Jamte Islami Hind Give Advise to Govt of India, on Union Budget 2026
यूनियन बजट 2026-27 में अवाम के बजाय पूंजी को प्राथमिकता दी गई है,
مرکزی بجٹ میں عوام کے بجائے سرمائے کو ترجیح، بے روزگاری اور بڑھتا ہوا قرض کا بوجھ تشویشناک : سیدسعادت اللہ حسینی، امیر جماعت اسلامی ہند*
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Union Budget 2026–27 Prioritises Capital Over People, Disappoints on Employment Generation and Rising Debt: Syed Sadatullah Husaini, President, Jamaat-e-Islami Hind*

AIG-DESK NEWS

New Delhi: The President of Jamaat-e-Islami Hind (JIH), Syed Sadatullah Husaini, has expressed concern over the Union Budget 2026–27, stating that while the government has emphasised macroeconomic stability, capital expenditure and fiscal discipline, the Budget falls short in addressing employment generation, social sector needs, widening inequality and the growing burden of public debt.
In a statement to the media, the JIH President said, “Jamaat-e-Islami Hind had submitted detailed policy suggestions to the Ministry of Finance ahead of the Budget, urging a shift towards employment-intensive growth, stronger demand-side support, equitable wealth distribution, and targeted interventions for marginalised communities, including minorities. Unfortunately, the Budget continues to prioritise capital-intensive growth while offering limited concrete measures to address unemployment, income insecurity, and social exclusion.”
Syed Sadatullah Husaini noted, “The Budget’s record capital expenditure of over ₹12.2 lakh crore may support long-term infrastructure creation, but it has limited immediate impact on employment and household incomes, particularly for informal workers, rural households, women, and youth. The Social sector spending remains subdued, with Union government expenditure on health (₹1.03 lakh crore) and education ₹1.39 lakh crore), far below its stated national policy goals.”
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The JIH President also drew attention to the persistent under-utilisation of funds in key welfare schemes in previous years, revealed through the Budget documents themselves. He observed that several flagship programmes related to drinking water, housing, and livelihoods saw large gaps between promised allocations and actual spending. “Fiscal discipline achieved by cutting or delaying essential social spending ultimately harms the poor and undermines human development,” he added.
On minority welfare, Syed Sadatullah Husaini said, “While allocations for the Ministry of Minority Affairs have been raised to about ₹3,400 crore in 2026–27, this remains modest given the scale of deprivation faced by minority communities. It is a matter of grave concern that there has been an extremely low utilisation of minority welfare funds in recent years, particularly scholarship schemes, due to administrative delays and lack of approvals. Announcing allocations without ensuring timely implementation only results in paper promises and not real empowerment.”
A major concern highlighted by Jamaat-e-Islami Hind is the growing reliance on borrowing and the rising cost of debt servicing. The Budget documents show that borrowings and liabilities constitute the single largest source of government receipts, while interest payments account for nearly one-fifth of total expenditure. Syed Sadatullah Husaini cautioned that excessive dependence on debt not only constrains future fiscal space but also raises serious ethical concerns. “An economic system excessively driven by interest-based debt is inherently unjust, as it transfers public resources away from social welfare towards servicing creditors,” he said, adding that rising interest payments crowd out spending on health, education, and poverty alleviation.
The JIH President further criticised the regressive tilt of the tax structure, noting that taxes on individuals continue to contribute a larger share of revenue than corporate taxes, despite significant corporate tax concessions over the past decade. Heavy reliance on indirect taxes like GST places a disproportionate burden on ordinary households and exacerbates inequality.
Syed Sadatullah Husaini urged the government to rethink its fiscal priorities and adopt a more humane, inclusive, and morally grounded economic framework. “True development must be judged by its impact on the weakest sections of society, not merely by headline growth or infrastructure statistics,” he said. Jamaat-e-Islami Hind called for greater investment in labour-intensive sectors, stronger social protection, progressive taxation, and reduced dependence on debt-fuelled growth to ensure justice, dignity, and shared prosperity for all citizens.
