वैश्विक हिंदी महासभा द्वारा परिचर्चा एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन
ज़र्द मौसम का सफ़र डॉक्टर अजय मालवीय बहार इलाहाबादी की एक अप्रतिम पुस्तक है।
भूखा प्यासा रहा परिंदा मगर।/दाना चुगने कभी नहीं उतरा।।/मिरे हाथ में जब से देखा है खंजर। /तो दुश्मन भी हाथ अब मिलाने लगे हैं।।
“ज़र्द मौसम का सफर” पर हुई, परिचर्चा एवं कवि गोष्ठी

प्रयागराज – वैश्विक हिंदी महासभा के बैनर तले आज 9 अगस्त 2024 दिन शुक्रवार नागपंचमी के अवसर पर राजरूपपुर, प्रयागराज में डाक्टर अजय मालवीय की गजल संग्रह “जर्द मौसम का सफ़र” पर एक परिचर्चा एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के अध्यक्ष वैश्विक हिंदी महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉक्टर विजयानंद तिवारी, मुख्य अतिथि वरिष्ठ पार्षद मिथलेश सिंह जी और विशिष्ट अतिथि डॉक्टर शम्भुनाथ त्रिपाठी अंशुल, मुक्तक सम्राट रामकैलाश पाल प्रयागी, डॉक्टर योगेन्द्र कुमार मिश्र विश्वबंधु और मंसूर आलम रहे।

कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों ने माँ सरस्वती की प्रतिमा पर दीप जलाकर और माल्यार्पण करके किया। कार्यक्रम संचालक पंडित राकेश मालवीय मुस्कान ने मधुर वाणी में सरस्वती वंदना करके कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत की।
इस अवसर पर राकेश मालवीय ने कहा ज़र्द मौसम का सफ़र डॉक्टर अजय मालवीय बहार इलाहाबादी की एक अप्रतिम पुस्तक है। इसमें डॉक्टर बहार ने छोटी-बड़ी बात को एक मिसाल की तरह प्रकट किया जो दिल को छू जाती है। उर्दू मर्मज्ञ डॉक्टर अजय मालवीय बहार इलाहाबादी ने भारतीय अस्मिता एवं संस्कृति का सम्मानजनक ढंग से हिंदी और उर्दू में विवेचन किया है। यह उनकी बड़ी देन है, उपलब्धि है। इसके माध्यम से उन्होंने सांस्कृतिक सीमाओं को एक किया है। उर्दू और हिंदी के बीच की खाई को पाट करके दिलों को जोड़ने का काम किया है। उनका शेर कुछ इस तरह है– भूखा प्यासा रहा परिंदा मगर।/दाना चुगने कभी नहीं उतरा।।/मिरे हाथ में जब से देखा है खंजर। /तो दुश्मन भी हाथ अब मिलाने लगे हैं।।
डाॅक्टर शम्भुनाथ त्रिपाठी अंशुल ने कहा कि डॉ अजय मालवीय बहार इलाहाबादी गजलकार के रूप में अच्छा शब्दगुंफन का लयात्मक स्वरूप प्रस्तुत करने में सक्षम है। इनकी गजलें बहुत दूर तक जाती है।
योगेन्द्र जी ने कहा कि कवि अपनी रचना में एक प्रकार का ब्रह्म या सर्जक होता है। उन्होंने कहा कि जर्द मौसम का सफ़र मौसम बदलने की क्षमता रखता है।
आर एल चौरसिया ने पुस्तक की विवेचना में कहा यह गंगा-यमुनी संस्कृति का एक प्रमुख स्तंभ है।
डाॅक्टर अजय मालवीय बहार इलाहाबादी ने अपनी पुस्तक पर प्रकाश डाला। उन्होंने उसके कुछ शेरों को पढ़ा।
पार्षद व मुख्य अतिथि मिथिलेश सिंह ने कहा कि एक साहित्यकार ही समाज को जगाने का कार्य करता है उन्होंने गजल संग्रह जर्द मौसम के लिए अजय मालवीय को बधाई एवं शुभकामना दी।
इस अवसर पर मंसूर आलम ने कहा उर्दू और हिंदी भाषा के मशहूर समालोचक डाक्टर अजय मालवीय बहार इलाहाबादी ने उर्दू में लगभग 19 किताबें लिखी हैं। जर्द मौसम का सफर डॉक्टर अजय मालवीय जी के संकलित गज़लों का संकलन है, जो देवनागरी लिपि में है। डॉक्टर अजय मालवीय “बहार” इलाहाबादी की शाइरी में हिंदुस्तानियत जिसे हम भारत की गंगा-जमुनी तहजीब भी कहते है, पूरी तरह रची बसी है। आसान शब्दों के माध्यम से अपने दिल और जज़्बात की तर्जुमानी करने में इनका कोई विकल्प नहीं। कुछ अश्आर पेश खिदमत है “आना हमारे शहर में संगम घुमाएंगे।/ कुछ और तीरथों के भी दर्शन कराएंगे।।/ चेहरे हज़ार रंग के दिखते हैं जो यहाँ।/ फागुन के रंग में यहाँ सब खिलखिलाएँगे।।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में कवि गोष्ठी हुई। जिसमें विजयानन्द तिवारी, डॉक्टर शम्भुनाथ त्रिपाठी अंशुल, रामकैलाश पाल प्रयागी, डॉक्टर अजय मालवीय बहार इलाहाबादी, पंडित राकेश मालवीय मुस्कान, एम एस खान, योगेन्द्र कुमार मिश्र विश्वबंधु, शम्भुनाथ श्रीवास्तव, उमेश श्रीवास्तव, गंगा प्रसाद त्रिपाठी, डॉक्टर रामलखन चौरसिया आदि ने काव्य पाठ किया। इसके अलावा इन्द्रदेव दुबे, बृजेश गुप्ता, विजय बहादुर और डब्बा भाई उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन पंडित राकेश मालवीय ने किया।



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