गांधी पीस फॉउंडेश द्वारा कुलदीप नैयर पत्रकारिता सम्मान-2023 क्यूँ – स्वामी प्रणवानंद शांति पुरस्कार क्यूँ नहीं?

एक सवाल जिसका जवाब अब शायद किसी गाँधीविदों, गांधी चिंतकों या गांधी विचारधारा वाले लोगों के पास न हो।

2015 तक स्वामी प्रणवानंद शांति पुरस्कार का कार्यक्रम आयोजित हुआ जिसमें पुरस्कार दिए गए।
स्वामी प्रणवानंद शांति पुरस्कार का बैंक में अपना खाता था। उसका ट्रस्ट था। ब्याज की रकम बचत खाते में आती थी। 

सवालों के घेरे में गांधी पीस फॉउंडेश द्वारा कुलदीप नैयर पत्रकारिता सम्मान-2023 से श्री उर्मिलेश को सम्मानित

इस सम्मान से कुछ गाँधीविदों की नाराजगी,  गांधी पीस फॉउंडेश द्वारा कुलदीप नैयर पत्रकारिता सम्मान-2023 क्यूँ – स्वामी प्रणवानंद शांति पुरस्कार क्यूँ नहीं?
एक सवाल जिसका जवाब अब शायद किसी गाँधीविदों, गांधी चिंतकों या गांधी विचारधारा वाले लोगों के पास न हो।
एस. ज़ेड. मलिक
 पिछले दिनों 15 नवम्बर 2024 शनिवार को गांधी पीस फाउंडेशन अर्थात गांधी शांति प्रतिष्ठान में कुलदीप नैयर पत्रकारिता सम्मान-2023 समारोह का आयोजन कर वरिष्ठ पत्रकार श्री उर्मिलेश को कुलदीप नैयर पत्रकारिता सम्मान-2023 का “गांधी जी के दांडी यात्र का गांधी जे हाथों में लाठी की बजाए “कलाम” का एक प्रतीक चिन्ह, प्रशस्ति पत्र साथ एक से एक लाख ₹ का चेक की पुरुस्कृत राशि दे कर सम्मानित किया गया। जिसमे प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत, सचिव अशोक कुमार वरिष्ठ समाज सेवी विजय प्रताप, वरिष्ठ पत्रकार समीक्षक आशीष नंदी एवं चयन समिति के अन्य गणमान्य सदस्य उपस्थित रहे, लेकिन ऐसे अवसर पर नामचीन वह पत्रकार जिन्हें गांधी शांति प्रतिष्ठान ने पहले अवार्ड दे दिया है, वह इस समारोह में उपस्थित नही रहे, दिखाई नही दिए, रवीश कुमार, अजित अंजुम, आरफा खानम, कुर्बान अली, इत्यादि, कारण चाहे जो हो, मैं चाह कर भी उन बड़े महानुभव गांधी विचारकों और गाँधीविदों से पूछने की हिम्मत जुटा नहीं पाया। वहां के उस सभा मे कुछ अंदर पकने की बू भी आ रही थी, दिखाई तो नहीं दिया परन्तु एक तहरीर की शक्ल में सामने आई, वह थी इस कुलदीप नैयर सम्मान के नाम पर ” आखिर नाम बदलने की नौबत क्यूँ आन पड़ी? यह सवाल वर्तमान चयन समिति से है जो गांधी विचारक हैं जिन्हें मैं पिछले 20 वर्षों से जानता हूँ, जिनका नाम है रमेश शर्मा, वह स्वर्गीय भाई जी संग हमेशा देखे जाते रहे आज वह इस प्रतिष्ठान से दूर बनाये हुए हैं, उन्हें नाराज़गी उर्मिलेश को सम्मानित करने से नही है बल्कि नाराज़गी पुरुस्कार का नाम बदलने से है। जैसा कि गांधी विचारक श्री रमेश शर्मा ने आईना इंडिया के सम्पादक से अनौपचारिक बात चीत में बताया कि “डॉ. आर आर दिवाकर, अध्यक्ष, एवं राधाकृष्ण मंत्री, गांधी शांति प्रतिष्ठान के समय स्वामी प्रणवानंद शांति पुरस्कार की भूमिका तैयार हुई थी। स्वामी जी ने बहुत ही आत्मियता, विश्वास के साथ स्वामी प्रणवानंद पुरस्कार की नींव रखी थी। ढाई लाख रुपए की रकम से पुरस्कार शुरू हुआ। पहले 7,500 रुपए दिए जाते थे, अनुपम जी के प्रयास से दस हजार रुपए किए गए।
