कालीकट विश्वविद्यालय (केरल) के सहयोग से गालिब इंस्टीट्यूट द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार संपन्न
बदल कर फ़क़ीरों की हम भेस गालिब , तामाशा ए अहले करम देखते हैं।।
गालिब की रूह भी सोचती होगी, लोग अपने माँ, बाप, को उनके मरने बाद याद नहीं रखते, जितना कि दुनियाँ के लोग, मेरे मरने के सैंकड़ो वर्ष बाद भी मेरे मिट्टी तक को अब तक कुरेद कुरेद कर मेरी ज़िंदगी के कार्यकाल के क्रियाकलापों को लिख रहे हैं।



