीति ने अचानक करवट ले लिया, और अफरा तफरी मच गई, अब नीतीश बाबू के आगे खाई ,पीछे कुआं स्पष्ट दिखाई दे रहा है, नीतीश बाबू को अब न घर ही मिला न विसाल ए सनम, न इधर के रहे न उधर के, नीतीश कुमार के पास जो 5 या 6 मुसमान दिखाई दे रहे है इनका अस्तित्व इनके अपने घर मे भी नही है, यह लोग तो स्वार्थी और दलाल है, जो “पक्की पूरी पर लक्ष्मण नारायण” बने रहते हैं, मुसलमानों में खालिद अनवर एक ऐसा नाम जिसने तमाम उर्दू मीडिया को बेचने के साथ साथ मुस्लिम समुदायें के एक मात्र सौहार्द सांस्कृतिक संगठन कहे जाने वाला संस्थान इमारत ए शरियाः के प्रमुख्य जानाब रहमानी साहब को धोखा में रख कर उन्हें सी ए ए कानून के माध्यम से संविधान को बचाने के नाम पर उन्हें उनके रुतबे का पूर्णरूप से इस्तेमाल कर मुसलमानो को गांधी मैदान में संगठित कर अपने शक्ति का प्रदर्शन कर नीतीश बाबू को दिखाया और एमएलसी हासिल किया, जबकि वह समाज मे एक कुत्ते के बराबर भी अपनी हैसियत नहीं रखता है। बल्कि आज नीतीश कुमार उसकी ईद मिलन की दावत में जा कर अपनी और भी मट्टी पलीत कर दी। नीतीश कुमार अब न घर के न घाट के हैं —– बेटे ने अपने बाप के लिये पहली बार मीडिया के सामनें सत्तारूढ़ भाजपा की केंद्र सरकार से अपनी मांग रखने की हिम्मत तो दिखाई है, परन्तु भाजपा इनको कितना तरजीह देती है यह तो समय बताएगा।
बहरहाल, ईद-उल-फित्र की खुशियाँ आमतौर पर मेल-जोल और एकजुटता का प्रतीक होती हैं। लेकिन इस बार पटना की एक ईद मिलन पार्टी ने लोगों के बीच उत्सव की जगह सवाल खड़े कर दिए हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जदयू सांसद संजय झा, कई मंत्री और वक्फ़ बोर्ड से जुड़े नेता JDU MLC डॉ. खालिद अनवर की ईद मिलन पार्टी में शामिल हुए। वहीं दूसरी ओर, आम मुसलमानों ने इस पार्टी से खुद को दूर रखकर एक स्पष्ट संदेश दिया — अब दिखावे की सियासत नहीं चलेगी, हमें हमारा हक़ चाहिए।
जब जनता मायूस है, तो नेताओं का जश्न किसलिए?
यह कैसी ईद है जहां बिहार के मुसलमानों के चेहरों पर उदासी है? यह कैसी सियासत है जहां एक तरफ वक़्फ़ की ज़मीनों पर बिल के ज़रिए कब्ज़ा करने की तैयारी हो रही है, और दूसरी ओर उसी बिल का समर्थन करने वाले नेता ईद की पार्टी में शिरकत कर रहे हैं?
डॉ. खालिद अनवर के घर हुई यह पार्टी दरअसल उस राजनीतिक दिखावे की तस्वीर थी, जहां कुछ चेहरे अपनी वफादारी सत्ता के सामने निभाते नज़र आए, मगर अपनी कौम से ग़ायब रहे। ज़मां ख़ान, शिया-सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के चेयरमैन, शिबली क़ासमी जैसे वो लोग भी मौजूद रहे जिनपर वक़्फ़ और इमारत शरिया में विद्रोह और सत्ता की सहमति से हस्तक्षेप के आरोप लगते रहे हैं।
#WaqfAmendmentBill के ज़रिए मुसलमानों की जड़ों पर हमला
वक़्फ़ बोर्ड की संपत्तियाँ सदियों से मुस्लिम समाज की तरक्क़ी, मस्जिदों, मदरसों, अनाथालयों और मज़लूमों की मदद के लिए इस्तेमाल होती रही हैं। लेकिन हाल में लाए गए वक़्फ़ संशोधन विधेयक ने इस व्यवस्था को पूरी तरह से खतरे में डाल दिया है। इस बिल के ज़रिए सरकार को वक़्फ़ संपत्तियों पर क़ब्ज़ा करने का कानूनी रास्ता मिल जाएगा — और JDU, HAM, और LJP जैसे दलों ने इस बिल का समर्थन करके मुसलमानों को और ज़्यादा हाशिए पर धकेल दिया है।
ईद का बहिष्कार विरोध नहीं, इंक़लाब की शुरुआत है
नीतीश कुमार की मौजूदगी में जिस तरह से खालिद अनवर की पार्टी आयोजित हुई, और आम जनता ने उस समारोह से खुद को अलग रखा — यह सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि चेतावनी है। मुसलमान अब सियासी दावतों से नहीं, न्याय, बराबरी और हक़ की ज़मीन से जुड़ना चाहते हैं।
हमें चाहिए:
वक़्फ़ संपत्तियों की सुरक्षा की संवैधानिक गारंटी
मुस्लिम नेतृत्व का जवाबदेह और ज़मीन से जुड़ा होना
दिखावे की राजनीति नहीं, असली नुमाइंदगी
मज़हबी संपत्तियों और संस्थाओं की स्वतंत्रता और सम्मान
बच्चों के लिए शिक्षा, रोज़गार और बराबरी का अवसर
अब मुसलमानों की चुप्पी ख़त्म हो रही है।
अगर हमारे नेता हमारी आवाज़ नहीं बन सकते, तो हमें नए रास्ते चुनने होंगे।
ईद मिलन पार्टियाँ एक दिखावा बन चुकी हैं।

अब नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का चेहरा रखना भाजपा के लिए सम्भवता मुश्किल हो, परन्तु बिहार में भाजपा के पास मुख्यमंत्री का कोई चेहरा भी नही है। तो मुमकिन है भाजपा सशर्त नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का चेहरा पेश कर दे और सीट जितना जदयू को चाहिय उतना न दे कर अपनी सीट बढ़ा ले जाएं और बाद में पार्टी के आंतरिक वोटिंग करा कर नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री से खारिज कर दिया जाए, सम्भवता ऐसा हो सकता है।

