फलीस्तीन के मामले में भारत सरकार का दोहरा रवैया!
फिलिस्तीन मामले में भारत सरकार को अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिये, भारत सरकार फिलिस्तीन के साथ है या इज़राइल के साथा? IPSP
फ़िलिस्तीन के साथ एकजुट भारतीय जन (IPSP) ने फ़िलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की बर्बरता और उनके ख़िलाफ़ हो रही हिंसा पर प्रेस वार्ता का आयोजन किया।
फिलिस्तीनियों के साथ हो रही बर्बरता और मासूमों का नरसंहार पर भारत सरकार अपनी नीति स्पष्ट करे – आईपीएसपी (IPSP)

फ़िलिस्तीन के साथ एकजुट भारतीय जन (IPSP) ने फ़िलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की बर्बरता और उनके ख़िलाफ़ हो रही हिंसा पर प्रेस वार्ता का आयोजन किया।


मोदी सरकार, फ़िलिस्तीन के सम्बन्ध में भारत की लम्बे समय से चली आ रही कूटनीतिक स्थिति को जारी रखते हुए, आधिकारिक तौर पर फ़िलिस्तीन को एक सम्प्रभु देश के रूप में मान्यता देती है, लेकिन दूसरी तरफ़ वास्तव में, इसने ज़ायनवादी इज़रायल को सभी राजनीतिक, कूटनीतिक और आर्थिक सहायता प्रदान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। फ़ासीवादी मोदी सरकार ग़ज़ा में युद्ध विराम की माॅंग करने वाले महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर मतदान से संयुक्त राष्ट्र में बार-बार दूर रही है। यह मोदी सरकार का पाखण्ड और दोमुँहापन है।”
एआइसी संवाददाता
नई दिल्ली – मुख पर राम राम बगल में छुरी – भारत सरकार की कैसी है दोहरी नीती? यह भारत की सरकारी विडंबना कहें या दुर्भगय? 2014 के बाद से अब तक सरकार के नीतियों के विरुद्ध प्रदर्शन हो या फिलिस्तीन के स्पोर्ट में भारतीय सेकुलरवादी का प्रदर्शन उसमें अक्सरहां दिल्ली पुलिस और पारा मिलिट्री फोर्स के साथ कुछ सिविलियन व्यक्ति प्रदर्शनकारियों को पीट रही हैं और उनके साथ दुर्व्यावहार करते हुए देखा गया है, जैसा कि पिछले दिनों 23 जून को इज़रायल दूतावास के बाहर प्रदर्शन कर रहे छात्रों और IPSP के कार्यकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस ने बर्बर हमला किया और उन्हें ग़ैर-क़ानूनी रूप से हिरासत में लिया था। उसमें भी कुछ सिविल ड्रेस में पुलिस के साथ मिल कर प्रदर्शनकारियों पीटा और कैमरा छीना, आखिर ऐसे लोग कौन हैं? और पुलिस के साथ कैसे मिल कर वारदात को अंजाम देते हैं? किसी भी वैधानिक संस्थाओं ने उस पर संज्ञान क्यूँ नहीं लिया? वैसे लोगों को न्यायालय में हाज़िर क्यूँ नही किया जाता? यह सवाल उठना तो वाजिब है।
इसी मुद्दे को ले कर नई दिल्ली स्थित रायसीना रोड प्रेस क्लब में प्रेस वार्ता को सम्बोधित करते हुए, IPSP के कार्यकर्ताओं ने प्रेसवार्ता कर कुछ अहम सवाल उठाये, क्या भारत में फ़िलिस्तीनियों के नरसंहार और फ़िलिस्तीनी जनता के मुक्ति संघर्ष के बारे में बोलना अपराध है? फ़िलिस्तीन के साथ एकजुट भारतीय जन ने शुक्रवार को उपरोक्त प्रश्न पर एक प्रेस वार्ता आयोजित की, जिसमें फ़िलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनकारियों का फ़ासीवादी राज्य द्वारा किये गये दमन का विरोध किया गया। साथ ही भारत सरकार के दोहरे चरित्र और ज़ायनवादी इज़रायल के साथ उसके नाजायज़ गठबन्धन को उजागर किया गया।