कुलदीप नैयर पत्रकार पुरस्कार ने स्वामी प्रणवानंद पुरस्कार को हजम कर लिया है, जो सामाजिक रचनात्मक कार्यकर्ताओं को मिलता था। स्वामी जी ने दिया तब ऐसा कभी नहीं सोचा होगा कि इसको इस तरह मिटाया जाएगा। यह अपराध नहीं पाप है। यह विश्वासघात है। कृपया, आप आवाज बुलंद कर स्वामी प्रणवानंद पुरस्कार को पुनः स्थापित करवाकर सहयोग प्रदान करें। वह रकम में अल्प था मगर कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने में सहायक था। 
स्वामी प्रणवानंद शांति पुरस्कार को पुनः स्थापित किया जाना चाहिए। 
       उड़ीसा के साथी बिश्वजीत भाई जो जी पी एफ की गवर्निंग बॉडी के सदस्य है, ने निम्न  फेसबुक पर लिखा है।
“Kumar Kalanand Mani नमस्कार। मुझे जितनी जानकारी है, स्वामी प्रणबानंद सम्मान राशि बहुत कम था। वह राशि बढ़ाने के लिए उनको बार-बार लिखने से कोई जवाब नहीं मिला। बाद में उनके आश्रम वालों ने पत्र लिखा कि उनके देहांत हो गई है और उन लोगों को यह राशि बढ़ाने में कोई रुचि नहीं है। बाद में गांधी शांति प्रतिष्ठान जब कुलदीप नायर पत्रकारिता सम्मान के लिए तय किया, तब यह ₹25000 मूल राशि उसमें जोड़कर नया सम्मान दिया जा रहा है। ₹25000 से साल में कितने भी ब्याज मिलता जिससे एक सम्मान कार्यकर्ताओं को दिया जा सकता था ? इतनी जानकारी मेरे पास है जो मैं आपके साथ साझा कर रहा हूं।”
“रमेश चंद शर्मा मैं अभी भी जुड़ा हुआ हूं। मुझे टैग किया गया तो मैं जितना जानता था, उतना बताया। आप सालों तक संस्था के साथ जुड़े हुए थे, आपको ज्यादा मालूम होगा। आप के पास रकम कितना था, बता सकते हैं, क्यूँ की मैने जो तथ्य दिया, वह अगर झूठा है, तो सही बात आपको निकालना है या फिर आप ज्यादा जानकारी मालुम कर सकते हैं। धन्यवाद।”
इस पर मैने बताया कि बिश्वजीत राय भाई, रकम इतनी छोटी नहीं है। अपनी यादों में कुछ ज्यादा ही है। कृपया सही जानकारी प्राप्त करें तथा सबको सूचित करेंगे तो अच्छा होगा। आपको झूठ बोला गया तो बहुत बुरी बात है। 
कृपया कार्यकर्ताओं को पुरस्कार राशि कितनी दी जाती थी। वह भी जानकारी ले लें। आपका सहयोग अपेक्षित है। मैं जब कार्यरत था तब दो एफ डी की मुझे पक्की याद है, एक थी एक लाख रुपए की तथा दूसरी थी डेढ़ लाख की।
2015 तक स्वामी प्रणवानंद शांति पुरस्कार का कार्यक्रम आयोजित हुआ जिसमें पुरस्कार दिए गए।
स्वामी प्रणवानंद शांति पुरस्कार का बैंक में अपना खाता था। उसका ट्रस्ट था। ब्याज की रकम बचत खाते में आती थी। 
गांधी शांति के संचालक मंडल, पदाधिकारियों एवं कुलदीप नैयर पत्रकारिता पुरस्कार से जुड़े सभी साथियों से अनुरोध है कि वे इस भूल का सुधार कर पुनः स्वामी प्रणवानंद शांति पुरस्कार की स्थापना करें।
