Women-Empowermenrt- सशक्तिकरण के नाम पर महिलाओं का तुष्टिकरण – महिलाओं को ताश के पत्ते की तरह खेला जाता रहा है और महिलाओं को आज भी कोई आपत्ति नहीं????
Appeasement In The Name Of Women Empowerment - वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया जा रहा और ताश के पत्ते की तरह खेला जाता रहा है।
आधुनिक्ता के नाम पर युवतियां, महिलाएं, समुंदर किनारे वाले महानगरों में अपने आपको शौक़ीया नग्न आवस्था में अपने अंग प्रदर्शन करती मिलेंगी
महिलाओं के सशक्तिकरण के नाम पर तुष्टिकरण
महिलाओं को वोट बैंक और ताश के पत्ते की तरह खेला जाता रहा है।

एस. ज़ेड. मलिक

सदियों से विश्व मे पुरुष प्रधानी रही है और आज भी है और भविष्य मे भी रहेगी इसलीय की आज भी 80 प्रतिशत महिलायें निर्मल कोमल विचारहीन और उदार हैं जिसका लाभ पुरुष बड़े आसानी से उठाते रहते हैं। महिलाओं के साथ भेद-भाव आज कोई नया नहीं है सदियों से होता आया है और आज भी हो रहा है । जबकि इसी स्थिति को देखते हुए साकारतंक कदम उठाए गए और महिला को सशक्त बनाने के लिए 8 मार्च 1975 को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाना लगा। और भारत मे 2001 मे महिला सशक्तिकरण दिवस के रूप मे मनाया जाने लगा ।
2001 से भारत मे महिलाओं के लिय न जाने कितने ही लाभकारी योजना बनाए गए परंतु सभी पर पुरुषों की प्रधानी रही और महिलाओं कोपुरुषों पर ही आश्रित रहना पड़ा – ऐसा कभी नहीं हुआ जो सरकार गहरे घर जा कर महिलाओं को उनका अधिकार दे और बताए की यह माहिलाओं काा अधिकार है । महिलाओं को आज भी अपने अधिकार लेने के लिय पँचायत से लेकर राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के महकमे तक धक्के खाने पद रहे हैं । 
यदि कोई युवती शिक्षित हो कर आईएएस , आईपीस , या जुडीसयरी हासिल करने के बाद भी उसे पुरुषों के सोशन और दोहन का शिकार होना पड़ता है। चाहे वह साइंटिस्ट ही क्यूँ बन जाए उसे भी पुरुषप्रधान का प्रकोपभाजक बनना पड़ता है । खुले आम सहोसन किया जा रहा है और उसके साथ कोई न्याय नहीं । जबकि महिलाये माँ है, बेटी है, बहु है, सास है, बहन है, उसके चरण सपर्छ करने की बजाए उसका सदियों से सोशन और अपमान किया जाता रहा है ।
भारत ही नही बल्कि विश्व के अधिकतर यूरोप मे महिलाओं को उपभोग की वस्तु की तरह आज भी इस्तेमाल किया जाता है, अपितु स्वयं महिलाएं भी अपने आपको पुरुषों के उपभोग और विलासिता की वस्तु बन कर इस्तिमाल हो रही हैं। चाहे पैसा कमाने की लालसा में या अपने शौक या अपनी सम्भोगिक स्वेक्षा से।

एशिया के कुछ देशों में जैसे बंगला देश, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, मलेशिया, अफगानिस्तान, हिंदुस्तान जैसे देशों में कट्टरपंथी परम्पराओं के तहत आज भी बहुताये महिलाएं सज्जित सुरक्षित और कामगार हैं। परन्तु इन देशों में भी मोर्डनेट या आधुनिक्ता के नाम पर युवतियां, महिलाएं, समुंदर किनारे वाले महानगरों में अपने आपको शौक़ीया नग्न आवस्था में अपने अंग प्रदर्शन करती मिलेंगी, तो ऐसी महिलाओं को टारगेट किया जाता है और उन्हे हीरोइन या मंत्री बनाने का सपना दिखाकर बड़े आसानी से राजनीति स्तर पर इनका तुष्टीकरण किया जाता है।
जैसे विश्वसुन्दरीयां जिसने अपनी सुंदरता का प्रदर्शन करने पुरुषों की भीड़ मे प्रयोगिता करने निकली और उन्हे सशक्त महिला के नाम का टैग लगा कर उनका शारीरिक और मानसिक सोशन और दोहन दोनों होने लगा उन्हे अपने आपको सशक्त साबित करने के लिए न जाने कितने पुरुषों का बिस्तर गरम करना पड़ता होगा और न जाने इतने उचे मुकाम तक पहुँचने के लिए कितनों लोगों की खुशामत करनी पड़ी होगी यह तो वही जाने।