ग़ौरतलब है कि 23 जून को इज़रायल दूतावास के बाहर प्रदर्शन कर रहे छात्रों और IPSP के कार्यकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस ने बर्बर हमला किया और उन्हें ग़ैर-क़ानूनी रूप से हिरासत में लिया था। प्रेस वार्ता को सम्बोधित करते हुए IPSP की कार्यकर्ता प्रियम्वदा शर्मा ने दिल्ली पुलिस द्वारा की गयी हिंसक हिरासत का वर्णन करते हुए बताया कि “जैसे ही फ़िलिस्तीन के मुक्ति संघर्ष के समर्थन में और ग़ज़ा में फ़िलिस्तीनियों के नरसंहार के ख़िलाफ़ प्रदर्शनकारी इज़रायल दूतावास के बाहर शान्तिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के लिए एकत्र हुए, पुरुष पुलिसकर्मियों ने महिला प्रदर्शनकारियों सहित अन्य प्रदर्शनकारियों पर हमला करना और उन्हें परेशान करना शुरू कर दिया, महिलाओं के कपड़े फाड़े गये, उन्हें थप्पड़ और लात-घूसे मारे, सड़क पर घसीटा, पुलिस वाहनों में ठूॅंसकर तुग़लक़ रोड और मन्दिर मार्ग पुलिस स्टेशनों में ले गये। यहाॅं तक कि फ्रीलांस फ़ोटोग्राफ़रों और कलाकारों को भी पुलिस ने नहीं बख्शा।” प्रियम्वदा ने आगे कहा, “महिला प्रदर्शनकारियों को अपमानजनक लैंगिक दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा, तुग़लक़ रोड पुलिस स्टेशन के एसआई उमेश मलिक ने तो यहाॅं तक कह दिया कि इनके तो बस कपड़े उतारना बाक़ी है।’ दलित पृष्ठभूमि के दो प्रदर्शनकारियों – हिमांशु गौतम और प्रसेनजीत गौतम – को ‘नीच’, ‘चमार’ और ‘गन्दी नाली के कीड़े’ जैसे स्पष्ट रूप से जातिवादी गालियों के साथ मौखिक रूप से अपमानित किया गया।”
डीयू के एक छात्र रऊफ़ जो देख नहीं सकते उनपर पुलिस ने हिंसक हमला किया और उन्हें हिरासत में लिया। रऊफ़ ने बताया कि “पुलिस ने मुझे जबरन धक्का दिया और घसीटा और इस दौरान मेरी छड़ी छूट गयी। जब अन्य प्रदर्शनकारियों ने मुझे इस बर्बर हमले से बचाने और पुलिस द्वारा मेरे ऊपर की जाने वाली बर्बरता का विरोध किया, तो पुलिस ने उन्हें स्पष्ट रूप से कह, “किसी भ्रम में मत रहो। उसे ले जाओ वरना हम परवाह नहीं करेंगे कि कोई अन्धा है या महिला।” IPSP की कार्यकर्ता और कलाकार सृष्टि गुप्ता ने बताया, “जब पुरुष पुलिसकर्मी मुझे बस में जबरन ठूॅंस रहे थे तो मेरे घुटने में गम्भीर चोट लग गयी। दिल्ली पुलिस के बर्बर हमले के कारण कुछ ही मिनटों में मुझे साॅंस लेने में दिक़्कत होने लगी और मैं बेहोश होने की कगार पर पहुॅंच गयी। बार-बार मेडिकल सहायता देने के लिए बोलने के बाद भी दिल्ली पुलिस क़रीब एक घण्टे तक बस में इधर-उधर भटकाती रही, इस दौरान मेरी तबीयत और भी ख़राब हो गयी। अन्त में, अन्य प्रदर्शनकारियों के लगातार दबाव के बाद, पुलिस ने पानी और ओआरएस लाने के लिए दो मिनट के लिए बस रोकी। मुझे कुछ हो जाने के डर से उन्होंने मुझे शादीपुर के एक अस्पताल के पास छोड़ दिया। न तो उन्होंने मुझे अस्पताल पहुॅंचाने में मदद की और न ही उस निजी अस्पताल का बिल चुकाया।”
