तुमसा नही देखा …. हिन्द की आर्थिक दिशा और दशा दोनों ही बदला था पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने
अफसोस यह न रहेगा कि मुक़ाम पा कर भी कुछ नहीं कर पाए, खामोश रह कर भी हिन्द को आर्थिक व्यावस्था में मज़बूत बनाया आपने।
शांत थे, चेहरे पर हमेशा फीकी मुस्कान लिये सभी का मन-मोह लेते थे। मनमोहन थे, इसी लिये दुनियाँ का मन मोह लिया था आपने।।
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का 92 साल की उम्र में निधन, 7 दिन के राष्ट्रीय शोक का ऐलान।
हिन्द को गर्व रहेगा आप पर – हिन्द की आर्थिक दिशा और दशा दोनों ही बदला था डॉ. मनमोहन सिंह ने।

राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने 19 मई, 2004 (बुधवार) को नई दिल्ली में अगली सरकार बनाने के लिए प्रधान मंत्री को नामित करते हुए डॉ. मनमोहन सिंह को अधिकृत किया साथ मे अध्यक्ष कांग्रेस संसदीय दल श्रीमती तस्वीर में सोनिया गांधी भी नजर आ रही हैं।

श्रद्धांजली अर्पित करते हुए कुछ पंक्तियां उन्हों श्रद्धासुमन भेंट।
कांटों भरे पगडंडियों पर चल कर वह मुक़ाम पाया आपने।
मुक़ाम पा कर, रास्ते बनाये हिन्द को आर्थिक संकट से उभारा – और सँवारा आपने।।
अफसोस यह न रहेगा कि मुक़ाम पा कर भी कुछ नहीं कर पाए, खामोश रह कर भी हिन्द को आर्थिक व्यावस्था में मज़बूत बनाया आपने।
शांत थे, चेहरे पर हमेशा फीकी मुस्कान लिये सभी का मन-मोह लेते थे। मनमोहन थे, इसी लिये दुनियाँ का मन मोह लिया था आपने।।
एस. ज़ेड. मलिक
स्वर्गीय डॉ. मनमोहन सिंह अर्थशास्त्रीय प्रगतिशील गठबंधन सरकार में लगातार दो बार प्रधानमंत्री रहे। कांग्रेस और उसके संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने 2004 और 2009 के आम चुनावों में जीत हासिल की थी, तब 2004 से 2014 के बीच प्रधानमंत्री रहे।
भारतीय ‘अर्थव्यवस्था के गुरु’ कहे जाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जीवन, बचपन से संघर्षशील रहा है, कहा जाता है कि बचपन उन्होंने बड़ी बड़ी चुनौतियों का सामना किया, और कामयाब रहे, पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय मनमोहन सिंह के बारे में गूगल पर प्रकाशित एक लेख के अनुसार – उनकी जिंदगी में एक अजब संयोग रहा, जो जन्म से लेकर मृत्यु तक उनके साथ रहा, यह संयोग था 26 का अंक, मनमोहन सिंह का जन्म भी 26 को ही हुआ था और उनका निधन भी इसी तारीख को हुआ।
मनमोहन सिंह का जन्म 26 सितंबर 1932 को अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के गाह गांव में हुआ था। यह हिस्सा अब पाकिस्तान में है। देश का बंटवारा हुआ तो मनमोहन सिंह का परिवार अमृतसर आकर बस गया। यहीं से उनका असली करियर शुरू हुआ। मनमोहन सिंह पाकिस्तान के जिस गाह में जन्मे, वहां उनके नाम पर एक स्कूल भी है। इसे ‘मनमोहन सिंह गवर्नमेंट बॉयज स्कूल’ के नाम से जाना जाता है। इसी स्कूल में डॉ. मनमोहन सिंह ने अपनी शुरुआती पढ़ाई की थी। कभी अंधेरे में जीने वाला यह गांव आज आदर्श गांव बन चुका है, यहां के लोग मनमोहन सिंह को धन्यवाद देते नहीं थकते।
विभाजन के बाद जब परिवार भारत पहुंचा तो अन्य परिवारों के साथ मनमोहन सिंह के परिवार को भी पैसों की तंगी से जूझना पड़ा था। गाह गांव से अमृतसर पहुंचे मनमोहन सिंह की असली कहानी यहां से शुरू हुई। पंजाब यूनविर्सिटी से पढ़ाई करने के बाद वे कैंब्रिज गए। दुनिया की सबसे मशहूर यूनविर्सिटी ऑक्सफोड से डीफिल किया। मनमोहन सिंह की बेटी दमन सिंह ने अपनी किताब में तब की हालत के बारे में लिखा है। बताया है कि उन्हें किस तरह पैसों की कमी से जूझना पड़ा। फिर भी उन्होंने ईमानदारी का दामन नहीं छोड़ा। शायद यही उनके काम आया कि वे भारत के गर्वनर, वित्तमंत्री और फिर प्रधानमंत्री के रूप में देश की इकोनॉमी को नई दिशा दे पाए।
