“नेताओं की देशभक्ति की अग्निपरीक्षा, सेना में बेटा भेजो, पेंशन लो!”
"पेंशन नहीं, पराक्रम दो: नेताओं की देशभक्ति का असली टेस्ट"
पेंशन कोई सम्मान नहीं, एक ज़िम्मेदारी होनी चाहिए – जो तभी मिले, जब परिवार भी राष्ट्र सेवा में उतरे। आम नागरिक के टैक्स पर ऐश करना बंद हो, अब बारी है नेता भी हिस्सा लें – सरहद पर, ज़मीन पर, और ज़िम्मेदारी में। वर्ना जनता सिर्फ सुनती रहेगी, और देश सेवा का बोझ उठाते रहेंगे वही, जिनके पास न ताक़त है, न पहचान – सिर्फ जुनून है।
“नेताओं की देशभक्ति की अग्निपरीक्षा, सेना में बेटा भेजो, पेंशन लो!”
भारत में एक बार विधायक या सांसद बन जाना आजीवन पेंशन की गारंटी बन चुका है, चाहे उनका संसदीय रिकॉर्ड शून्य क्यों न हो। वहीं, सीमाओं पर तैनात सैनिक हर रोज़ जान जोखिम में डालते हैं, लेकिन उनके परिवारों को न्यूनतम सुविधाएं भी संघर्ष से मिलती हैं। सवाल उठता है – क्या नेताओं की देशभक्ति सिर्फ भाषणों और नारों तक सीमित है? क्यों नहीं उनके बेटे-बेटियां सेना में भर्ती होते? अगर आम जनता अपने बच्चों को देश सेवा के लिए भेज सकती है, तो नेता सिर्फ ‘वोट’ नहीं, ‘बलिदान’ भी दें। वक्त आ गया है कि नेताओं की पेंशन को सेना सेवा से जोड़ा जाए – ताकि देशभक्ति सिर्फ मंच की बातें न रह जाए, बल्कि जीने का सच्चा प्रमाण बने।


एक बार एक नेता जी भाषण दे रहे थे – “अगर पाकिस्तान आँख उठाएगा, तो हम आँख निकाल लेंगे!”एक नौजवान खड़ा हुआ और बोला – “आपका बेटा कौन-सी यूनिट में है साहब?”नेता जी मुस्कराए – “वो तो इंजीनियरिंग कर रहा है, विदेश जाना है उसे…”जनता हँसी नहीं, रोई। क्योंकि देशभक्ति अब सिर्फ ‘नारा’ बन गई है, ‘नियति’ नहीं।