प्रियम्वदा ने प्रेस को यह भी बताया कि उनसे और IPSP के एक अन्य कार्यकर्ता से आईबी, सीआईडी और स्पेशल ब्रांच के अधिकारियों ने देर रात तक अलग-अलग पूछताछ की। “पूछताछ के दौरान आईबी, सीआईडी और स्पेशल ब्रांच के अधिकारियों ने हमसे कहा कि चूॅंकि हम मुसलमान नहीं हैं, इसलिए हमें फ़िलिस्तीन के साथ एकजुटता में विरोध प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। यह हमें डराने और परेशान करने के लिए एक ज़बरदस्ती की गयी क़वायद थी। पूछताछ के दौरान हमारे इरादों और चरित्र के बारे में झूठे और भ्रामक सवाल पूछे गये। जैसे ‘एक भौतिकी का छात्र फ़िलिस्तीन के लिए विरोध करने में क्यों दिलचस्पी लेगा?’, ‘भारत में कोई व्यक्ति इज़रायल के ख़िलाफ़ विरोध क्यों करेगा, जबकि दोनों देशों के बीच इतने अच्छे व्यापारिक सम्बन्ध हैं?’ पूछताछ करने वालों ने हमें बार-बार याद दिलाया कि हमने इज़रायल के ख़िलाफ़ विरोध करके और इज़रायली झण्डा जलाकर एक गम्भीर अपराध किया है। दिल्ली पुलिस ने हमें यह भी धमकी दी कि अगर हमने अपना आन्दोलन जारी रखा तो हमें गम्भीर कानूनी परिणाम भुगतने होंगे।”
भारत में जन आक्रोश से इज़रायल के नरसंहारकारी उपनिवेशवादी ज़ायनवादी राज्य की रक्षा करने के लिए दृढ़ प्रतिबद्धता का प्रदर्शन करते हुए, फ़ासीवादी मोदी सरकार फ़िलिस्तीन के मुक्ति संघर्ष के समर्थक प्रदर्शनकारियों की क्रूर और अवैध हिरासत पर ही नहीं रुकी, बल्कि एक क़दम आगे बढ़कर प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ झूठे आरोपों के तहत एफ़आईआर दर्ज की गयी। “IPSP के चार प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ बीएनएस की धारा 121(1), 132, 221 और 223(A) के तहत एफ़आईआर दर्ज की गयी है। यह रेखांकित किया जाना चाहिए कि BNS की धारा 121(1) पुलिस पर स्वैच्छिक आपराधिक हमले से सम्बन्धित है। दिल्ली पुलिस का यह अपमानजनक और निरर्थक आरोप कि शान्तिपूर्ण प्रदर्शनकारियों ने उन पर हमला किया, एक सरासर झूठ है और प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ पुलिस के अत्याचार को छिपाने की एक घटिया कोशिश है।” IPSP के एक अन्य कार्यकर्ता विशाल ने कहा कि “जबकि मोदी सरकार, फ़िलिस्तीन के सम्बन्ध में भारत की लम्बे समय से चली आ रही कूटनीतिक स्थिति को जारी रखते हुए, आधिकारिक तौर पर फ़िलिस्तीन को एक सम्प्रभु देश के रूप में मान्यता देती है, लेकिन दूसरी तरफ़ वास्तव में, इसने ज़ायनवादी इज़रायल को सभी राजनीतिक, कूटनीतिक और आर्थिक सहायता प्रदान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। फ़ासीवादी मोदी सरकार ग़ज़ा में युद्ध विराम की माॅंग करने वाले महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर मतदान से संयुक्त राष्ट्र में बार-बार दूर रही है। यह मोदी सरकार का पाखण्ड और दोमुँहापन है।” विशाल ने आगे कहा, “फ़ासीवादी मोदी सरकार द्वारा फ़िलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनकारियों का दमन और उनका पीछा करना लोगों के कठिन परिश्रम से हासिल किये गये जनवादी अधिकारों को कमज़ोर करने, असहमति की हर आवाज़ को कुचलने और देश में हर तरह के प्रतिरोध को दबाने की जो कोशिश जारी है उसी की एक कड़ी है।
प्रियम्वदा ने कहा, “फ़ासीवादी मोदी सरकार और उसकी कठपुतली दिल्ली पुलिस के दमनकारी हथकण्डों से IPSP के कार्यकर्ता डरने वाले नहीं है। हम न केवल अपने कार्यकर्ताओं पर लगाये गये झूठे आरोपों के ख़िलाफ़ अदालत का रुख करेंग बल्कि IPSP की कार्यकर्ताओं और महिला प्रदर्शनकारियों पर किये गये क्रूर हमले, उत्पीड़न और उन पर की गयी लैंगिक टिप्पणियों तथा दलित प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ की गयी जातिवादी गालियों के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस के ख़िलाफ़ एफ़आईआर भी दर्ज करायेंगे। आने वाले दिनों में IPSP नागरिक समाज के सदस्यों, लोकतांत्रिक और फ़िलिस्तीन समर्थक सार्वजनिक बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं का एक प्रतिनिधिमण्डल बनाकर राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और अन्य सम्बन्धित निकायों के समक्ष दिल्ली पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों के साथ किये गये लैंगिक, स्त्री-विरोधी, जातिवादी और अमानवीय व्यवहार के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज करायेगी।”

विशाल ने टिप्पणी की कि , “सत्ता में बैठी भाजपा सरकार अपने आईटी सेल और गोदी मीडिया के माध्यम से जानबूझकर फ़िलिस्तीनी मुक्ति संघर्ष को साम्प्रदायिक रंग दे रही है, ताकि वह देश में मुसलमानों को और अधिक व बड़े दुश्मन के रूप में पेश कर सके।”
फ़िलिस्तीन के मुक्ति संघर्ष के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर ज़ोर देते हुए विशाल ने कहा कि “इज़रायल-फ़िलिस्तीन का मुद्दा यहूदियों और मुसलमानों के बीच धार्मिक संघर्ष का मुद्दा नहीं है। बल्कि, यह एक उत्पीड़ित राष्ट्र का अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष है, उस उपनिवेशवादी राज्य के ख़िलाफ़ जिसने फ़िलिस्तीनी लोगों को 77 साल से अधिक समय से बेड़ियों में जकड़े रखा है। भारत भी कभी उपनिवेशित देश था और भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे हमारे शहीद क्रान्तिकारियों ने हमें सभी प्रकार के राष्ट्रीय उत्पीड़न और उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ लड़ना सिखाया है। फ़िलिस्तीन के मुक्ति आन्दोलन का समर्थन करने और इज़रायल द्वारा जारी नरसंहार का विरोध करने का सवाल कोई धार्मिक सवाल नहीं है, बल्कि यह इन्सानियत और विवेक की कसौटी बन गया है। जिस व्यक्ति में थोड़ी भी इन्सानियत और विवेक बचा है, वह ग़ज़ा में फ़िलिस्तीनी बच्चों के बर्बर नरसंहार का समर्थन नहीं कर सकता।”