मनमोहन सिंह के नाम अनेक उपलब्धिया हैं। वे गर्वनर बने, वित्तमंत्री बने और प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे। इनता ही नहीं, जवाहरलाल नेहरू के बाद वे पहले भारतीय थे, जो लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बने। अपने फैसलों को लेकर वे काफी अडिग रहे। अमेरिका से न्यूक्लियर डील को उन्होंने देश के लिए जरूरी समझा तो अपनी सरकार दांव पर लगा दी। वे आम सहमति के पक्षधर थे। लेकिन उनकी सबसे खास बात उनकी सादगी में थी। जिसे दुनियाँ तमाम लीडर सराहते थे। वह हिन्द के बारे सोंचते सोंचते 26 दिसंबर 2024 को सदा के लिए सो गया।
राजनीतिक करियर की शुरुआत
जब डॉ. मनमोहन सिंह नवंबर 1990 में जिनेवा से भारत लौटे और चंद्र शेखर के कार्यकाल के दौरान आर्थिक मामलों पर भारत के प्रधान मंत्री के सलाहकार के रूप में पद संभाला। मार्च 1991 में, वह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष बनाये गये।
जून 1991 में, उस समय भारत के प्रधान मंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव ने सिंह को अपने वित्त मंत्री के रूप में चुना। सिंह ने 2005 में एक ब्रिटिश पत्रकार मार्क टुली से कहा।
जिस दिन (राव) अपने मंत्रिमंडल का गठन कर रहे थे, उन्होंने अपने प्रधान सचिव को मेरे पास यह कहते हुए भेजा, प्रधान सचिव मेरे पास आये और कहने लगे “प्रधानमंत्री चाहते हैं कि आप वित्त मंत्री बनें” मैंने इसे गंभीरता से नहीं लिया, और हंसते हुये ताल दिया, लेकिन फिर अगली सुबह वह मेरे पास आये, और थोड़े डांट कर बोले, तैयार होकर शपथ ग्रहण के लिए राष्ट्रपति भवन आओ पीएम इंतेज़ार कर रहे हैं। तो इस तरह मेरी राजनीति में शुरुआत हुई।
वित्त मंत्री
1991 में, भारत का राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 8.5 प्रतिशत के करीब था, भुगतान संतुलन घाटा बहुत बड़ा था और चालू खाता घाटा भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 3.5 प्रतिशत के करीब था। भारत का विदेशी भंडार मुश्किल से 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो 2 सप्ताह के आयात के भुगतान के लिए पर्याप्त था,
सिंह ने पीएम और पार्टी को समझाया कि भारत एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहा है। हालाँकि, पार्टी के कार्यकर्ताओं और कार्यकर्ताओं ने नियंत्रण-मुक्त करने का विरोध किया। इसलिए पी. चिदम्बरम और सिंह ने पार्टी को समझाया कि यदि इसे नियंत्रण-मुक्त नहीं किया गया तो अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। पार्टी को निराशा हुई, राव ने सिंह को भारतीय अर्थव्यवस्था को नियंत्रण-मुक्त करने की अनुमति दे दी।

संजीव कुमार
शोधार्थी
अर्थशास्त्र विभाग
मगध विश्वविद्यालय बोधगया बिहार
मैं इस महान अर्थशास्त्री को एक पंक्ति के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं कि ” जमाना कर न सका उनके कद का अंदाजा, वो आसमान था मगर सर झुका कर चलता था “।
डॉ मनमोहन सिंह जी के निधन से भारत मां ने अपना एक और सपूत को खो दिया। वो राजनीति में सादा जीवन, उच्च विचार की प्रतिमूर्ति थे। डॉ साहब अगर आर्थिक सुधार न किए होते तो शायद हमारे देश की अर्थव्यवस्था को कभी गति नहीं मिल पाती । डॉ मनमोहन सिंह के निधन से जो क्षति हुई है उसकी भरपाई होना मुश्किल है।

