ज़श्न-ए-उर्दू 2025: अदब, तहज़ीब और मोहब्बत का कारवां

ज़श्न-ए-उर्दू… एक जज़्बा, एक रूह, जो हर दिल को अदब से रोशन कर दे। जो अल्फ़ाज़ को इबादत बना दे।

उर्दू, अदब, सभ्यता, संस्कार अब मंचो, सम्मेलनों, मुशायरों की शोभा बन कर रह गयी है, घरों से उर्दू अदब, सभ्यता, संस्कार सब गायब हो गई – दानिशमंद, बशाऊर लोगों की रखैल बन कर रह गयी।

ज़श्न-ए-उर्दू 2025: अदब, तहज़ीब और मोहब्बत का कारवां
सैय्यद आसिफ इमाम काकवी
19 अप्रैल 2025 की रात, दुबई की सरज़मीं पर एक नई तारीख़ लिखी गई—जहाँ लफ़्ज़ों की रौशनी ने शेख़ राशिद ऑडिटोरियम को अदबी नूर से सराबोर कर दिया।
यह महज़ एक मुशायरा या कवि सम्मेलन नहीं था, बल्कि “ज़श्न-ए-उर्दू”—एक जज़्बा, एक तहज़ीब, एक सांस्कृतिक इंक़लाब था, जहाँ उर्दू के दीवाने, अदब के शैदाई और शायरी के चाहने वाले एकजुट होकर उर्दू ज़बान की रूह को सलाम पेश करने आए।
उर्दू… दिलों को जोड़ने वाली ज़बान उर्दू सिर्फ़ एक ज़बान नहीं, एक कारवां है तहज़ीब का, मोहब्बत का, साझी विरासत का, जिस तरह यह ज़ुबान दिल से दिल तक बिना किसी सरहद के पहुँचती है, वैसे ही इस जश्न ने भी दुनिया भर से आए शायरों और कवियों को एक मंच पर ला कर खड़ा कर दिया।
  इस सालाना ज़श्न ए उर्दू की ख़ास बात यह रही कि यह मुशायरा जनाब ख़ुमार बाराबंकवी की याद में आयोजित किया गया। उनकी शायरी की खुशबू को नई नस्ल तक पहुँचाने का यह एक दिल को छू लेने वाला प्रयास था।
मंच की रौनक बने दुनिया भर से आए नामचीन अदबी चेहरे डॉ. पीरज़ादा क़ासिम, मंज़र भोपाली, इमरान प्रतापगढ़ी, नदीम शाद, डॉ. शबीना अदीब, अहमद सलमान, हिमांशी बबरा, प्रियंशु गजेन्द्र, और आसिफ़ अली ख़ान जैसे अनेक शायरों और कवियों ने अपनी दिलकश अदायगी से महफ़िल को चाँदनी बना दिया।
“शान-ए-अवध” सम्मान से जनाब अरविंद सिंह ‘गोपे’ को नवाज़ा गया—जो साहित्यिक समरसता के प्रतीक हैं।
इस पूरे कार्यक्रम की सरपरस्ती का सहरा जनाब सैय्यद फ़रहान वास्ती साहब के सर जाता है, जिनकी मेहनत, लगन और जज़्बे ने दुबई में उर्दू अदब को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
दिल से दूर होकर भी, दिल के क़रीब हालाँकि मैं, सैय्यद आसिफ इमाम काकवी, इस बार निजी कारणों से दुबई में शरीक नहीं हो सका, मगर मेरा दिल, मेरी दुआएँ, मेरी मोहब्बत इस जश्न के हर लम्हे में शामिल रहीं। यह जश्न हर साल की तरह इस बार भी कामयाबी की बुलंदियों को छू गया।
ज़श्न-ए-उर्दू एक तहज़ीब का अक्स यह आयोजन सिर्फ़ महफ़िल नहीं, एक आवाज़ है उस तहज़ीब की, जो मोहब्बत, इत्तेहाद और अदब को सरहदों से परे लेकर जाती है।
यह हमें याद दिलाता है कि ज़ुबानें सिर्फ़ संवाद का ज़रिया नहीं होतीं, वो संस्कृतियों को सँजोती हैं, जोड़ती हैं, और हमें हमारी जड़ों से जोड़ती हैं।
अंत में…
ज़श्न-ए-उर्दू… एक जज़्बा, एक रूह,
जो हर दिल को अदब से रोशन कर दे।
जो अल्फ़ाज़ को इबादत बना दे।
ZEA
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