स्वामी जी के देहावसान के बाद उनके संगठन से इसके लिए और पैसे मांगना उचित नहीं है।
सत्य अहिंसा न्याय की नींव पर स्थापित गांधी शांति प्रतिष्ठान को पुनः विचार कर स्वामी प्रणवानंद शांति पुरस्कार को स्थापित कर अपनी भूल का सुधार करें।
समस्त शुभकामनाओं सहित सादर जय जगत।
रमेश चंद शर्मा अब इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि गांधी प्रतिष्ठान में क्या कुछ नहीं पक रहा है, हर जगह मोदी ब्रांड चलता दिखाई दे रहा है। “अब तो “हर शाख पर उल्लू बैठा है, अंजाम गुलिस्तां क्या होगा।
चलिये अब जानते है सम्मानित पत्रकार का परिचय-
श्री उर्मिलेश ने लगभग चार दशकों में फैली अपनी पत्रकारिता की यात्रा में विचारपरक पत्रकारिता और तथ्यपरक रिपोर्टिंग के कई मानक स्थापित किए हैं. नवभारत टाइम्स’, ‘दैनिक हिंदुस्तान’ और दैनिक भास्कर’  जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के माध्यम से उन्होंने राजनीतिक तथा सामाजिक जीवन को प्रभावित करने वाली कई महत्वपूर्ण पहल की। तत्कालीन राजनीति का उनके लेखन पर गहरा प्रभाव भी पड़ा। राज्यसभा टीवी चैनल के संस्थापक कार्यकारी संपादक के रूप में टीवी चैनलों की दुनिया को उन्होंने रचनात्मक आयाम दिया। उर्मिलेश की पत्रकारिता अपने वक़्त को न्याय व समता की दिशा में मोड़ने की पत्रकारिता रही है। उन्होंने कई किताबें भी लिखीं, जिनमें बिहार का सच, झारखंड पर केंद्रित जादुई जमीन का अंधेरा, कश्मीर पर केंद्रित झेलम किनारे, दहकते चिनार’, ‘विरासत और सियासत  शामिल हैं. बीते कुछ वर्षों में उनकी क्रिस्टोनिया मेरी जान’, ‘गाजीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल’, और मेम का गांव, गोडसे की गली जैसी किताबें पर्याप्त कीर्ति बटोरती रही हैं। राहुल सांकृत्यायन पर उनकी दो पुस्तकों राहुल सांकृत्यायन : सृजन और सर्जक’ तथायोद्धा महापंडित’ से लेकर भारत में उदारीकरण के प्रभावों पर केंद्रित आर्थिक सुधार के दो दशक पुस्तक बताती है कि उनके सरोकार और चिंतन का दायरा कितना विस्तृत है।
कुलदीप नैयर पत्रकारिता सम्मान : 
गांधी शांति प्रतिष्ठान तथा उससे संबंध रखने वाले कुछ साथियों ने स्वतंत्र व प्रगतिशील पत्रकारिता को समर्थन व प्रोत्साहन देने के लिए पत्रकारों द्वारा पत्रकार के ऐसे सम्मान की कल्पना की। जिस प्रकार हम सबके लिए महात्मा गांधी ऐसी पत्रकारिता के आदिपुरुष रहे हैं। भारत की आज़ादी का पूरा संघर्ष सत्य, न्याय व स्वाभिमान के बल पर लड़ा गया जिसमें महात्मा गांधी की कलम का सशक्त योगदान रहा। इसलिए हम कह सकते हैं कि महात्मा गांधी इस सम्मान की परिकल्पना में मौजूद रहे। इसका प्रतीक-चिह्न भी उन्हीं की प्रेरणा से उभरा— भारतीय कलाजगत के शलाकापुरुष मास्टर नंदलाल बोस के उस सुविख्यात स्केच को हमने अपनाया, जो दांडी यात्रा के वक़्त उन्होंने बनाया था। हमने इतना ही फर्क किया कि गांधी के हाथ के डंडे को कलम का रूप दे दिया। 