इस प्रेस वार्ता में जाने-माने बुद्धिजीवी और जनवादी तथा मानवाधिकार कार्यकर्ता भी शामिल हुए, जैसे कि सुप्रीम कोर्ट के वकील और ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क के सदस्य कोलिन गोंसाल्वेस, दिल्ली विश्वविद्यालय की सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर नन्दिता नारायण, जेएनयू में एसोसिएट प्रोफ़ेसर सौम्यब्रत चौधरी, और सीपीई एम एल न्यू डेमोक्रेसी से साथी मृगांक। प्रोफ़ेसर नन्दिता नारायण ने कहा, “पूरी दुनिया में कहीं भी खुलेआम इतनी बर्बरता नहीं हुई है। और भारत सरकार अपने आधिकारिक पक्ष के विपरीत जाकर ज़ायनवादी व साम्राज्यवादी ताक़तों का समर्थन कर रही है। किसी भी शान्तिपूर्ण विरोध को राज्यसत्ता बर्बर तरीक़े से द्वारा दबा दिया जाता है, ख़ासतौर पर तब जब इन विरोधों में किसी प्रोफ़ेसर या वरिष्ठ नागरिकों की ग़ैर-मौजूदगी हो।”

प्रोफ़ेसर सौम्यब्रता चौधरी ने ‘फ़िलिस्तीन के साथ एकजुट भारतीय जन’ और संघर्षरत फ़िलिस्तीनी जनता के साथ एकजुटता ज़ाहिर की और कहा कि इज़रायल बर्बरता और हिंसा के मामले में हमारे दुस्वप्न को भी दिन प्रतिदिन पीछे छोड़ रहा है। वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोंसाल्वेस ने भी जनवादी अधिकारों पर बढ़ते हमले की ओर इंगित किया और सरकार और पुलिस द्वारा सभी नियम क़ानूनों को अपने अनुसार तोड़ने-मरोड़ने पर भी बात रखी। उन्होंने अपनी बात में एक विस्मयकारी तथ्य को रखते हुए कहा कि उनके एक सहयोगी द्वारा दाख़िल किये गये एक RTI में यह सामने आया कि दिल्ली पुलिस ने एक वर्ष में 6,000 से भी अधिक बार धारा 144 लगायी है। इस प्रकार यह धारा लगातार ही लगायी गयी है, जो ख़ुद सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उलंघन है। डॉ. मृगांक ने इस बात पर रोशनी डाली कि किस प्रकार भारतीय सरकार हर असहमति की आवाज़ को दबाने का प्रयास कर रही है, ताकि विद्रोह और प्रतिरोध के सभी रास्ते बन्द किये जा सकें।

प्रियम्वदा ने कहा, “सम्मेलन में उपस्थित जन-पक्षधर प्रेस के माध्यम से, IPSP देश के प्रत्येक जनवादी और न्याय-प्रिय व्यक्ति और समूहों तक अपनी बात पहुॅंचाना चाहती है, ताकि वे फ़िलिस्तीन के मुक्ति आन्दोलन के पक्ष में लोगों को एकजुट करने के हमारी मुहिम में शामिल हो सकें। इसके अलावा, आर्थिक, कूटनीतिक और अकादमिक बहिष्कार और ज़ायनवादी इज़रायल को वैश्विक पटल पर अलग- थलग करने के विश्व स्तर पर चल रहे बीडीएस आन्दोलन के हिस्से के रूप में, IPSP बीडीएस इण्डिया अभियान का आयोजन कर रही है और हम भारत के प्रत्येक जागरूक नागरिक से इज़रायल के प्रत्येक उत्पाद और इज़रायल में निवेश करने वाली अन्तरराष्ट्रीय कम्पनियों के उत्पादों का बहिष्कार करने का आह्वान करते हैं।” उन्होंने प्रेस और मीडिया कर्मियों से IPSP की आवाज़ को बुलन्द करने व उसे लोगों तक ले जाने का आह्वान किया।