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*यूनियन बजट 2026-27 में अवाम के बजाय पूंजी को प्राथमिकता दी गई है, रोज़गार सृजन और बढ़ते कर्ज़ पर निराशा हुई: अध्यक्ष जमाअत-ए-इस्लामी हिंद*
नई दिल्ली, 03 फरवरी 2026।
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने केंद्रीय बजट 2026-27 पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि सरकार ने व्यापक आर्थिक स्थिरता, पूंजीगत व्यय और राजकोषीय डिसिप्लिन पर ज़ोर दिया है, लेकिन बजट रोज़गार पैदा करने, सामाजिक क्षेत्र की ज़रूरतों, बढ़ती असमानता और सार्वजनिक कर्ज़ के बढ़ते बोझ को दूर करने में नाकाम रहा है।
मीडिया को जारी एक बयान में जमाअत के अध्यक्ष ने कहा, ” जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने बजट से पहले वित्त मंत्रालय को विस्तार में पॉलिसी सुझाव दिए थे, जिसमें रोजगार-इंटेंसिव ग्रोथ, मांग पक्ष को मज़बूत समर्थन, धन का सही बंटवारा और अल्पसंख्यकों सहित कमज़ोर समुदायों के लिए लक्षित दखल की अपील की गई थी। दुर्भाग्य से, बजट अभी भी कैपिटल-इंटेंसिव ग्रोथ को प्राथमिकता दे रहा है, जबकि बेरोज़गारी, आय की असुरक्षा और सामाजिक बहिष्कार को दूर करने के लिए सीमित ठोस कदम उठाए गए हैं।”
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सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने कहा, “बजट में ₹12.2 लाख करोड़ से ज़्यादा का रिकॉर्ड पूंजीगत व्यय दीर्घकालिक इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में मदद कर सकता है, लेकिन इसका रोज़गार और घरों की आय पर सीमित तत्काल प्रभाव होगा, खासकर अनौपचारिक मज़दूरों, ग्रामीण परिवारों, महिलाओं और युवाओं पर। सोशल सेक्टर पर खर्च कम रहा है, जिसमें केंद्र सरकार का स्वास्थ्य (₹1.03 लाख करोड़) और शिक्षा (₹1.39 लाख करोड़) पर खर्च अपनी बताई गई राष्ट्रीय नीति के लक्ष्यों से बहुत कम है।”
जमाअत के अध्यक्ष ने विगत वर्षों में अहम कल्याणकारी योजनाओं में फंड के लगातार कम इस्तेमाल की तरफ भी ध्यान दिलाया जिसका खुलासा खुद बजट डॉक्यूमेंट्स से हुआ है। उन्होंने कहा कि पीने के पानी, घर और रोज़गार से जुड़े कई बड़ी योजनाओं में वादे के मुताबिक आबंटन और असल खर्च के बीच बड़ा अंतर देखा गया। उन्होंने आगे कहा, ” आवश्यक सामजिक व्यय में कटौती या देरी करके हासिल किया गया वित्तीय अनुशासन आखिरकार गरीबों को नुकसान पहुंचाता है और मानव-विकास को कमज़ोर करता है।”
अल्पसंख्यक कल्याण पर सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने कहा, “हालांकि अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के लिए आवंटन 2026-27 में बढ़ाकर लगभग ₹3,400 करोड़ कर दिया गया है, लेकिन अल्पसंख्यक समुदायों को जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, उसे देखते हुए यह रकम बहुत कम है। यह चिंता की बात है कि हाल के वर्षों में प्रशासनिक देरी और मंज़ूरी न मिलने के कारण अल्पसंख्यक कल्याण फंड, खासकर स्कॉलरशिप योजनाओं का बहुत कम इस्तेमाल हुआ है। समय पर लागू करने की गारंटी दिए बिना आवंटन की घोषणा करने से सिर्फ कागज़ी वादे होते हैं, असली सशक्तिकरण नहीं।”