तो हमारे प्रतीक-चिह्न का मतलब बनता है :

दृढ़ कदमों और मजबूत हाथों से स्वतंत्र कलम का संकल्प निभाने की प्रतिबद्धता !

स्व. कुलदीप नैयर की पत्रकारिता भी इन्हीं मूल्यों से प्रेरित रही। इसलिए हमारी परिकल्पना को उनका भरपूर समर्थन व प्रोत्साहन मिला। उन्होंने इस सम्मान के लिए आवश्यक राशि जुटाने में निजी मदद भी की तथा दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित किया। उनकी उत्साहजनक स्वीकृति से हमने तय किया कि हम हर वर्ष भारतीय भाषा के एक ऐसे पत्रकार को सम्मानित करेंगे जिसने अपने लेखन या अभिव्यक्ति के दूसरे किसी भी माध्यम से स्वतंत्र, तथ्यपरक, प्रगतिशील, वैज्ञानिक, अभिव्यक्ति को साकार किया हो। यह भी तय किया गया कि यह सम्मान 1 लाख रुपयों का होगा। इसके साथ सम्मानित पत्रकार को प्रशस्ति-पत्र तथा सम्मान का प्रतीक-चिह्न दिया जाएगा। यह भी तय किया गया कि यह सम्मान भाषा, धर्म, जाति, लिंग जैसे किसी भेद का विचार किए बिना, चयन समिति द्वारा चयनित किसी भी भारतीय भाषा के पत्रकार को दिया जाएगा।

गांधी शांति प्रतिष्ठान ने कुलदीप नैयर पत्रकारिता सम्मान के संचालन व समायोजन की ज़िम्मेदारी स्वीकार की।

Ø  पहला सम्मान-2017 : श्री कुलदीप नैयर के हाथों श्री रवीश कुमार को 19 मार्च 2017 को नयी दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के सभागृह में दिया गया।

Ø  दूसरा सम्मान-2018 : श्री आशीष नंदी के हाथों दूसरा सम्मान मराठी के पत्रकार श्री निखिल वागले को 20 अप्रैल 2019 को नयी दिल्ली के कान्स्टीट्यूशन क्लब में दिया गया।

कोविड के प्रकोप के कारण वर्ष 2019 और 2020 के लिए हम यह सम्मान समारोह नहीं आयोजित कर सके।

Ø  तीसरा (2021) और चौथा सम्मान (2022) : श्री आशीष नंदी के हाथों ये दोनों सम्मान क्रमशः यूट्यूबर श्री अजीत अंजुम और द वायर की पत्रकार आरफ़ा खानम शेरवानी को नयी दिल्ली के राजेंद्र भवन में 12 नवंबर 2022 को आयोजित एक संयुक्त समारोह में दिए गए।

कुलदीप नैयर पत्रकारिता सम्मान के संचालक : 20 लाख रुपयों की संचित निधि से गांधी शांति प्रतिष्ठान अपने अध्यक्ष, गांधी-विचार व कार्य की सक्रिय हस्ती, लेखक-पत्रकार श्री कुमार प्रशांत की देखरेख में इस पूरी परिकल्पना का संयोजन करता है. सम्मान समिति के अध्यक्ष राजनीतिक-मनोविज्ञान के प्रख्यात विशेषज्ञ व प्रखर चिंतक श्री आशीष नंदी हैं। सम्मान समिति के सचिव वरिष्ठ पत्रकार-संपादक तथा गांधी शांति प्रतिष्ठान के सचिव श्री अशोक कुमार हैं. सक्रिय समाजवादी विचारक व समाजकर्मी श्री विजय प्रताप इसके संस्थापक सदस्य व वरिष्ठ सलाहकार हैं।

कुलदीप नैयर पत्रकारिता सम्मान की चयन समिति : चयन समिति के वर्तमान सदस्य हैं :

सर्वश्री कुमार प्रशांत, आशीष नंदी, नीरजा चौधरी, ओम थानवी, विजय प्रताप, संजय पारीख, जयशंकर गुप्त, प्रियदर्शन, प्रमोद रंजन, अनिल सिन्हा, अशोक कुमार. चयन समिति आम राय से नये सदस्यों का चयन भी करती है। संचालकों की कोशिश है कि अधिक-से-अधिक भाषाओं के पत्रकारों को चयन समिति में शामिल करते रहा जाए ताकि इसका राष्ट्रीय, बहुभाषी स्वरूप निखरता जाए।

चयन प्रक्रिया : इस वार्षिक सम्मान के लिए नामों की सिफ़ारिश सीधे गांधी शांति प्रतिष्ठान/सम्मान समिति के सचिव को भेजी जा सकती है अथवा चयन समिति के किसी सदस्य के मार्फत अनुशंसा भेजी जा सकती है. जिन भी पत्रकार की सिफ़ारिश की जाए, उनके लेखन के पर्याप्त नमूने भी साथ भेजे जाने चाहिए। चयन समिति अपनी बैठकों में ऐसी सारी अनुशंसाओं पर विचार करती है. चयन समिति के सदस्य भी अपनी तरफ से नामों की सिफ़ारिश करते हैं। इस क्रम से चयन समिति अपनी अंतिम  बैठक में सर्वसम्मति से एक नाम तक पहुंचती है।

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ZEA
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