लेकिन इसके विपरीत एशिया महा देश के अधिकतर देशों के ग्रामीण क्षेत्रो में महिलाएं, अंगप्रदर्शन तो करती नहीं दिखेंगी, लेकिन स्कूलों कॉलेजों में युवतियों को अपने मानसिक संतुष्टि और पने भविष्य की कल्पना करते हुए छुपे, चोरी सम्भोग, विलासिता में लिप्त ज़रूर एका दुका देखने को या सुनने को मिल जाता है। ऐसे युवतियों को स्वार्थी पुरुष ब्लैकमेल कर के बाज़ारु बना देते हैं। और वैसी महिलायेँ अपने आपको मजबूरन कहीं कोठे की शोभा बनजाती है, तो कहीं बार डांसर तो कहीं किसी की रखाइल बन कर रहतीं हैं, इन्ही मे कुछ महिलायें अपने सशक्त होने काा परिचय देते हुए समाज मे जागरूकता का कार्य करती हैं तो कुछ जागरूकता के नाम पर घरेलू महिलाओं और घरेलू यूवतीओं रोजगार दिलाने के नाम पर गलत इस्तेमाल कर उनका तुष्टिकरण किया जाता रहा है। इसे ही शायेद ट्रैफिकिंग भी कहा जाता है।

महिला कॉलेज में पुरुष प्रिसिंपल: पटना यूनिवर्सिटी में लॉटरी सिस्टम से कॉलेजों के प्रिंसिपल की नियुक्तियों पर विवाद – https://www.bbc.com/hindi/articles/ckg3j9j20m1o
जबकि भारत सरकार ने महिलाओं के सुरक्षा की खातिर काफी अच्छे और सख्त यानी कड़े कानून बनाये हैं, फिरभी महिलाओं का दुर्भाग्य है कि उस क़ानून का भी दुरुपयोग ही किया जाता रहा हैं, सच यह है कि महिलाओं के लिये सुरक्षा और संरक्षण का कोई विशेष व्यावस्था सरकारी स्तर पर भारत में क्या विश्व मे भी कभी नहीं किया गया, जबकि अरब देशों में तो महिलाओं को आज भी ज़रख़ेज़ ग़ुलाम बना कर रखा जाता है। उन्हें इस्लाम का हवाला दे कर एक पुरुष के साथ शादी करके महिला को पूरी ज़िंदगी एक बंधुआ गुलाम तरह पर्दे में रह कर अपनी ज़िन्दगी बसर करनी पड़ती और पुरुष चाहे जितनी मर्ज़ी चाहे शादी करे या बिना शादी के किसी बाहरी महिलाओं को रखैल बना कर रख सकता है। उसे कोई फरक नहीं पड़ता ।
मध्य प्रदेश: दो लड़कियों की हत्या से सवालों के घेरे में महिलाओं की सुरक्षा
https://www.bbc.com/hindi/articles/cx2jj60zvnno
- घरेलू हिंसा: इसमें शारीरिक, यौन, भावनात्मक, या आर्थिक शोषण शामिल हो सकता है, जो अक्सर पति या उसके परिवार के सदस्यों द्वारा किया जाता है. [1, 1, 3, 3]
- यौन शोषण और उत्पीड़न: इसमें बलात्कार, यौन उत्पीड़न, तस्करी और वेश्यावृत्ति शामिल हैं, जो सार्वजनिक या निजी जीवन में हो सकते हैं. [1, 1, 2, 2, 6, 6]
- दहेज प्रथा: दहेज के लिए महिलाओं को प्रताड़ित किया जाता है, जिसमें शारीरिक और मानसिक पीड़ा शामिल हो सकती है. [3, 3, 4, 4, 7, 8, 9]
- बाल विवाह: कम उम्र में विवाह महिलाओं को कई प्रकार के शोषण के प्रति संवेदनशील बनाता है. [3, 3]
- सामाजिक-जातिगत उत्पीड़न: विशेष रूप से दलित महिलाओं को अक्सर उच्च जातियों के पुरुषों द्वारा उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है, साथ ही अपनी जाति के पुरुषों द्वारा भी शोषण का सामना करना पड़ता है. [5, 5]
- मीडिया में शोषण: पोर्नोग्राफी और अन्य मीडिया में महिलाओं का शोषण लैंगिक असमानता और वस्तुकरण को दर्शाता है. [2, 2]
- भारत में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को रोकने के लिए घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 लागू है. [3, 10]
- भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए: पति या पति के किसी रिश्तेदार द्वारा क्रूरता से निपटने के लिए है. [10]
- हालांकि, कुछ मामलों में समाज महिलाओं के खिलाफ हिंसा को स्वीकार्य भी समझता है, जैसा कि एक सरकारी अध्ययन में 51% पुरुषों और 54% महिलाओं द्वारा पत्नियों की पिटाई को सही ठहराना दर्शाता है. [3]
- दलित महिलाओं के उत्पीड़न पर एक अध्ययन में पाया गया कि उनमें से कई को शारीरिक और यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है. [5]