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने एक बड़ी चिंता यह जताई है कि कर्ज पर निर्भरता बढ़ रही है और कर्ज चुकाने की लागत भी बढ़ रही है। बजट डॉक्यूमेंट्स से पता चलता है कि कर्ज और देनदारियां सरकार की कमाई के सबसे बड़े स्रोत हैं, जबकि ब्याज भुगतान कुल खर्च का लगभग पांचवां हिस्सा है। सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने आगाह किया कि कर्ज पर ज़्यादा निर्भरता न सिर्फ भविष्य के वित्तीय दायरे को सीमित करती है, बल्कि गंभीर नैतिक चिंताएं भी पैदा करती है। उन्होंने कहा, “ब्याज आधारित कर्ज पर बहुत ज़्यादा निर्भर आर्थिक व्यवस्था स्वाभाविक रूप से अन्यायपूर्ण है, क्योंकि यह सार्वजनिक संसाधनों को सामाजिक कल्याण से हटाकर कर्जदाताओं को चुकाने में लगा देता है,” और कहा कि बढ़ते ब्याज भुगतान स्वास्थ्य, शिक्षा और गरीबी कम करने पर होने वाले व्यय को कम कर देते हैं।
जमाअत के अध्यक्ष ने टैक्स स्ट्रक्चर के प्रतिगामी झुकाव की भी आलोचना की, और कहा कि पिछले एक दशक में कॉर्पोरेट टैक्स में काफी छूट के बावजूद, व्यक्तियों पर लगने वाले टैक्स से होने वाली कमाई कॉर्पोरेट टैक्स से ज़्यादा है। GST जैसे अप्रत्यक्ष कर पर ज़्यादा निर्भरता आम परिवारों पर बहुत ज़्यादा बोझ डालती है और असमानता को बढ़ाती है।
सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने सरकार से अपनी वित्तीय प्राथमिकताओं पर फिर से सोचने और ज़्यादा मानवीय, समावेशी और नैतिक मूल्यों पर आधारित आर्थिक ढांचा अपनाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, “सच्चे विकास को समाज के सबसे कमज़ोर वर्गों पर उसके प्रभाव से आंका जाना चाहिए, न कि सिर्फ़ सुर्खियों में वृद्धि या इंफ्रास्ट्रक्चर के आंकड़ों से।” जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने सभी नागरिकों के लिए न्याय, गरिमा और साझा समृद्धि सुनिश्चित करने के लिए श्रम-प्रधान क्षेत्रों में ज़्यादा निवेश, मज़बूत सामाजिक सुरक्षा, प्रगतिशील कराधान और कर्ज़ पर आधारित विकास पर निर्भरता कम करने का आह्वान किया।
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*مرکزی بجٹ میں عوام کے بجائے سرمائے کو ترجیح، بے روزگاری اور بڑھتا ہوا قرض کا بوجھ تشویشناک : سیدسعادت اللہ حسینی، امیر جماعت اسلامی ہند*
نئی دہلی: جماعت اسلامی ہند کےامیر سید سعادت اللہ حسینی نے مرکزی بجٹ 2026–27 پر اپنی تشویش کا اظہار کرتے ہوئے کہا ہے کہ اگرچہ حکومت نے میکرو اقتصادی استحکام، سرمایہ جاتی اخراجات اور مالیاتی نظم و ضبط پر زور دیا ہے، تاہم یہ بجٹ نئے روزگار پیدا کرنے ، سماجی ضروریات پورا کرنے ، بڑھتی ہوئی عدم مساوات اور عوامی قرض کے بڑھتے بوجھ جیسے اہم معاشی مسائل کو حل کرنے میں ناکام نظر آتا ہے۔
میڈیا کے لیے جاری بیان میں سید سعادت اللہ حسینی نے کہا کہ جماعت اسلامی ہند نے بجٹ سے پہلے وزارت خزانہ کو تفصیلی تجاویز پیش کی تھیں۔ ان تجاویز میں روزگار پر مبنی ترقی،عوامی ضروریات کی تکمیل، دولت کی منصفانہ تقسیم اور اقلیتی طبقات سمیت حاشیے پر موجود لوگوں کی ترقی کے لیے مخصوص اقدامات پر زور دیا گیا تھا۔انہوں نے کہا کہ یہ بجٹ سرمایہ داری کو بڑھاوا دیتا ہے اور بے روزگاری، آمدنی کے عدم تحفظ جیسے مسائل سے نمٹنے کے لیے ٹھوس منصوبہ پیش نہیں کرتا۔
سید سعادت اللہ حسینی نے مزید کہا کہ بجٹ میں 12.2 لاکھ کروڑ روپے سے زائد کے ریکارڈ سرمایہ جاتی اخراجات ملک کے بنیادی ڈھانچے کی تعمیر میں مددگار ہو سکتے ہیں، لیکن بے روزگاری پر لگام لگانے اور گھریلو آمدنی میں اضافہ کرنے میں ناکام ہیں ۔ خاص طور پر غیر رسمی شعبے کے کارکنوں، دیہی گھرانوں، خواتین اور نوجوانوں کے لیے بجٹ میں واضح پالیسی کا ذکر نہیں کیا گیا ہے ۔ بجٹ میں صحت (1.03 لاکھ کروڑ روپے) اور تعلیم (1.39 لاکھ کروڑ روپے) جیسے سماجی شعبوں کے لیے مختص فنڈ مرکزی حکومت کے قومی اہداف سے بہت کم ہیں۔
سعادت اللہ حسینی نے بجٹ کے حوالے سے گزشتہ برسوں میں اہم فلاحی اسکیموں میں فنڈز کے استعمال میں آ رہی مسلسل کمی کی طرف بھی توجہ دلائی ۔ انہوں نے کہا کہ پینے کے پانی، رہائش اور روزگار سے متعلق کئی اہم منصوبوں میں اعلان کردہ بجٹ اور اصل خرچ کے درمیان نمایاں فرق ہے۔ انہوں نے واضح کیا کہ سماجی اخراجات میں کٹوتی یا تاخیر سے جاری کیا گیا مالیاتی فنڈ آخرکار غریبوں کو نقصان پہنچاتا ہے اور انسانی ترقی سے محروم کر دیتا ہے ۔
اقلیتی فلاح و بہبود کے حوالے سے سید سعادت اللہ حسینی نے کہا کہ اگرچہ 2026–27 میں وزارت اقلیتی امور کے لیے مختص رقم بڑھا کر تقریباً 3,400 کروڑ روپے کر دی گئی ہے، لیکن اقلیتی طبقوں کو درپیش معاشی مسائل کے مقابلے میں یہ رقم اب بھی بہت کم ہے۔ یہ نہایت تشویش ناک ہے کہ گزشتہ برسوں میں، بالخصوص اسکالرشپ اسکیموں میں، اقلیتی فلاحی فنڈز کا استعمال بہت کم رہا ہے، جس کی اصل وجہ انتظامی بد نظمی اور اسکالر شپ کی منظوری میں پائی جانے والی مشکالات ہیں۔ انہوں نے کہا کہ عمل درآمد کے بغیر ہی محض کا اعلان کر دینا کاغذی وعدوں کے سوا کچھ بھی نہیں۔
جماعت اسلامی ہند نے حکومت کے بڑھتے ہوئے قرض اور سودی ادائیگیوں پر انحصار کو بھی ایک بڑے مسئلے کے طور پر اجاگر کیا ہے۔عام بجٹ کے مطابق قرض اور واجبات حکومتی آمدنی کا سب سے بڑا ذریعہ ہیں، جبکہ سود کی ادائیگیاں کل اخراجات کا تقریباً پانچواں حصہ بنتی ہیں۔ سید سعادت اللہ حسینی نے خبردار کیا کہ حد سے زیادہ قرض پر انحصار نہ صرف مالی بحران کو جنم دیتا ہے بلکہ سنگین اخلاقی سوالات بھی کھڑے کرتا ہے۔ سودی قرض پر چلنے والا معاشی نظام فطری طور پر غیر منصفانہ ہے، کیونکہ اس میں عوامی وسائل کو سماجی بہبود کے بجائے قرض دہندگان کے مفاد کے لیے استعمال کیا جاتا ہے ۔انہوں نے کہا کہ بڑھتی ہوئی سودی ادائیگیاں صحت، تعلیم اور غربت کے خاتمے پر ہونے والے اخراجات کو لگاتار کم کر رہی ہیں ۔
جماعت اسلامی ہند کے امیر نے ٹیکس کے موجودہ نظام پر بھی سخت تنقید کی اور کہا کہ گزشتہ ایک دہائی میں کارپوریٹ ٹیکس میں نمایاں رعایتیں دی گئی ہیں ۔ جبکہ آمدنی کا بڑا حصہ اب بھی عام لوگوں پر ٹیکس لگا کر حاصل کیا جا رہا ہے۔ جی ایس ٹی جیسے ٹیکس عام لوگوں پر بوجھ ڈال رہے ہیں جس سے معاشی عدم مساوات میں اضافہ ہو رہا ہے ۔
سید سعادت اللہ حسینی نے حکومت سے مطالبہ کیا کہ وہ اپنی مالی ترجیحات پر نظر ثانی کرے اور عوامی مفاد کا حامل ایک جامع اور اخلاقی معاشی فریم ورک اپنائے۔حقیقی ترقی کا پیمانہ محض شرحِ نمو یا بنیادی ڈھانچے کے اعداد و شمار نہیں بلکہ یہ ہے کہ اس کا اثر سماج کے کمزور ترین طبقات پر کیا پڑتا ہے۔انہوں نے کہا کہ جماعت اسلامی ہند نے محنت کشوں کے شعبوں میں زیادہ سرمایہ کاری، سماجی تحفظ، آسان ٹیکس سسٹم اور قرض پر مبنی ترقی پر انحصار کم کرنے کا مطالبہ کیا ہے تاکہ تمام شہریوں کے لیے انصاف، وقار اور مشترکہ خوشحالی کو یقینی بنایا جا سکے۔

